जीत बड़ी है, क्योंकि सीधा मुकाबला बीजेपी से था, और बीजेपी के ही गढ़ में था. 'स्कूल बैग' लटकाए प्रशांत किशोर ने बांकीपुर में बीजेपी का किला ध्वस्त कर दिया है. 35 साल से बांकीपुर में बीजेपी का एकछत्र राज था. इस जीत के साथ ही लोकतंत्र की पाठशाला में प्रशांत किशोर की एंट्री हो चुकी है.
वैसे तो बिहार में 243 विधायक हैं, उनमें से एक प्रशांत किशोर हैं. लेकिन ये जीत जन-सुराज पार्टी के लिए जरूरी थी, उससे ज्यादा प्रशांत किशोर के लिए जरूरी थी. क्योंकि पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में जन-सुराज को एक भी सीट नहीं मिली थी. बड़ी हार हुई थी. सवालों के घेरे में प्रशांत किशोर थे. क्योंकि प्रशांत किशोर बड़ी-बड़ी पार्टियों को चुनाव जीतने का मंत्र देते आए हैं. लेकिन उनकी सारी रणनीति बिहार के विधानसभा चुनाव में फेल होती नजर आई.
बिहार में जन-सुराज पार्टी की करारी हार के बाद प्रशांत किशोर ने कहा था- संघर्ष जारी रहेगा. हम बिहार छोड़कर जाने वाले नहीं हैं. दोगुनी मेहनत करेंगे. इसके बाद बांकीपुर में मौका मिला, सीट हाई-प्रोफाइल थी. प्रशांत किशोर समझ गए, ये मौका है, जिसे भुनाया जा सकता है. अगर यहां बीजेपी हारती है, तो संदेश पूरे बिहार में जाएगा. फिर उन्होंने बांकीपुर की गली-गली छान मारी, बारिश हो या कीचड़ आगे बढ़ते रहे, एक-एक मतदाता तक पहुंचने की रणनीति बनाई गई. चुनावी सभाओं में भी भीड़ उमड़ रही थी. हालांकि वोटिंग के दिन भीड़ कम थी, मतदान प्रतिशत गिर गया. लेकिन जिन्होंने प्रशांत किशोर को जिताने का फैसले कर लिया था, वो मतदान केंद्र तक पहुंच गए, और जीत का सेहरा प्रशांत किशोर के सिर बांध दिया.
लेकिन अब सवाल ये है कि इस जीत के बाद क्या प्रशांत किशोर महज एक विधायक बनकर रह जाएंगे, या फिर नए प्लान के साथ बिहार में तहलका मचाने के लिए उतर जाएंगे. वैसे तो अभी बिहार में विधानसभा चुनाव होने में काफी लंबा वक्त है.
बता दें, पिछले साल विधानसभा चुनाव से पहले प्रशांत किशोर बिहार के लगभग हर जिले, प्रखंड और पंचायतों तक पहुंचे थे, वो भी पैदल. लोग उन्हें भूले नहीं हैं. इस पदयात्रा के दौरान उन्होंने बिहार के सामाजिक और राजनीतिक धरातल को बहुत करीब से समझा. लोग भी उनके बारे में चर्चा करते हैं, वोट भले ही उन्हें नहीं दिए, लेकिन बिहार में जब आम लोगों के बीच एक नई राजनीति की बात होती है, तो उसके केंद्र में प्रशांत किशोर होते हैं.
प्रशांत किशोर का अगला कदम क्या हो सकता है?
अगर विधानसभा चुनाव को छोड़ दें, तो जन-सुराज पार्टी का पहला लक्ष्य बांकीपुर में चुनाव जीतना था. जो कि पार्टी हासिल कर चुकी है. अब जब विधानसभा में प्रशांत किशोर पहुंचेंगे, और अपनी योग्यता का परिचय देंगे. अपनी बातों से बिहार के जन-जन तक पहुंचने की कोशिश करेंगे. उन्हें पता है कि बिहार की जनता की नजर उनपर होगी. सीधे सरकार से सवाल पूछेंगे, ऐसे सवाल पूछेंगे, जिसके बारे में वो लगातार कहते रहे हैं. यानी विधानसभा में एक अलग अंदाज में प्रशांत किशोर दिखने वाले हैं. वे हवा-हवाई वादों की जगह आंकड़ों के साथ सरकार को घेरने की कोशिश करेंगे.
