उत्तर प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव की बिसात बिछते ही गणित और सियासी आंकड़ों का खेल दिलचस्प हो गया है. राज्यसभा की 10 सीटों पर होने वाले इस चुनाव में भाजपा और सपा के बीच शह-मात का खेल जारी है. ऐसे में सपा प्रमुख अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे अपने तीसरे कैंडिडेट को राज्यसभा भेजने के लिए '111' का जादुई आंकड़ा कहां से और कैसे जुटाएंगे?
राज्यसभा चुनाव में विधायकों की मौजूदा संख्या के आधार पर सात सीटें भाजपा और दो सीटें सपा आसानी से जीत सकती है. ऐसे में राज्यसभा चुनाव की असल लड़ाई बची हुई 10वीं सीट को लेकर है, जिसका पेच ऐसा फंसा है कि सपा और भाजपा दोनों के लिए चुनौतियां कम नहीं हैं.
भाजपा को अगर एनडीए के खाते में यह आठवीं सीट डालनी है, तो उसे पूरे एनडीए को एकजुट रखना होगा. इसके लिए भाजपा को अपने सहयोगी दलों के सभी विधायकों के साथ-साथ राजा भैया की पार्टी के दोनों विधायकों का समर्थन भी प्राप्त करना होगा. फिलहाल सपा और भाजपा दोनों के पास ही अपने दम पर अतिरिक्त सीट जीतने का मैजिक नंबर नहीं है, जिसके चलते यह मुकाबला काफी रोचक होता जा रहा है.
राज्यसभा चुनाव का गणित क्या है?
राज्यसभा चुनाव का फैसला विधानसभा के विधायक करते हैं. विधायकों की संख्या के आधार पर तय होता है कि कौन सी पार्टी राज्यसभा की कितनी सीटें जीत सकती है. इसका एक तय फॉर्मूला है कि एक सीट के लिए कितने विधायकों का वोट चाहिए. राज्यसभा की जितनी सीटों पर चुनाव हो रहे हैं, उसमें एक जोड़कर जो संख्या आए, उससे विधानसभा के कुल सदस्यों (मौजूदा प्रभावी संख्या) को भाग दिया जाता है और जो आंकड़ा आए, उसमें एक जोड़ दिया जाता है. इस तरह प्रथम वरीयता के आधार पर एक राज्यसभा सीट के लिए आवश्यक वोटों की संख्या स्पष्ट हो जाती है.
उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सदस्य हैं, लेकिन मौजूदा समय में सात सीटें खाली होने के कारण प्रभावी विधायक संख्या 396 है. राज्यसभा की 10 सीटों पर होने वाले चुनाव के लिए फॉर्मूले के तहत (10 + 1 = 11) यदि 396 को 11 से भाग देते हैं तो आंकड़ा 36 निकलता है, जिसमें 1 जोड़ने पर यह 37 हो जाता है. ऐसे में राज्यसभा की एक सीट के लिए एक कैंडिडेट को प्रथम वरीयता के आधार पर 37 विधायकों के वोट चाहिए.
सपा कहां से लाएगी 111 का मैजिक नंबर?
सपा के 111 विधायक 2022 के चुनाव में जीतकर आए थे, लेकिन 2026 आते-आते यह संख्या घटकर 98 रह गई है. इसमें सपा के वे बागी विधायक शामिल नहीं हैं, जिन्होंने 2024 में क्रॉस वोटिंग की थी. जेल में बंद सपा विधायक रमाकांत यादव जरूर इस गिनती में शामिल हैं; यदि उन्हें वोटिंग की इजाजत नहीं मिलती है, तो सपा के पास केवल 97 विधायकों का आंकड़ा रह जाता है. सपा यदि कांग्रेस के दो विधायकों का समर्थन जुटा लेती है, तो यह आंकड़ा 99 तक पहुंचता है.
समाजवादी पार्टी यदि राज्यसभा की 3 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारती है, तो उसे तीनों उम्मीदवारों को पहली वरीयता पर सीधे जीत दिलाने के लिए 111 विधायकों के प्रथम वरीयता वोटों की आवश्यकता होगी. सपा के पास फिलहाल जो संख्याबल है, उसके आधार पर वह दो सीटें (37 + 37 = 74 वोट) आसानी से जीत लेगी. इसके बाद सपा के पास करीब 25 विधायकों के वोट सरप्लस बचेंगे. इस तरह सपा को तीसरी राज्यसभा सीट जीतने के लिए कम से कम 12 अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की जरूरत होगी. सपा यह 12 का आंकड़ा कहां से जुटाएगी, यही सबसे बड़ी चुनौती है.
