सुपरस्टार शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल पश्चिमी दुनिया में किया गया. 1950 और 1960 के दशक में सिनेमा के बड़े सितारों के लिए इसका इस्तेमाल किया जाने लगा. लेकिन भारत में मेनस्ट्रीम मीडिया ने पहली बार इस शब्द का इस्तेमाल 1970 के दशक की शुरुआत में राजेश खन्ना के लिए किया, जब करीब पांच साल तक उनका ऐसा जबरदस्त स्टारडम रहा कि उसे किसी जुनून से कम नहीं कहा जा सकता. लेकिन क्या आपको पता है कि इससे पहले एक स्टार ऐसा भी था, जिसके लिए उनके प्रशंसक महानायक शब्द का इस्तेमाल करते थे. यह कहानी उसी सुपरस्टार की है.
बांग्ला सिनेमा से निकले अब तक के सबसे बड़े और सबसे लोकप्रिय अभिनेताओं में शुमार उत्तम कुमार का जन्म आज से ठीक सौ साल पहले तीन सितंबर को हुआ था. कलकत्ता में अरुण कुमार चटर्जी के नाम से जन्मे उत्तम कुमार का फिल्मी सफर 1947 में हिंदी फिल्म ‘माया डोरे’ में एक एक्स्ट्रा के तौर पर शुरू हुआ. बतौर लीड एक्टर उनकी पहली फिल्म 1948 की ‘दृष्टिदान’ थी. उन्होंने लीड एक्टर असित बरन के बचपन का रोल निभाया था. अपनी शुरुआती फिल्मों में उन्हें अरूप कुमार या उत्तम चटर्जी के नाम से क्रेडिट दिया गया.
उन्होंने 1951 में आई ‘सहयात्री’ से अपना फिल्मी नाम उत्तम कुमार रखना शुरू किया. इसके अगले ही साल ‘बसु परिवार’ ने उन्हें पहला बड़ा ब्रेक दिया. इस फिल्म में उन्होंने पहली बार सुप्रिया देवी के साथ काम किया, जो आगे चलकर उनकी लगातार साथ नजर आने वाली सह-कलाकारों में शामिल हुईं.

1950 के दशक में उत्तम कुमार ने खुद को बांग्ला सिनेमा के सबसे प्रमुख युवा अभिनेताओं में स्थापित कर लिया. इस दौरान उन्होंने कई बार लगातार हिट फिल्में दीं लेकिन 1960 वह साल था, जब उन्हें ‘महानायक’ कहे जाने की शुरुआत हुई. उस साल वह नौ फिल्मों में नजर आए और बॉक्स ऑफिस पर सभी नौ फिल्में सफल रहीं.
1950 और 1960 के दशक में बांग्ला सिनेमा अपने आप में एक बड़ी ताकत था. हालांकि, इंडस्ट्री के कई सितारे इसे हिंदी फिल्मों में जाने की सीढ़ी के तौर पर इस्तेमाल करते थे, क्योंकि हिंदी फिल्मों की पहुंच कहीं ज्यादा बड़ी थी लेकिन उत्तम कुमार ने ऐसा बहुत कम किया. अपने करियर के शिखर यानी 1960 के दशक में उन्होंने कई हिंदी फिल्मों के प्रस्ताव ठुकराए. इनमें बड़े बजट की ‘बीस साल बाद’ जैसी फिल्में भी शामिल थीं. 1964 में उन्होंने मशहूर अभिनेता राज कपूर की फिल्म ‘संगम’ में काम करने से भी इनकार कर दिया. बाद में यह भूमिका राजेंद्र कुमार को मिली. 1968 में उत्तम कुमार ने वैजयंतीमाला के साथ ‘छोटी सी मुलाकात’ से बॉलीवुड में कदम रखा. इस फिल्म के निर्माता भी वह खुद थे. इसके बाद अगले कुछ वर्षों में उन्होंने कुछ और हिंदी फिल्मों में काम किया, जिनमें खासतौर पर ‘अमानुष’ उल्लेखनीय है लेकिन उनका दिल हमेशा कोलकाता में ही रहा, जहां बांग्ला फिल्मों में उनका एकछत्र राज था.

हालांकि महानायक वहां भी अपने काम को लेकर बेहद चुनिंदा थे. 1956 में युवा सत्यजीत रे ने उन्हें ‘घरे बाइरे’ में काम करने का प्रस्ताव दिया था लेकिन उत्तम कुमार ने विनम्रता से इसे ठुकरा दिया. उनका कहना था कि किसी स्थापित स्टार के लिए नकारात्मक किरदार निभाना उपयुक्त नहीं होगा. करीब एक दशक बाद दोनों की जोड़ी बनी और उन्होंने ‘नायक’ जैसी ऐतिहासिक फिल्म दी, जो बड़ी हिट साबित हुई.
1970 के दशक में भी उत्तम कुमार की लोकप्रियता कायम रही. इसी दौर में हिंदी सिनेमा में राजेश खन्ना का दौर खत्म हुआ और अमिताभ बच्चन देश के सबसे बड़े सुपरस्टार बनकर उभरे. अमिताभ की लोकप्रियता ऐसी थी कि वह पूरे भारत में सबसे बड़े दर्शक-खींचू सितारे बन गए. उनकी कई फिल्मों को क्षेत्रीय सितारों की फिल्मों से भी ज्यादा तवज्जो मिलने लगी. लेकिन बंगाल में उत्तम कुमार अब भी महानायक थे. बांग्ला भाषी इलाकों में सिनेमाघरों के शो और स्क्रीन के मामले में उनकी फिल्मों को अक्सर अमिताभ बच्चन की हिंदी फिल्मों से भी ऊपर रखा जाता था.

1976 के बाद लगातार सफल फिल्में देने के बावजूद उत्तम कुमार के स्टारडम में धीरे-धीरे गिरावट आने लगी. अब वह 50 की उम्र पार कर चुके थे और उनकी फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर लगातार पहले जैसी सफलता नहीं मिल रही थी. ‘किताब’ और ‘आनंद आश्रम’ जैसी फिल्मों में उनके काम को सराहा गया, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर नतीजे मिले-जुले रहे. 1980 में आई ‘दुई पृथिबी’ लंबे समय बाद उनकी एक सफल और समीक्षकों द्वारा प्रशंसित फिल्म बनी. यही उनके जीवनकाल में रिलीज हुई उनकी आखिरी फिल्म थी. 23 जुलाई 1980 को ‘ओगो बधू सुंदरी’ की शूटिंग के दौरान महानायक की तबीयत बिगड़ गई. अगले दिन दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया.