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'किताबें डाउनलोड करना क्राइम नहीं', जमानत मांगते हुए TISS छात्र की दलील

टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस के एक पूर्व छात्र ने बॉम्बे हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए याचिका दायर की है. यह याचिका पिछले साल दिल्ली यूनिवर्सिटी के दिवंगत प्रोफेसर जीएन साईबाबा की याद में कैंपस में हुई अनधिकृत सभा से जुड़ी एफआईआर के खिलाफ है. कोर्ट को दी गई दलील में कहा गया कि किताबें डाउनलोड करना या साहित्य पर चर्चा कोई अपराध नहीं है.

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हाई कोर्ट में छात्र की अपील पर शुक्रवार को सुनवाई होगी. (फाइल फोटो-ITG)
हाई कोर्ट में छात्र की अपील पर शुक्रवार को सुनवाई होगी. (फाइल फोटो-ITG)

टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस (TISS) के एक पूर्व छात्र ने अग्रिम जमानत के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. पिछले साल दिल्ली यूनिवर्सिटी के दिवंगत प्रोफेसर जीएन साईबाबा की याद में कैंपस में एक अनधिकृत सभा हुई थी.

इसी मामले में दर्ज एफआईआर को लेकर छात्र ने गिरफ्तारी से बचने के लिए यह कदम उठाया है. मुंबई की एक सेशन कोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद छात्र ने हाईकोर्ट का रुख किया है.

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, यह पूरा विवाद पिछले साल अक्टूबर का है. 12 अक्टूबर 2025 को TISS के हॉस्टल नंबर 4 के पास 10 से 12 छात्रों ने बिना इजाजत के एक सभा की थी. आरोप है कि इस दौरान छात्रों ने मोमबत्तियां जलाईं, पोस्टर लगाए, कविताएं पढ़ीं और उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई के नारे लगाए. 

इस मामले में TISS की एसोसिएट डीन डॉ. वैशाली बाणदास कोल्हे की शिकायत पर 13 अक्टूबर 2025 को ट्रॉम्बे पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसे बाद में क्राइम ब्रांच CID को सौंप दिया गया.

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इस मामले में सेशन कोर्ट ने कुछ अन्य सह-आरोपियों को राहत दे दी थी, लेकिन 24 साल के इस डेवलपमेंट स्टडीज के ग्रेजुएट छात्र की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी. इसके बाद एक अन्य आरोपी छात्र को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था, जो फिलहाल न्यायिक हिरासत में है.

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'साहित्य पढ़ना या किताबें डाउनलोड करना अपराध नहीं'

छात्र के वकील विजय हीरेमठ के जरिए दाखिल की गई याचिका में कहा गया है कि छात्रों का मिलना, साहित्य पर चर्चा करना, विचार शेयर करना और राजनीतिक मुद्दों पर बात करना किसी भी तरह से आपराधिक नहीं माना जा सकता. इसके आधार पर छात्र पर इतने गंभीर आरोप नहीं लगाए जा सकते.

याचिका में यह भी कहा गया है कि सेशन कोर्ट का फैसला कानून के लिहाज से ठीक नहीं है. कोर्ट ने छात्र और अन्य सह-आरोपियों के बीच सिर्फ इस आधार पर फर्क किया कि छात्र के पास कुछ खास साहित्य था. याचिका में जोर देकर कहा गया है कि एक युवा के तौर पर उसे किसी भी विचारधारा की किताबें पढ़ने का संवैधानिक अधिकार है. सिर्फ किताबें डाउनलोड करना या अपने पास रखना कोई जुर्म नहीं है.

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याचिका में बताया गया है कि छात्र का कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है. उसने कैंपस में कभी कोई उपद्रव नहीं किया है, इसलिए संस्थान की तरफ से उसे कभी कोई नोटिस भी नहीं मिला.

वकील ने दलील दी कि एफआईआर में झूठी कहानी गढ़ी गई है. सभा में उमर खालिद या शरजील इमाम की रिहाई के कोई नारे नहीं लगाए गए थे. याचिका के मुताबिक, BNS की धारा 196 और 197 इस मामले में लागू नहीं होतीं, क्योंकि छात्र ने ऐसा कोई शब्द या इशारा नहीं किया जिससे धर्म, जाति या राष्ट्रीय अखंडता को ठेस पहुंचे या किसी तरह की हिंसा भड़की हो.

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मामले की गंभीरता को देखते हुए वकील ने गुरुवार को ही जल्द सुनवाई की मांग की थी, क्योंकि सेशन कोर्ट से राहत मिलने के बाद छात्र को अंतरिम सुरक्षा मिली हुई थी. अब हाईकोर्ट इस मामले में आगे की सुनवाई करेगा.

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