एक तरफ सिनेमाघरों में अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार की फिल्म 'शक्ति' रिलीज होने की तैयारी कर रही थी. दूसरी तरफ फिल्म के प्रोड्यूसर मुशीर आलम की निजी जिंदगी में एक ऐसा तूफान आने वाला था, जिस पर खुद एक क्राइम थ्रिलर बन सकती थी. सफेद एंबेसडर कार, मुंबई के वर्ली का व्यस्ततम चौराहा, हथियारबंद बदमाश और 20 लाख रुपये की फिरौती. 20 लाख का हल्के में न लें. ये बात है 1982 की. आज से लगभग 45 साल पहले ये रकम करोडों की बैठती है.
लेकिन किडनैपर्स को अंदाजा नहीं था कि उनका शिकार आंखों पर पट्टी बंधे होने के बावजूद उनके खिलाफ सबसे बड़ा सुराग जुटा रहा है. आखिरकार शिकार उस फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज प्रोड्यूसर में से एक था. नाम था- मुशीर आलम.
'सफेद फिएट ने तेज़ी से ब्रेक लगाए. इसके पहले कि मुशीर आलम समझ पाते क्या हो रहा है. उस एम्बेसडर से तीन आदमी निकले, जिसने अभी अभी मुशीर आलम की कार को बीच में रोक लिया था. वे तेजी से कार की बढ़ें और उन्हें कार से बाहर खींच लिया.'
'इसके पहले कि मुशीर विरोध में एक शब्द भी बोल पाते, या मदद के लिए गुहार लगा पाते, उन्हें उस सफेद एम्बेसडर की पिछली सीट पर लाकर पटक दिया गया, जिसका इंजन अभी भी चल रहा था.'
बंबई फिल्म इंडस्ट्री के कद्दावर प्रोड्यूसर की किडनैपिंग हो चुकी थी. कुछ ही सेकेंड हुआ और एम्बेसडर वहां से उड़ चुकी थी.
मुशीर आलम के किडनैपिंग की इस दास्तान को मुंबई के सीनियर जर्नलिस्ट एस हुसैन जैदी ने अपनी किताब 'डोंगरी से दुबई तक' में लिखा है. ये किताब दाऊद इब्राहिम और बंबई क्राइम की किस्सागोई है.
एस हुसैन जैदी के अनुसार ये बॉलीवुड में माफिया का पदार्पण था. सितंबर 1982 की यह घटना बॉलीवुड और मुंबई अंडरवर्ल्ड के रिश्ते की शुरुआती बड़ी कहानियों में गिनी जाती है.
माफिया का फन कुचल दिया गया, शक्ति समाप्त नहीं हुई
विगत कुछ सालों में माफिया का फन भले ही कुचल दिया गया, लेकिन उसकी शक्ति समाप्त नहीं हुई है.
रविवार की शाम अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर चली गोलियां इस बात की तस्दीक करती है कि बॉलीवुड की जमीन माफिया के लिए बहुत जरखेज है.
अपराध के लिए जरखेज बॉलीवुड की जमीन
मुंबई की सड़कें, बाइक पर सवार शूटर, गोलियों की आवाज और निशाने पर बॉलीवुड का एक बड़ा नाम- टाइगर. 18 अक्टूबर 2026 को अभिनेता टाइगर श्रॉफ की कार पर हुई फायरिंग ने फिल्म इंडस्ट्री के 80-90 के दशक के खौफनाक दौर की यादें फिर ताजा कर दी हैं, जब फिल्म निर्माताओं से वसूली के लिए धमकियां दी जाती थीं और इनकार करने वालों पर फायर खोल दिया जाता था. या उन्हें उठा लिया जाता था.
फर्क सिर्फ इतना है कि उस दौर में पठान गैंग, दाऊद इब्राहिम की डी-कंपनी और उससे जुड़े गिरोहों का नाम सुर्खियों में रहता था, जबकि टाइगर के मामले में लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने जिम्मेदारी लेने का दावा किया है.
'शक्ति' ने ही मुशीर आलम को टारगेट बनाया
मुशीर आलम की किडनैपिंग को बंबई के कुख्यात गैंगस्टर दाऊद इब्राहिम ने अंजाम नहीं दिया था. बल्कि इसके पीछ हाथ था- दाऊद के कट्टर दुश्मन पठान गैंग का. तब इस गैंग के सरगना थे अमीरजादा और आलमजेब.
उस समय यह गिरोह दाऊद के भाई की हत्या समेत कई गैंगवार में शामिल था और उसे अपने अपराधी नेटवर्क को चलाने के लिए पैसों की जरूरत थी. फिल्म इंडस्ट्री के अंदर मौजूद संपर्कों के जरिए मुशीर आलम को निशाना बनाया गया.
लेकिन इस गैंग ने मुशीर आलम को क्यों किडनैप किया? इसक पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है.
