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जन्माष्टमी पर न करें श्रीकृष्ण की पीठ के दर्शन, नष्ट हो जाएंगे सारे पुण्य! पढ़ें कहानी

क्या आप जानते हैं कि पूजा या दर्शन के वक्त कभी श्रीकृष्ण की पीठ नहीं देखनी चाहिए. कहते हैं कि श्रीकृष्ण की पीठ पर पाप का वास होता है और जब भी कोई व्यक्ति उनकी पीठ देखता है तो उसके पापों की संख्या अनायास ही बढ़ने लगती है.

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आज देशभर में धूमधाम से जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जा रहा है. (Photo: ITG)
आज देशभर में धूमधाम से जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जा रहा है. (Photo: ITG)

जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के भक्त पूरी श्रद्धा के साथ उनकी पूजा-अर्चना करते हैं. इस दिन कान्हा के प्रसिद्ध मंदिरों में इस दिन बड़ी भीड़ होती है. लोग दूर-दूर से भगवान के दर्शन करने आते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि पूजा या दर्शन के वक्त कभी श्रीकृष्ण की पीठ नहीं देखनी चाहिए. कहते हैं कि श्रीकृष्ण की पीठ पर पाप का वास होता है और जब भी कोई व्यक्ति उनकी पीठ देखता है तो उसके पापों की संख्या अनायास ही बढ़ने लगती है. इसके पीछे कालयवन, श्रीकृष्ण और राजा मुचुकुंद से जुड़ी एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है.

जब कालयवन से हुआ श्रीकृष्ण का सामना
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का युद्ध जरासंध से चल रहा था. इसी दौरान जरासंध का सहयोगी कालयवन भी कृष्ण से युद्ध करने के लिए पहुंच गया. कालयवन श्रीकृष्ण को युद्ध के लिए ललकारने लगा. कालयवन एक ऐसा मायावी असुर था जिसे वरदान प्राप्त था कि युद्ध की रणभूमि में कोई उसे हरा नहीं सकता. इसलिए श्रीकृष्ण उसके सामने युद्धभूमि छोड़कर भागने लगे. कालयवन भी उनकी पीछा करने लगेा. इस घटना के कारण ही श्रीकृष्ण का नाम रणछोड़ पड़ा था.

दरअसल, श्रीकृष्ण कालयवन की शक्ति और उसके पूर्व जन्म के पुण्य से परिचित थे. कालयवन के पिछले पुण्यों का प्रभाव इतना ज्यादा था कि भगवान चाहकर भी उसका अंत नहीं कर सकते थे. भगवान किसी व्यक्ति को उसके पुण्य का प्रभाव समाप्त होने से पहले दंड नहीं देते. इसलिए श्रीकृष्ण ने सीधे उसका वध करने के बजाय उसे एक दूसरी दिशा में ले जाने का मार्ग चुना.

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श्रीकृष्ण जब रणभूमि छोड़कर भागने लगे तो कालयवन पीछे दौड़ते हुए उनकी पीठ देखने लगा. धार्मिक मान्यता में भगवान की पीठ को अधर्म से जोड़ा गया है, जिसे देखने से किसी के भी पुण्य घटने लगते हैं. इसी वजह से उनकी पीठ के दर्शन को शुभ नहीं माना जाता है. कालयवन ने ये गलती की और अपने सारे पुण्य नष्ट कर लिए.

इसके बाद श्रीकृष्ण एक गुफा में पहुंचे. वहां राजा मुचुकुंद गहरी नींद में सो रहे थे. उन्हें देवराज इंद्र से एक विशेष वरदान प्राप्त था कि जो भी उन्हें नींद से जगाएगा, उनकी दृष्टि पड़ते ही जलकर भस्म हो जाएगा. तब श्रीकृष्ण ने चुपके अपनी एक पोशाक मुचुकुंद के ऊपर डाल दी. पीछे से कालयवन ने उन्हें ही कृष्ण समझ लिया. उसने भूलवश कृष्ण समझकर मुचुकुंद को जगा दिया. आंख खुलते ही राजा की नजर कालयवन पर पड़ी और वह भस्म हो गया. आज यह लोक मान्यता खूब प्रचलित है कि भक्तों को कभी श्रीकृष्ण की पीठ के दर्शन नहीं करने चाहिए.

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