संजय लीला भंसाली की लव एंड वॉर के नए पोस्टर में विक्की कौशल का लुक सामने आया तो उनके चेहरे या कपड़ों से ज्यादा ध्यान उनके होठों के बीच दबी सिगरेट ने खींचा. हाथ में लाइटर, होंठों के बीच सिगरेट और कैमरे की तरफ सीधी, सख्त नजर. पोस्टर का पूरा विजुअल उन्हें एक साथ रफ और रहस्यमयी बनाता है. दिलचस्प यह है कि कुछ ऐसा ही विजुअल इससे पहले रणबीर कपूर की एनिमल और रणवीर सिंह की धुरंधर में भी दिखाई दे चुका है. किरदार अलग हैं, फिल्में अलग हैं लेकिन तस्वीर की भाषा लगभग एक ही है. एक बड़ा स्टार, हाथ में सिगरेट और उसके साथ जुड़ा हुआ एक खास किस्म का एटीट्यूड. इसलिए सवाल सिर्फ ये नहीं है कि फिल्मों में सिगरेट को इतना ग्लैमराइज क्यों किया गया? सवाल यह है कि कैमरे के सामने सिगरेट को इतना ताकतवर क्यों बना दिया गया कि एक स्टार के हाथ में आते ही वह उसके किरदार का आधा परिचय देने लगती है?
सिनेमा में सिगरेट का इस्तेमाल हिंदी फिल्मों की कोई नई आदत नहीं है. यह कई पीढ़ियों से चली आ रही एक ऐसी सिनेमाई भाषा है, जिसका मतलब वक्त के साथ बदलता रहा है. कभी सिगरेट पुरुष किरदार की मर्दानगी का संकेत बनी, कभी विद्रोह का, कभी अकेलेपन तो कभी तनाव का. किरदार के पास संवाद न भी हो, हाथ में जलती सिगरेट और धुएं के बीच उसका क्लोजअप कई बार यह संकेत देने के लिए काफी माना गया कि यह कोई आम आदमी नहीं है. खासकर एंटी हीरो के मामले में यह और ज्यादा दिखाई देता है. वह नियमों को तोड़ता है, समाज की परवाह नहीं करता और अपनी शर्तों पर जीता है. ऐसे में सिगरेट उसके व्यक्तित्व की विजुअल भाषा बन जाती है.
हिंदी फिल्मों के शुरुआती दौर में सिगरेट का हीरो से रिश्ता उतना सहज नहीं था. लंबे समय तक स्क्रीन पर स्मोकिंग को किसी किरदार की कमजोरी, उसकी निगेटिव छवि या किसी खास सामाजिक वर्ग की पहचान की तरह दिखाया जाता था. लेकिन जैसे-जैसे हिंदी फिल्मों का हीरो बदलता गया, सिगरेट भी उसके साथ बदलती गई. हीरो अब सिर्फ नेक, दिलदार या परिवार के लिए लड़ने वाला किरदार भर नहीं था. वह गुस्सा भी करता है, नियम भी तोड़ता है और सिस्टम से टकराता भी है. सिगरेट ऐसे किरदार के लिए बहुत सुविधाजनक सिनेमाई औजार बना क्योंकि सिगरेट किसी संवाद के बिना भी बता देती थी कि यह आदमी भीतर से कितना टूटा हुआ है या कितना नाराज है.
सत्तर के दशक में जब हिंदी सिनेमा में एंग्री यंग मैन की एंट्री हुई तब हीरो की मर्दानगी का पूरा ढांचा बदल गया. अमिताभ बच्चन के कई किरदारों में सिगरेट, शराब और अकेलेपन जैसी चीजें उस दौर के पुरुष की बेचैनी और विद्रोह से जुड़ती हैं. दीवार में विजय का किरदार इसका खास उदाहरण माना जा सकता है. यहां सिगरेट उस आदमी की जिंदगी, उसके सामाजिक उभार और उसके बदलते व्यक्तित्व के साथ चलती है. सिगरेट को स्टेटस दिखाने के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता रहा. गरीब आदमी की बीड़ी, मिडिल क्लास या अर्बन आदमी की सिगरेट और ताकतवर आदमी का सिगार. सिनेमा ने इनका सामाजिक पहचान की तरह इस्तेमाल किया.
फिर ऐसा दौर भी आता है, जब सिगरेट दर्द की भाषा बनती है. ऐसे में देवदास को ही ले लीजिए. देवदास की पीड़ा और उसके गिल्ट को सिगरेट और शराब के जरिए दिखाया गया. देवदास बना शाहरुख खान जब सिगरेट पीता है तो वह सिर्फ धुआं नहीं उड़ा रहा होता. वह अपने भीतर के टूटन को भी स्क्रीन पर दिखा रहा होता है.