वैसे तो विपक्ष में आरजेडी है, लेकिन प्रशांत किशोर की अब नई रणनीति होगी, कि विपक्ष की भूमिका में आरजेडी से ज्यादा चर्चा जन-सुराज पार्टी की हो.
प्रशांत किशोर हमेशा बिहार में राजनीतिक संरचना बदलने की बात करते हैं. अभी तक बिहार में जाति आधारित राजनीति का बोलबाला रहा है. यादव और मुस्लिम वोटर्स पर आरजेडी की पकड़ है. बीजेपी और जेडीयू अगड़ी, ओबीसी और ईबीसी वोटर्स को अपना मानती हैं. वोट पैटर्न भी कुछ इसी तरह का रहा है. लेकिन PK का मुख्य ध्यान युवा और उन वर्गों पर होगा, जो कि राजनीतिक रूप से प्रतिनिधित्व से वंचित महसूस करते हैं. वो हमेशा कहते हैं कि मौजूदा पार्टियां जाति की राजनीति करती हैं. वो शिक्षा और रोजगार की राजनीति करने आए हैं.
ये सच है कि बिहार में करीब तीन दशक से लालू बनाम नीतीश की राजनीति हुई है, PK का अगला प्लान होगा कि वे बिहार के लोगों को शिक्षा, रोजगार, पलायन और कृषि उद्योग जैसे विषयों पर सोचने के लिए मजबूर करें. सबसे पहले वो बिहार में विकल्प की कमी वाली सोच को खत्म करना चाहते हैं.
प्रशांत किशोर लगातार मुस्लिम समुदाय से यह कहते आ रहे हैं कि RJD ने आपका इस्तेमाल केवल भाजपा का डर दिखाकर वोट बैंक की तरह किया है, लेकिन आपको भागीदारी नहीं दी. अगर जन-सुराज मुस्लिम बहुल इलाकों में मजबूत होती है, तो RJD का कोर वोट शेयर कट सकता है. तेजस्वी यादव के 'नौकरी' वाले नैरेटिव का मुकाबला करने के लिए प्रशांत किशोर के पास पलायन और बिहार में ही रोजगार पैदा करने का ठोस विजन है, जो पढ़े-लिखे युवाओं को आकर्षित करता है.
नीतीश कुमार का 'सुशासन' का वोट
JDU का मुख्य वोट बैंक वे लोग हैं, जो नीतीश कुमार के सुशासन और गैर-लालू विकल्प के पक्षधर रहे हैं. लेकिन अब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री नहीं हैं. लोगों में उनकी अभी भी लोकप्रियता है, जिसे प्रशांत किशोर इमोशनली कैश करना चाहेंगे, ऐसे वोटर्स को अपने पाले में लाने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे.
भारतीय जनता पार्टी के लिए भी झटका
बांकीपुर (पटना) में बीजेपी करीब 35 साल से जीतती आ रही थी, इस शहरी सीट पर शिक्षित और अगड़ी जाति के ज्यादा वोटर्स हैं. PK ने इस सीट को बीजेपी ने छीन लिया है. मैसेज पूरे राज्य में गया है. चुनौती बीजेपी के लिए बढ़ेगी, क्योंकि अगड़ी जातियों में बीजेपी की मजबूत पकड़ है, और प्रशांत किशोर ने सेंधमारी की शुरुआत कर दी है.
पंचायत स्तर तक मजबूत नेटवर्क
पदयात्रा के दौरान प्रशांत किशोर ने लाखों कार्यकर्ताओं और समर्थकों का एक मजबूत डेटाबेस और नेटवर्क तैयार किया है. अब वे इस नेटवर्क को एक स्थाई राजनीतिक और सामाजिक संगठन में बदलेंगे, जो केवल चुनाव के समय सक्रिय न होकर पूरे 5 साल जनता के मुद्दों पर आंदोलन करेगा. वे परंपरागत नेताओं की जगह डॉक्टरों, शिक्षकों, पूर्व अधिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को चुनावी मैदान में उतारने का प्रयोग कर रहे हैं. जिसे एक विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है.
मालूम हो कि प्रशांत किशोर खुद बड़े राजनीतिक रणनीतिकार रहे हैं, उन्होंने साल 2014 में नरेंद्र मोदी, 2015 में नीतीश-लालू महागठबंधन, 2021 में ममता बनर्जी और एमके स्टालिन के लिए रणनीतियां बनाई हैं. वो बखूबी जानते हैं कि किस पार्टी की क्या मजबूती है और क्या कमजोरी.