scorecardresearch
 

दोस्ती, दुश्मनी ETC... ट्रंप को कब-कब चुभे नेतन्याहू? दोस्ती में क्यों दिख रही दरार

डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच गाजा में युद्ध खत्म करने की समयसीमा, लेबनान में हमलों को बढ़ाना और युद्ध के बाद के खर्च पर मतभेद रहे हैं. हर बार ये नाराजगी सामने आई है.

Advertisement
X
2020 से अब तक करीब पांच बार ऐसी घटनाएं हुई हैं जब ट्रंप और नेतन्याहू आमने-सामने दिखे हैं. (Photo: ITG)
2020 से अब तक करीब पांच बार ऐसी घटनाएं हुई हैं जब ट्रंप और नेतन्याहू आमने-सामने दिखे हैं. (Photo: ITG)

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच के राजनीतिक रिश्तों को आज की जियो-पॉलिटिक्स में सबसे मजबूत माना जाता रहा है. ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान दोनों नेताओं ने मिलकर वैश्विक राजनीति की दिशा बदल दी थी. चाहे वह अमेरिकी दूतावास को यरूशलेम ट्रांसफर करना हो, गोलन हाइट्स पर इजरायल को मान्यता देना हो या फिर 'अब्राहम अकॉर्ड्स' पर साइन करना हो.  

बाहरी दुनिया के सामने दिखने वाली इस गहरी दोस्ती और एकजुटता के पीछे मिडिल ईस्टी की जंग ने दोनों नेताओं के बीच कई गहरे मतभेदों को भी जन्म दिया है. दोनों नेता इजरायल की आत्मरक्षा के अधिकार पर एकमत हैं. लेकिन ट्रंप की तत्काल क्षेत्रीय शांति वाली बात, समझौतों की नीति और नेतन्याहू की पूर्ण सैन्य विजय व घरेलू राजनीति को बचाने की जिद ने दोनों को कई मौकों पर आमने-सामने खड़ा किया है.

यह भी पढ़ें: 114 राफेल की नई डील में क्यों खास है? 22 तैयार होकर आएंगे, 90 भारत में बनेंगे, 50% स्वदेशी पुर्जे इस्तेमाल होंगे

आइए जानते हैं कि दोनों राजनीतिक दोस्त कब-कब एकदूसरे से मतभेद करते नजर आए... 

1. पहली दरार: 7 अक्टूबर का हमला और सुलेमानी की मौत का पुराना गुस्सा

युद्ध रणनीति को लेकर डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच मतभेदों की शुरुआत वास्तव में 7 अक्तूबर 2023 को हमास के आतंकी हमले के तुरंत बाद हो गई थी. जहां पूरी दुनिया इजरायल के प्रति संवेदना और एकजुटता दिखा रही थी, वहीं ट्रंप की पहली सार्वजनिक प्रतिक्रिया ने इजरायली सरकार को हैरान कर दिया था.

Advertisement

हमले के कुछ ही दिनों बाद फ्लोरिडा में एक रैली को संबोधित करते हुए ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से नेतन्याहू की आलोचना की और कहा कि इजरायली प्रधानमंत्री हमास के इस बड़े हमले के लिए तैयार नहीं थे. यह इजरायल की बड़ी खुफिया विफलता थी. इसी भाषण में ट्रंप ने एक कदम आगे बढ़ते हुए लेबनान के हिंसक संगठन हिजबुल्लाह को बहुत समझदार कह दिया, जिसकी इजरायली अधिकारियों ने तीखी आलोचना की.

Trump Netanyahu Dispute

ट्रंप की इस तीखी आलोचना के पीछे साल 2020 की एक पुरानी व्यक्तिगत कड़वाहट छिपी थी. ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से अपना गुस्सा जाहिर करते हुए बताया था कि 2020 में ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी को मारने के लिए अमेरिका ने जो ड्रोन स्ट्राइक की थी, नेतन्याहू अंतिम क्षण में उस ऑपरेशन से पीछे हट गए थे.

ट्रंप ने कहा था कि वह कभी नहीं भूल सकते कि नेतन्याहू ने ऐनवक्त पर उनका साथ छोड़ दिया था. इसी नाराजगी के कारण ट्रंप ने 7 अक्टूबर के बाद नेतन्याहू के युद्ध नेतृत्व को एक संकोची और राजनीतिक रूप से अवसरवादी नेता के रूप में देखा.

2. गाजा सीजफायक और युद्ध खत्म करने की समयसीमा पर विवाद

जैसे-जैसे गाजा में सैन्य अभियान लंबा खिंचता गया, ट्रंप और नेतन्याहू के बीच सबसे बड़ा मतभेद युद्ध को खत्म करने को लेकर दिखा. ट्रंप की मिडिल ईस्ट नीति का मुख्य लक्ष्य हमेशा से सऊदी अरब और इजरायल के बीच एक राजनयिक और रक्षा समझौता कराना रहा है. सऊदी अरब ने साफ कर दिया था कि जब तक गाजा में युद्ध जारी रहेगा और निर्दोष लोग मारे जाएंगे, तब तक ऐसा कोई समझौता संभव नहीं है.