ऐसे में एक ही चीज अलग-अलग किरदारों में बिल्कुल अलग अर्थ पैदा कर सकती है. देवदास में वही सिगरेट सेल्फ डिस्ट्रक्शन और विरह का प्रतीक लग सकती है, किसी गैंगस्टर फिल्म में वह खतरे और सत्ता का संकेत बन सकती है जबकि किसी रोमांटिक फिल्म में वही सिगरेट हीरो को रहस्यमय और कूल बना सकती है.
और यहीं से सिगरेट का रिश्ता मर्दानगी से जुड़ता है. हिंदी सिनेमा ने लंबे समय तक पुरुष किरदार को मजबूत दिखाने के लिए कुछ खास चीजों का इस्तेमाल किया. शराब का ग्लास, भारी आवाज, तेज गाड़ी, हथियार, सूट, सिगार या सिगरेट. इन चीजों में सिगरेट सबसे आसान थी.
शायद इसलिए सिगरेट को पोस्टर पर दिखाने का ट्रेंड भी बढ़ा. कहानी में किसी किरदार को सिगरेट पीते दिखाने और उसके पोस्टर में उसे सिगरेट के साथ दिखाने में बड़ा फर्क है. फिल्म में सिगरेट कहानी की जरूरत हो सकती है, लेकिन पोस्टर में हर चीज जानबूझकर चुनी जाती है. पोस्टर को कुछ सेकेंड में दर्शक के दिमाग में एक सवाल पैदा करना होता है कि यह शख्स आखिर कौन है? कैसा है? कितनी डार्क है? और सिगरेट इन सारे सवालों का जवाब एक ही फ्रेम में देने का आसान तरीका बन जाती है.
यही वजह है कि सिगरेट और इसकी कूल इमेज का रिश्ता केवल फिल्मों के भीतर नहीं, बल्कि उनके प्रमोशन में भी दिखाई देता है. फिल्म का पोस्टर दो मिनट की कहानी नहीं बता सकता. उसे एक फ्रेम में किरदार का मूड, स्टाइल और स्वभाव बेचने होते हैं. ऐसे में हाथ में सिगरेट एक बहुत आसान सिनेमाई सिंबल बन जाता है. सूट पहने हीरो को सिगरेट और रहस्यमय बना सकती है, खून से सने विलेन के हाथ में सिगरेट उसे और ज्यादा खतरनाक दिखा सकती है. यानी यहां सिगरेट एक विजुअल कोड की तरह इस्तेमाल होता है.
एनिमल इसका एक दिलचस्प उदाहरण है. रणबीर कपूर के किरदार रणविजय की पूरी दुनिया ही आक्रामकता, हिंसा, सत्ता और मर्दानगी के इर्द-गिर्द बुनी हुई है. ऐसे किरदार के हाथ में सिगरेट उसकी आदत से ज्यादा उसके व्यक्तित्व की पैकेजिंग का हिस्सा बन है. धुरंधर में रणवीर सिंह का सिगरेट वाला लुक भी इसी तरह की विजुअल भाषा का इस्तेमाल करता दिखाई देता है.
सिनेमा का एक दूसरा पक्ष भी है. कई बार स्मोकिंग किरदार की कमजोरी, तनाव या उसके व्यक्तित्व के स्याह पक्ष को दिखाने का तरीका होता है. समस्या तब पैदा होती है जब उस सीन की पूरी विजुअल पैकेजिंग हीरो के चेहरे, बॉडी लैंग्वेज और बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ मिलकर सिगरेट को अट्रैक्शन में बदल देती है.
कहानी में किरदार का सिगरेट पीना एक बात है, लेकिन उसी तस्वीर को स्टार के कूल लुक के तौर पर बेचना दूसरी बात. यहीं से सिगरेट पीता हीरो एक दिलचस्प बॉलीवुड पैटर्न बन जाता है. हिंदी सिनेमा में हीरो को सिर्फ अच्छा दिखाना काफी नहीं रहा. उसे एटीट्यूड वाला दिखाना भी जरूरी है और उस एटीट्यूड की विजुअल लैंग्वेज में लंबे समय से सिगरेट शामिल रही है.
बॉलीवुड की सिगरेट की कहानी इसलिए दिलचस्प है क्योंकि इसमें कोई एक स्थायी अर्थ नहीं है. सिगरेट कभी विलेन की पहचान रही, कभी एंग्री यंग मैन की बेचैनी, कभी देवदास का दर्द, कभी गैंगस्टर की सत्ता और अब कई बार एंटी हीरो के एटीट्यूड का हिस्सा. समय के साथ-साथ किरदार बदलता गया और सिगरेट उसके साथ अपना नया अर्थ तलाशती रही.