उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दल अपने-अपने वोट बैंक को साधने में जुट गए हैं. समाजवादी पार्टी भी इस रणनीति के तहत बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश करती नजर आ रही है. अखिलेश यादव के पीडीए में ‘पी’ का मतलब पंडित बताने से लेकर राम मंदिर में चंदा चोरी का मुद्दा उठाने और साधु-संतों पर सॉफ्ट स्टैंड अपनाने तक, पार्टी की रणनीति में बदलाव दिखाई दे रहा है. इसकी एक झलक रविवार (23 अगस्त) को काशी में भी देखने को मिली.
यूपी के इटावा जिले में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव भगवान शिव को समर्पित केदारेश्वर मंदिर का निर्माण करवा रहे हैं. इस मंदिर का निर्माण केदारनाथ मंदिर की तर्ज पर किया जा रहा है. 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इसकी झलक पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में देखने को मिली. यहां मंदिर की झांकी निकाली गई, जिसे आगामी चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है.
काशी केदारेश्वर मंदिर के भव्य स्वरूप और विशाल शिवलिंग की झांकी सिकरौल से निकली. यहां भव्य आरती की गई, इस दौरान बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे. आरती के बाद यात्रा आगे बढ़कर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर पहुंची. शोभायात्रा में शामिल महिलाओं और भक्तों ने बाबा श्री काशी विश्वनाथ जी का जलाभिषेक किया. यात्रा के प्रारंभ में भोजूबीर टैगोर कॉलोनी के गेट पर मंदिर की भव्य आरती की गई. इसमें चंदौली के सांसद श्री वीरेंद्र सिंह जी, पूर्व मंत्री मनोज राय धूपचंडी जी, पूर्व प्रत्याशी शिवपुर विधानसभा आनंद मोहन गुड्डू यादव जी और यात्रा के संयोजक शुभम यादव जिद्दी शामिल हुए. कार्यक्रम में प्रमुख रूप से राज यादव, मनोज यादव गोलू, शंभू नाथ सोनकर, जैकी चौहान, विशु गौड़, अरुण चौहान, सचिन सोनकर, सुजीत पाण्डेय और अयाज़ खान ने सम्मिलित होकर भगवान शिव को पुष्प अर्पित किए और श्रद्धापूर्वक नमन किया..
इटावा यमुना नदी के किनारे बसा शहर है और इसे महाभारत कालीन सभ्यता से जुड़ा माना जाता है. राजनीतिक तौर पर भी इटावा को समाजवादी पार्टी का गढ़ माना जाता है. शहर के लोहन्ना चौराहे से ग्वालियर जाने वाले हाईवे पर लायन सफारी के ठीक सामने केदारेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण कराया जा रहा है. मंदिर का निर्माण कार्य अब लगभग पूरा हो चुका है.
लायन सफारी का निर्माण समाजवादी पार्टी की सरकार के कार्यकाल में हुआ था. इसी के सामने बन रहे केदारेश्वर मंदिर का निर्माण सपा मुखिया अखिलेश यादव की ओर से कराया जा रहा है. मंदिर की चर्चा पहली बार लोकसभा चुनाव से पहले फरवरी 2024 में राष्ट्रीय स्तर पर हुई थी. उस समय नेपाल से लाई गई शालिग्राम शिला देर रात ट्रक के जरिए लखनऊ स्थित समाजवादी पार्टी के प्रदेश मुख्यालय पहुंची थी. अगले दिन अखिलेश यादव, उनकी पत्नी डिंपल यादव और पार्टी नेताओं ने वैदिक विधि-विधान से शिला की पूजा-अर्चना की थी. उस समय देश का राजनीतिक माहौल अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन के बाद धार्मिक विमर्श से भरा हुआ था. ऐसे में समाजवादी पार्टी ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर इस मंदिर परियोजना को सामने रखा था.
एक नंदी की प्रतिमा से शुरू हुई मंदिर की कहानी
केदारेश्वर महादेव मंदिर की परिकल्पना किसी राजनीतिक रणनीति के तहत नहीं, बल्कि एक नंदी की प्रतिमा से शुरू हुई थी. मंदिर का निर्माण कर रही आंध्र प्रदेश की कंपनी के निदेशक मधु बोट्टा के मुताबिक, वर्ष 2009 में नई दिल्ली में उनकी पहली मुलाकात अखिलेश यादव से हुई थी. उस समय अखिलेश यादव ने उनसे सिर्फ एक विशाल नंदी की प्रतिमा बनाने को कहा था.
दरअसल, मैसूर के जयचामाराजेंद्र कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में पढ़ाई के दौरान अखिलेश यादव अक्सर चामुंडेश्वरी मंदिर जाया करते थे. वहां स्थापित काले ग्रेनाइट के विश्वप्रसिद्ध नंदी ने उन पर गहरी छाप छोड़ी थी. उन्होंने उसी शैली की प्रतिमा इटावा में स्थापित करने की इच्छा जताई थी. कई वर्षों की तैयारी के बाद 2017 में मधु बोट्टा मैसूर स्थित नंदी की लगभग हूबहू प्रतिकृति बनाकर इटावा लेकर आए. अखिलेश यादव ने जब इसे देखा तो वे काफी प्रभावित हुए. इसके बाद यहां एक भव्य शिव मंदिर बनाने का विचार सामने आया.