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Inside Story: अंबानी का नाम लेने से एलॉन मस्क का काम हो जाएगा? जानिए असली खेल है क्या...

Elon Musk Controversy: स्टारलिंक की भारत में एंट्री का मामला फंसा हुआ है और अब तो इसपर राजनीति भी होने लगी है. कांग्रेस के सीनियर नेता राहुल गांधी ने एलॉन मस्क का समर्थन कर दिया है. आखिर क्या है इस विवाद का असली वजह?

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मुकेश अंबानी का नाम लेकर क्या साबित करना चाहते हैं एलॉन मस्क? (Photo: ITG)
मुकेश अंबानी का नाम लेकर क्या साबित करना चाहते हैं एलॉन मस्क? (Photo: ITG)

दुनिया के लिए भारत एक उभरता हुआ बड़ा बाजार है, हर कोई यहां अपना माल बेचना चाहता है. दुनिया के सबसे अमीर उद्योगपति और स्टारलिंक के मालिक एलॉन मस्क की भी नजर भारतीय बाजार पर है. मस्क जल्द से जल्द भारतीय बाजार में अपनी पकड़ बनाने चाहते हैं. लेकिन एलॉन मस्‍क की कंपनी स्‍टारलिंक को अनुमति मिलने में कानूनी अड़चनें आ रही हैं, क्‍योंकि भारत सरकार नियम और कानून के हिसाब से ही विदेशी कंपनियों को पैर पसारने की देती है. 

दरअसल, स्टारलिंक की भारत में एंट्री का मामला फंसा हुआ है और अब तो इसपर राजनीति भी होने लगी है. कांग्रेस के सीनियर नेता राहुल गांधी ने एलॉन मस्क का समर्थन कर दिया है. एलॉन मस्क भारत सरकार पर पक्षपात का आरोप लगा रहे हैं, और राहुल गांधी मस्क के आरोपों को हवा दे रहे हैं. 

एलॉन मस्क पर राजनीति तेज

एलॉन मस्क ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर आरोप लगाते हुए लिखा, 'कुछ पूंजीपति भारत में स्टारलिंक की सेवाओं को ब्लॉक कर रहे हैं ताकि अपना एकाधिकार बनाए रख सकें'. उन्होंने सवाल उठाया कि 165 से अधिक देशों में स्वीकृत स्टारलिंक को भारत में सभी नियमों का पालन करने के बाद भी अंतिम मंजूरी क्यों नहीं मिल रही है? 

वहीं सरकार ने मस्क के आरोपों को बेबुनियाद और भ्रामक करार दिया है. सरकार का कहना है कि भारत की नियामक व्यवस्था पूरी तरह से निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण है. सुरक्षा मूल्यांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सभी कंपनियों को समान रूप से स्पेक्ट्रम आवंटित किया जाएगा. 

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अब सवाल उठता है कि एलॉन मस्क का असली दर्द क्या है? एलॉन मस्क और भारत सरकार के बीच स्टारलिंक, टेस्ला और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' को लेकर मतभेद और विवाद रहे हैं. मस्क की लंबे समय से मांग रही है कि भारत में टेस्ला कारों पर सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) पर लगने वाली 70% से 100% तक की भारी इम्पोर्ट ड्यूटी कम करे. लेकिन सरकार की शर्त है कि वे भारत में ही मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाएं. जिसपर मस्क ने अभी तक भारत में बड़ा निवेश या फैक्ट्री लगाने की अंतिम प्रतिबद्धता नहीं जताई है. 

'X' को लेकर भी कई बार टकराव स्थिति सामने आई है, मस्क खुद को फ्री स्पीच एब्सोल्यूटिस्ट कहते हैं, जबकि भारत सरकार का तर्क है कि देश की संप्रभुता, कानून-व्यवस्था और गलत सूचना रोकने के लिए आईटी नियमों का पालन करना अनिवार्य है. केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी स्पष्ट किया है कि लाइसेंसिंग प्रक्रिया सभी कंपनियों (जियो, एयरटेल, स्टारलिंक) के लिए समान और गैर-भेदभावपूर्ण है. 