Advertisement

यह भी पढ़ें: दिल्ली का कूलिंग सिस्टम खत्म! रात और दिन की गर्मी को लेकर ये रिपोर्ट डराने वाली

ट्रंप ने इजरायल पर युद्ध को जल्द खत्म करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया. उन्होंने सार्वजनिक बयानों में नेतन्याहू से कहा कि वे अपने युद्ध को जल्दी खत्म करें. काम पूरा करें. ट्रंप ने चेतावनी दी कि लंबा खिंचता युद्ध दुनिया भर में इजरायल की छवि और उसके जनसंपर्क को भारी नुकसान पहुंचा रहा है.

तनाव तब और बढ़ गया जब गाजा सीजफायर प्रस्तावों के दूसरे फेज की रूपरेखा पर बातचीत शुरू हुई. ट्रंप एक निश्चित संघर्षविराम, बंधकों की पूर्ण रिहाई और गाजा में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) व मिस्र जैसे उदारवादी अरब देशों के नेतृत्व में एक अंतरिम प्रशासनिक व्यवस्था बनाने के पक्ष में थे. 

इसके विपरीत, नेतन्याहू ने किसी भी ऐसे शांति प्रस्ताव को मानने से साफ इनकार कर दिया जिसमें हमास के पूर्ण खात्मे से पहले युद्ध को हमेशा के लिए रोकने की बात कही गई हो. नेतन्याहू जानते थे कि युद्ध समाप्त होते ही उनकी दक्षिणपंथी गठबंधन सरकार गिर जाएगी, क्योंकि उनके मंत्रियों ने युद्ध रोकने पर सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकी दी थी. यहां ट्रंप अपने अंतरराष्ट्रीय समझौतों के लिए शांति चाहते थे, जबकि नेतन्याहू अपने पॉलिटिकल कैरियर के लिए युद्ध जारी रखना चाहते थे.

Advertisement

Trump Netanyahu Dispute

3. गाजा के 70% हिस्से पर कंट्रोल और ट्रंप के शांति प्रयासों की अनदेखी

गाजा के भविष्य को लेकर यह मतभेद उस समय और खुलकर सामने आ गया जब नेतन्याहू ने इजरायल डिफेंस फोर्सेस (IDF) को गाजा के ७० प्रतिशत से अधिक हिस्से पर पूर्ण नियंत्रण हासिल करने का आदेश दिया. इसमें वे इलाके भी शामिल थे जिन पर पहले शांति वार्ताओं के दौरान चर्चा की जा रही थी.

नेतन्याहू के इस कदम को ट्रंप की टीम ने अमेरिका द्वारा मध्यस्थता किए जा रहे शांति प्रयासों को 'भटकाने और विफल करने' की कोशिश के रूप में देखा. ट्रंप चाहते थे कि इजरायल भविष्य में एक सुधरी हुई 'फिलिस्तीनी अथॉरिटी' को गाजा की जिम्मेदारी सौंपने की जिम्मेदारी निभाए. सुरक्षा गारंटियों के साथ टू-स्टेट सॉल्यूशन की दिशा में कदम बढ़ाए, ताकि सऊदी अरब के साथ ऐतिहासिक डील पूरी हो सके. 

नेतन्याहू ने अमेरिकी इच्छाओं के उलट घोषणा कर दी कि पूरे गाजा एन्क्लेव पर केवल इजरायल का सुरक्षा नियंत्रण रहेगा. वे किसी भी तरह के राजनयिक समझौते या फिलिस्तीनी राज्य की बात को सिरे से खारिज करते हैं.

यह भी पढ़ें: कांगो में इबोला से 321 बीमार, 48 की मौत, भारतीय कंपनी सहित 3 समूहों को वैक्सीन के लिए फंड जारी

4. लेबनान में युद्ध को बढ़ाना और बंद कमरों में ट्रंप की तीखी गाली-गलौज

Advertisement

दोनों नेताओं के बीच अब तक का सबसे उग्र और विस्फोटक विवाद गाजा को लेकर नहीं, बल्कि लेबनान में हिज्बुल्लाह के खिलाफ इजरायल द्वारा युद्ध के अचानक बढ़ाने को लेकर हुआ.

जब अमेरिका बैक-चैनल डिप्लोमेसी के जरिए लेबनान और ईरान के साथ संवेदनशील और व्यापक क्षेत्रीय सीजफायर समझौता फाइनल करने के करीब था, ठीक उसी समय नेतन्याहू ने बेरूत के दक्षिणी उपनगरों पर भीषण बमबारी और जमीनी हमले तेज करने का आदेश दे दिया. 