सपा के तीसरे प्रत्याशी की राह कितनी मुश्किल?
सपा अपने तीसरे उम्मीदवार को जिताने के लिए विपक्षी व तटस्थ विधायकों पर नजर गढ़ाए हुए है. सपा के साथ आसानी से आ सकने वाले विधायकों में सुभासपा के वे तीन विधायक शामिल माने जा रहे हैं, जो मूल रूप से सपा पृष्ठभूमि के हैं. इसके अलावा जो सपा के बागी विधायक हैं, जिन्हें औपचारिक रूप से निष्कासित नहीं किया गया है, यदि वे वापस लौट आते हैं तो सपा का आंकड़ा 32 सरप्लस वोटों तक पहुंच सकता है. इसके बावजूद सपा को 5 से 7 और विधायकों के वोटों की जरूरत होगी.
इसके अलावा देखा जाए तो गठबंधन से इतर कुछ अन्य गैर-भाजपा विधायक भी हैं. उदाहरण के लिए, आरएलडी और अपना दल के कुछ विधायक हैं, जिनकी निष्ठा को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं. क्या ये विधायक समाजवादी पार्टी के पक्ष में क्रॉस वोट करेंगे? यह एक बड़ा सवाल है. इसके अलावा कहा जा रहा है कि भाजपा के कुछ ऐसे विधायक, जो भविष्य में सपा से टिकट की आस लगाए हैं, वे क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं; लेकिन वे कितने हैं और कौन हैं, इसकी तस्वीर अभी साफ नहीं है.
अखिलेश यादव ने राज्यसभा के लिए अभी अपना तीसरा उम्मीदवार नहीं उतारा है. पूछने पर उन्होंने कहा भी है कि प्रत्याशी तब उतारेंगे जब 'नंबर पूरा हो जाएगा' यानी विधायकों का इंतजाम हो जाएगा. अखिलेश यादव के लिए यह चुनाव केवल उम्मीदवारों के नाम तय करने का खेल नहीं है, बल्कि अपने विधायकों को एकजुट रखने और 111 के इस 'मैजिक नंबर' को साधकर भाजपा के चक्रव्यूह को भेदने की बड़ी परीक्षा है.
भाजपा का नंबर गेम समझिए
राज्यसभा चुनाव में भाजपा भी 8 उम्मीदवार उतारने का प्लान बना रही है. भाजपा ने भले ही पूरी तरह अपने पत्ते न खोले हों, लेकिन बिसात बिछाने में जुट गई है. भाजपा यदि एनडीए के सभी विधायकों को एकजुट रखती है, तब भी 8वीं सीट जीतने के लिए उसे कुछ अतिरिक्त वोटों की दरकार होगी, जिसके लिए क्रॉस वोटिंग करानी पड़ सकती है.
भाजपा के पास फिलहाल अपने 255 विधायक हैं. इसके अलावा अपना दल (एस) के 13, आरएलडी के 9, सुभासपा के 6 और निषाद पार्टी के 5 विधायक हैं. इन सभी को जोड़ने पर यह आंकड़ा 288 पहुंचता है. इसके अलावा सपा के बागी व निष्कासित विधायकों (जैसे मनोज पांडेय) को एनडीए के खेमे में जोड़ें तो संख्या 292 हो जाती है. अन्य बागी विधायकों और राजा भैया की पार्टी (जनसत्ता दल) के 2 विधायकों को मिलाने पर यह संख्या 295 से 297 के आसपास पहुंचती है.
राज्यसभा की एक सीट के लिए 37 विधायकों के वोट चाहिए. इस हिसाब से 8 सीटें जीतने के लिए भाजपा को 296 विधायकों के वोटों की जरूरत होगी. हालांकि, एनडीए के सहयोगी दलों (जैसे सुभासपा) के कुछ विधायकों को सबसे कमजोर कड़ी माना जा रहा है, जहां क्रॉस वोटिंग का खतरा बना हुआ है. इसलिए 8वीं सीट पक्की करने के लिए भाजपा को भी 5 से 7 अतिरिक्त विधायकों की दरकार होगी. यही कशमकश भाजपा के लिए भी है कि वह अपने कुनबे को एकजुट रखते हुए सपा के खेमे में सेंधमारी कैसे करे.