और अब स्टारलिंक की भारत में एंट्री और सैटेलाइट इंटरनेट के लिए स्पेक्ट्रम आवंटन का मुद्दा है, जो भारतीय दूरसंचार क्षेत्र में सबसे बड़े व्यावसायिक और नीतिगत विवादों में से एक रहा है. इस मामले में एक तरफ एलॉन मस्क की स्टारलिंक है और दूसरी तरफ भारत के घरेलू टेलीकॉम दिग्गज मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो और सुनील भारती मित्तल की भारती एयरटेल है. 

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विवाद की वजह क्या है?
एलॉन मस्क का तर्क था कि सैटेलाइट स्पेक्ट्रम एक प्राकृतिक और साझा संसाधन है, जिसे नीलाम नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने वैश्विक मानकों (ITU नियमों) का हवाला देते हुए मांग की थी कि सरकार कंपनियों को बिना नीलामी के निश्चित शुल्क पर सीधे स्पेक्ट्रम आवंटित करे. 

जबकि शुरुआत में रिलायंस जियो और एयरटेल ने मांग की थी कि सैटेलाइट स्पेक्ट्रम की भी 4G/5G की तरह नीलामी होनी चाहिए. उनका तर्क था कि अगर विदेशी कंपनियों को बिना नीलामी के सस्ता स्पेक्ट्रम मिल गया, तो वे भारतीय कंपनियों को अनुचित मूल्य प्रतिस्पर्धा में पछाड़ देंगी. हालांकि दूरसंचार अधिनियम 2023 के तहत भारत सरकार ने वैश्विक नियमों को अपनाते हुए प्रशासकीय आवंटन का ही रास्ता चुना, यानी स्पेक्ट्रम की नीलामी नहीं होगी. स्पेक्ट्रम के दाम TRAI की ओर से तय किए जा रहे हैं. 

स्टारलिंक बनाम रिलायंस जियो और एयरटेल
लेकिन अब एलॉन मस्क ने अपने 'X' पोस्ट में अंबानी का नाम लिखा है. क्या सही में अंबानी स्टारलिंक को आने से रोक रहे हैं? आइए इसके तह तक जाते हैं. दरअसल यह लड़ाई केवल टेक्नोलॉजी की नहीं, बल्कि भारत के विशाल डेटा और ब्रॉडबैंड मार्केट में हिस्सेदारी की है. भारत के ग्रामीण बाजार में सेंध लगाने के लिए स्टारलिंक को रिलायंस जियो और एयरटेल के विशाल ग्राउंड-नेटवर्क और किफायती कीमतों से मुकाबला करना होगा.

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सुरक्षा और डेटा लोकलाइजेशन नियम 
गृह मंत्रालय और रक्षा एजेंसियों की शर्त है कि भारतीय उपयोगकर्ताओं का सारा डेटा भारत के भीतर ही प्रोसेस और स्टोर होना चाहिए. स्टारलिंक के इंटर-सैटेलाइट लेजर लिंक्स के कारण भारतीय एजेंसियां कानूनी निगरानी को लेकर सख्त सुरक्षा समीक्षा कर रही हैं. सरकारी मापदंड के अनुसार स्टारलिंक को भारत में 20 स्थानीय गेटवे स्टेशन स्थापित करना है, ताकि किसी आपात स्थिति में ट्रैफिक को मॉनिटर या ब्लॉक किया जा सके.

हालांकि स्टारलिंक के आने पहाड़ी इलाकों, उत्तर-पूर्व के राज्यों, अंडमान और लक्षद्वीप जैसे द्वीपों में जहां फाइबर या मोबाइल टॉवर नहीं पहुंच सकते, वहां हाई-स्पीड सैटेलाइट ब्रॉडबैंड काम करेगा.
 

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