इस हमले के समय ने ट्रंप को बेहद नाराज कर दिया, क्योंकि इसके कारण ईरान ने अमेरिका के साथ चल रही सभी गुप्त शांति वार्ताओं को तुरंत निलंबित कर दिया. रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने की धमकी दे डाली, जिससे वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अचानक बढ़ गईं.

इस घटना से गुस्साए डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू को फोन किया. बंद कमरे की इस बातचीत में बेहद उग्र और अपशब्दों से भरी भाषा का इस्तेमाल किया. ट्रंप ने इजरायली प्रधानमंत्री पर चिल्लाते हुए सीधे शब्दों में पूछा कि तुम यह क्या बकवास कर रहे हो?. ट्रंप ने चेतावनी दी कि नेतन्याहू के एकतरफा फैसले सीधे तौर पर महाविनाशकारी जंग को रोकने के अमेरिकी प्रयासों को बर्बाद कर रहे हैं.

यह भी पढ़ें: रूस ने यूक्रेन पर 60 से ज्यादा मिसाइलों से किया डबल टैप अटैक, कीव में भारी तबाही

Advertisement

ट्रंप ने नेतन्याहू को उनके घरेलू भ्रष्टाचार के मुकदमों और कानूनी लड़ाइयों की याद दिलाते हुए यहां तक कहा कि अगर अमेरिका बिना शर्त समर्थन न दे, तो नेतन्याहू का राजनीतिक और कानूनी अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा. इस बेहद कड़े फोन कॉल के तुरंत बाद, ट्रंप ने सोशल मीडिया पर खुद ही यह घोषणा कर दी कि इजरायल और हिजबुल्लाह हमले कम करने पर सहमत हो गए हैं, जिससे नेतन्याहू को मजबूरन बैकफुट पर आना पड़ा.

5. युद्ध के बाद गाजा को दोबारा बनाने के खर्च पर असहमति

एक और महत्वपूर्ण मुद्दा जिस पर दोनों नेताओं के बीच तीखी असहमति रही है, वह है युद्ध के बाद तबाह हो चुके गाजा के पुनर्निर्माण पर आने वाला अरबों डॉलर का खर्च. ट्रंप की सोच हमेशा से व्यावसायिक और 'अमेरिका फर्स्ट' की रही है. ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया था कि अमेरिकी करदाताओं का पैसा गाजा के मलबे को साफ करने और वहां दोबारा इमारतें बनाने में खर्च नहीं किया जाएगा.

Trump Netanyahu Dispute

ट्रंप चाहते थे कि इजरायल इस तबाही की पूरी जिम्मेदारी ले या फिर खाड़ी के अमीर अरब देश इस पुनर्निर्माण का खर्च उठाएं. नेतन्याहू का मानना था कि चूंकि इजरायल यह युद्ध पूरी पश्चिमी सभ्यता को बचाने और आतंकवाद के खिलाफ लड़ रहा है, इसलिए अमेरिका और यूरोपीय देशों को गाजा के पुनर्निर्माण और उसकी सुरक्षा व्यवस्था को संभालने के लिए भारी वित्तीय सहायता देनी चाहिए. इस वित्तीय जिम्मेदारी को एक-दूसरे पर टालने की कोशिश ने दोनों नेताओं के बीच पर्दे के पीछे के तनाव को और बढ़ा दिया.

Advertisement

व्यावसायिक शांति बनाम पूरा जीतने की राजनीतिक जंग

डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच के ये सभी मतभेद यह साबित करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सबसे पक्के दिखने वाले गठबंधन भी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं और घरेलू राजनीति के दबाव में डगमगा सकते हैं. डोनाल्ड ट्रंप युद्ध को एक कड़े और व्यावहारिक बिजनेसमैन के नजरिए से देखते हैं. उनका मानना है कि युद्ध को पूरी ताकत से लड़ा जाए, लेकिन उसे तुरंत खत्म करके शांति समझौतों में बदला जाए ताकि अर्थव्यवस्था को फायदा हो और उनकी राजनीतिक साख बढ़े. 

इसके विपरीत, बेंजामिन नेतन्याहू के लिए यह युद्ध उनके अस्तित्व और राजनीतिक कैरियर से जुड़ा है; वे जानते हैं कि युद्ध लंबा खिंचने से ही वे 7 अक्टूबर की खुफिया विफलता के सवालों से बच सकते हैं. अपनी सत्ता बरकरार रख सकते हैं. यही वजह है कि जब भी युद्ध को रोकने या शांति की बात आती है. इन दोनों शक्तिशाली नेताओं के बीच की दोस्ती तीखे विवादों में बदल जाती है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement