दो साल... पूरे 730 दिन. परिवार अपने बेटे के लौटने का इंतजार करता रहा. जब भी किसी ने उसकी पत्नी से पूछा कि वह कहां है, जवाब लगभग एक जैसा होता- ऑस्ट्रेलिया में काम कर रहा है. वहां बात करना मना है. घरवाले भी कुछ समय तक इस बात पर भरोसा करते रहे. लेकिन धीरे-धीरे सवाल बढ़ने लगे.
मामला गुजरात के जामनगर का है. मृतक के भाई अशोक मावडिया ने दो साल पहले अपने भाई की गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई थी. उनका कहना है कि जब भी उन्होंने अपने भाई से बात कराने या उसका फोन नंबर मांगा, उनकी भाभी भूमिबेन मावडिया कोई न कोई बहाना बना देती थी.
जवाब देती थी कि ऑस्ट्रेलिया में नौकरी करने गया है. परिवार को यह बात अजीब जरूर लगी, लेकिन उनके पास इसे गलत साबित करने का कोई आधार नहीं था. वक्त बीतता गया और हर सवाल का जवाब एक ही कहानी में मिलता रहा. कहानी में मोड़ तब आया, जब परिवार के एक सदस्य ने बताया कि वह भी ऑस्ट्रेलिया काम करने जा रहा है. उसने मृतक का फोन नंबर मांगा, ताकि वहां पहुंचकर संपर्क कर सके. यहीं से कथित झूठ की परतें उखड़ने लगीं.

भाई अशोक मावडिया का दावा है कि नंबर देने की बात कहकर कई दिन टालमटोल की गई. कभी कहा गया कि बाद में देंगे, कभी कोई और बहाना बनाया गया. लगातार बदलते जवाबों ने परिवार का शक और गहरा कर दिया.
फिर एक दिन कहानी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. अशोक मावडिया के मुताबिक, उनकी भाभी ने खुद फोन कर मिलने की बात कही. मुलाकात में भाभी ने ऐसा सच बताया, जिसने पूरे परिवार के पैरों तले जमीन खिसका दी. उनका कहना है कि भूमिबेन ने स्वीकार किया कि उन्होंने उनके भाई की हत्या कर दी है. इसके बाद मामला पुलिस तक पहुंचा और जांच की दिशा पूरी तरह बदल गई.
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पुलिस के अनुसार, जांच में सामने आया कि मृतक की पत्नी पृथ्वीबेन उर्फ भूमिबेन जिग्नेशभाई मावडिया ने अपने पूर्व प्रेमी निलेश मनसुखभाई कछटिया और उसके दोस्त बलवीर देवीराम वर्मा के साथ मिलकर हत्या की साजिश रची. आरोप है कि पहले मृतक को जहरीला पदार्थ दिया गया और फिर सबूत मिटाने के लिए शव को करीब 12 फीट गहरे गड्ढे में दफना दिया गया.
करीब दो साल तक गुमशुदगी के मामले की जांच चलती रही. आखिरकार पुलिस ने मामले की परतें खोलते हुए तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया. गुरुवार को तीनों आरोपियों को जामनगर की अतिरिक्त सिविल अदालत में पेश किया गया. पुलिस ने आगे की पूछताछ के लिए सात दिन की रिमांड मांगी थी. हालांकि अदालत ने चार दिन की पुलिस रिमांड मंजूर की है. अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि हत्या की पूरी साजिश कैसे रची गई, इसमें किसकी क्या भूमिका थी और क्या इस वारदात से जुड़े अभी और भी राज सामने आने बाकी हैं.
अब पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कथित हत्या की साजिश कब बनी, इसमें किसकी क्या भूमिका थी और दो साल तक इस पूरे घटनाक्रम को कैसे छिपाए रखा गया. अगर परिवार फोन नंबर मांगने पर जोर नहीं देता, तो क्या यह मामला कभी खुल पाता? क्या गुमशुदगी की जांच पहले किसी और दिशा में गई थी? क्या पुलिस को पहले ऐसे कोई सुराग मिले थे, जिन्हें उस समय जोड़कर नहीं देखा जा सका? इन सवालों के जवाब अभी जांच के दायरे में हैं.