उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की सियासी सरगर्मी के बीच सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने चुनाव लड़ने की तस्वीर साफ कर दी है. उन्होंने कहा कि हम मुख्यमंत्री तभी बनते हैं जब चुनाव नहीं लड़ते हैं, इसलिए वही काम करेंगे जो हमारे लिए शुभ होगा, पिछली बार भी हम लोकसभा सांसद रहते हुए ही मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने पहुंचे थे, इस बार भी सीधे वहीं से आकर शपथ लेंगे.
अखिलेश के इस रुख से साफ है कि वे 2012 के अपने सफल फॉर्मूले को दोहराने का मन बना चुके हैं, जब उन्होंने बिना खुद चुनाव लड़े पार्टी को पूर्ण बहुमत दिलाया था. इस तरह से किसी एक विधानसभा क्षेत्र में खुद को बांधने के बजाय वे पूरे प्रदेश में घूम-घूमकर समाजवादी पार्टी और 'पीडीए' (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) गठबंधन के पक्ष में माहौल तैयार करना चाहते हैं.
सपा प्रमुख अखिलेश यादव का मानना है कि व्यक्तिगत रूप से चुनाव जीतने से कहीं ज्यादा जरूरी अपनी पार्टी को सत्ता की दहलीज तक पहुंचाना है. सरकार बनने की सूरत में वे बाद में विधान परिषद या उप-चुनाव के रास्ते मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल सकते हैं. हालांकि, पहली बार नहीं है जब कोई नेता बिना विधानसभा चुनाव लड़े मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे हों, सूबे में लंबी फेहरिश्त है.
त्रिभुवन सिंह सीएम बने, लेकिन हार गए चुनाव
त्रिभुवन नारायण सिंह यूपी के पहले ऐसे मुख्यमंत्री थे जो शपथ लेते समय राज्य के किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे. 18 अक्टूबर 1970 को पद संभालने के बाद संवैधानिक अनिवार्यता पूरी करने के लिए उन्होंने गोरखपुर की मानीराम विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ा. हालांकि, इस चुनाव में उन्हें कांग्रेस (आर) के रामकृष्ण द्विवेदी के हाथों हार का सामना करना पड़ा. चुनाव हारते ही उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था.
मायावती बिना चुनाव लड़े दो बार सीएम रहीं
बसपा प्रमुख मायावती बिना विधानसभा चुनाव लड़े, दो बार मुख्यमंत्री रहीं. गेस्ट हाउस कांड के बाद जून 1995 में जब बीजेपी के समर्थन से मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं, तब वे विधायक नहीं बल्कि राज्यसभा सांसद थीं. हालांकि, यह सरकार केवल सवा चार महीने ही चल सकी.
2007 में जब बसपा को पूर्ण बहुमत मिला, तब भी मायावती विधानसभा सदस्य नहीं थीं, उस समय भी राज्यसभा सांसद थीं. मायावती मुख्यमंत्री बनीं और सरकार चलाने के लिए उन्होंने उपचुनाव लड़ने के बजाय विधान परिषद (MLC) की सदस्यता ली. एमएलसी के तौर पर पांच साल तक सीएम रहीं.
राम प्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह
नवंबर 1999 में जब भाजपा ने कल्याण सिंह को हटाकर राम प्रकाश गुप्ता को सत्ता की कमान सौंपी, तब वे सक्रिय राजनीति से लगभग दूर थे और राज्य के किसी सदन के सदस्य नहीं थे. सीएम बनने के बाद उन्होंने विधान परिषद का रास्ता चुना और MLC बने.
अक्टूबर 2000 में जब राजनाथ सिंह ने पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तब वे केंद्र में भूतल परिवहन मंत्री और राज्यसभा सांसद थे. सीएम बनने के बाद उन्होंने बाराबंकी की हैदरगढ़ विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ा, जीत दर्ज की और विधायक के रूप में सदन में पहुंचे.
मुलायम सिंह यादव 2003 में सीएम बने
अगस्त 2003 में जब सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने तीसरी बार यूपी के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तब वे संभल से लोकसभा सांसद थे. संवैधानिक बाध्यता पूरी करने के लिए उन्होंने बदायूं की गुन्नौर विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ा और रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल कर विधायक बने. इस तरह से वे 2007 तक सीएम रहे.
अखिलेश यादव सांसद रहते सीएम बने थे
साल 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला. पार्टी ने युवा चेहरे के रूप में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री चुना. शपथ के समय वे कन्नौज से लोकसभा सांसद थे. बाद में उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा देकर विधान परिषद (MLC) के जरिए सदन की सदस्यता ली.
सीएम योगी सांसद रहते सीएम बने
2017 में जब भाजपा ने प्रचंड बहुमत हासिल किया, तब गोरखपुर से पांच बार के लोकसभा सांसद योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया. शपथ ग्रहण के समय वे राज्य सदन के सदस्य नहीं थे. बाद में उन्होंने विधान परिषद (MLC) की सदस्यता ग्रहण की. हालांकि, इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में वे सीधे गोरखपुर शहर सीट से लड़े, विधायक बने और दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली.
उत्तर प्रदेश की राजनीति का इतिहास बताता है कि सूबे की शीर्ष कुर्सी तक पहुंचने के लिए सीधे चुनाव मैदान में उतरना ही एकमात्र रास्ता नहीं रहा है. 2007 से 2017 के एक दशक तक तो यूपी में विधान परिषद (MLC) के रास्ते ही मुख्यमंत्री राजभवन तक पहुंचे हैं.