पत्रकार एस हुसैन ज़ैदी के साथ हाल ही में हुए एक इंटरव्यू में मुंबई पुलिस के पूर्व एसीपी मधुकर ज़ेंडे ने इस रोमाचंक घटना का जिक्र किया है.
लेकिन इससे पहले इस केस के बैकग्राउंड को समझना जरूरी है.
दरअसल बॉलीवुड के इतिहास की सुपर डुपर हिट फिल्म 'शोले' के रिलीज होने के कुछ ही सालों बाद डायरेक्टर रमेश सिप्पी एक और ब्लॉकबस्टर लेकर आए. फिल्म का नाम था 'शक्ति'. ये वो फिल्म थी जहां पर पर्दे पर अपने समय के दो दिग्गज एक साथ स्क्रीन शेयर कर रहे थे. अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार. इसी फिल्म को प्रोड्यूस कर रहे थे मुशीर आलम. जाहिर है मुशीर आलम कोई सामान्य शख्स नहीं था. वो बॉलीवुड का मोटा आसामी था.
पूर्व एसीपी मधुकर ज़ेंडे ने इंटरव्यू में कहा था, "फिल्म 'शक्ति' रिलीज़ होने वाली थी, और इसके प्रोड्यूसर यानी कि मुशीर आलम के पास हरीश सुगंध नाम का एक मैनेजर था. लंबी लंबी हांकने में उसका कोई जोड़ नहीं था. वो अक्सर कहा करता था कि उसके पास 20 लाख रुपये ब्लैक मनी के रुप में है.
ये पूरा इंटरव्यू इंडियन एक्सप्रेस में छपा है.
यह बात पठान गैंग तक पहुंच गई, इसी गैंग ने सितबंर 1982 से कुछ दिन पहले दाऊद के भाई की हत्या की थी.
किडनैपिंग के बाद मुशीर आलम का क्या हुआ?
चलते हैं वर्ली का वो चौक जहां से मुशीर आलम को लेकर वो एम्बेसडर कार भागी थी.
एस हुसैन ज़ैदी अपनी किताब 'डोंगरी से दुबई तक' में लिखते हैं, "हथियारबंद बदमाशों ने मुशीर के आंख पर सफेद पट्टी बांध दी गई और अपहरणकर्ता उनके कार को पीछे छोड़कर भाग गए. बंबई के अब तक की सबसे बड़ी अपहरण के इस वारदात में एक मिनट से भी कम का वक्त लगा."
मुशीर आलम के लिए अगले कुछ घंटे बेहद तकलीफ़देह और असहनीय रहे. पठान गैंग के गुंडों ने मशीर को धमकाया, गालियां दी और तमाचे मारे.
एस हुसैन ज़ैदी लिखते हैं, "किडनैपिंग के बाद मुशीर ने पाया कि शक्ति ने जो बिजनेस किया था उसकी खबर किडनैपर्स को थी. सरगना अमीरजादा ने कहा- हमें सिर्फ पच्चीस लाख चाहिए, उसका अंदाज शालीन था. किडनैपर्स ने मुशीर से जबरन उसके साले और पार्टनर रियाज को फोन करवाया. उन्हें कहा गया कि वे जितनी भी रकम जुगाड़ कर सकते हैं करें और तय जगह पर पहुंच जाएं."
जाहिर है कि किडनैपर्स ने उन्हें कह दिया था कि वे पुलिस को बीच में न लाएं.
रिपोर्ट के अनुसार रियाज और हरीश 2.80 लाख जमाकर पाए और वे तय ठिकाने पर पहुंचे. मुशीर आलम को रिहा कर दिया गया.
आंखों पर पट्टी थी, लेकिन दिमाग खुला था
किडनैपिंग के बाद मुशीर आलम की आंखों पर भले ही पट्टी थी. लेकिन वे थे काफी अलर्ट.
मुशीर ने अपहरण के दौरान कई छोटी-छोटी बातें गौर से याद रखीं. मसलन किडनैपिंग के बाद ठिकाने तक पहुंचने में कितना समय लगा. रास्ते में कैसी बदबू आई, सीढ़ियां किस तरफ थीं, कितने कदम चलना पड़ा और आसपास कैसी आवाजें सुनाई दे रही थीं. उन्हें बच्चों के सामूहिक रूप से कुरान पढ़ने की आवाज भी याद थी.
24 सितंबर को दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार मुशीर आलम और उनके साथी रियाज को लेकर पुलिस कमिश्नर के दफ्तर पहुंचे. दिलीप कुमार चाहते थे कि अपहरण के मामले की गंभीरता से जांच हो. लेकिन मुशीर आलम इसे तूल नहीं देना चाह रहे थे. हालांकि बाद में इसाक बागवान नाम के पुलिस अधिकारी ने इस घटना का खुलासा कर किडनैपर्स को पकड़ लिया.