देश के तीन राज्यों की तीन विधानसभा उपचुनाव के नतीजे सोमवार को घोषित हो गए, जिसमें बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर बीजेपी को सबसे बड़ा झटका लगा है. जन सुराज पार्टी के प्रमुख प्रशांत किशोर ने बीजेपी उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को 19,000 से ज़्यादा वोटों के अंतर से हराकर जीत हासिल की. आरजेडी की उम्मीदवार रेखा गुप्ता तीसरे नंबर पर रही.
बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे बीजेपी के लिए खास तौर पर निराशाजनक होने की तीन वजहें हैं. यह सीट बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफे से खाली की थी, जिन्हें बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था. दूसरी, यह सीट 1995 से बीजेपी के पास थी. तीसरी वजह बीजेपी को सत्ता में रहते हुए उपचुनाव में हार मिली.
प्रशांत किशोर का यह पहला चुनाव था, उनकी जीत जन सुराज पार्टी की भी पहली जीत है, जिसकी बुनियाद नवंबर 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव में रखी गई थी. नवंबर 2025 और 30 जुलाई 2026 के बीच के आठ महीनों में ऐसा क्या बदला कि बांकीपुर सीट पर हुए उपचुनाव में पीके ने बीजेपी के सबसे मजबूत दुर्ग को ध्वस्त कर दिया. नवंबर के विधानसभा चुनावों में नितिन नवीन ने यह सीट लगभग 52,000 वोटों के अंतर से जीती थी, लेकिन आठ महीने के बाद 19000 वोटों से हार गई.
सम्राट चौधरी पहली परिक्षा में हुए फेल
बिहार में बीजेपी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बांकीपुर पहला उपचुनाव था. इसीलिए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व के लिए किसी जनमत संग्रह से कम नहीं था. बिहार में सीएम का पद संभालने के बाद बीजेपी के लिए यह पहली चुनावी परीक्षा थी. सम्राट चौधरी ने अप्रैल में राज्य के पहले बीजेपी मुख्यमंत्री के तौर पर कार्यभार संभाला. उन्होंने जेडीयू के दिग्गज नेता नीतीश कुमार की जगह ली, जिनका लगभग दो दशकों तक बिहार की राजनीति पर दबदबा रहा था.
प्रशांत किशोर ने इस मुकाबले को अपने और सम्राट चौधरी के बीच सीधी लड़ाई के तौर पर पेश करने की कोशिश किया. उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान, 'जन सुराज' के संस्थापक ने पीके ने सम्राट चौधरी पर कथित आपराधिक मामलों और शैक्षणिक योग्यता को लेकर बार-बार निशाना साधा. इससे एक सामान्य उपचुनाव माने जा रहे चुनाव को बीजेपी के बिहार में नए चेहरे के लिए एक हाई-स्टेक (बड़े दांव वाले) राजनीतिक मुकाबले में बदल दिया.
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बांकीपुर उपचुनाव जीतने के बाद पीके के बयान में भी यही बातें दिखीं. पीके ने कहा, 'बांकीपुर की जनता ने बीजेपी के नेतृत्व को एक स्पष्ट संदेश दिया है. कृपया बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर किसी अच्छे व्यक्ति को नियुक्त करें.' पीके ने कहा कि अगर बीजेपी सम्राट चौधरी की जगह कुशवाहा समुदाय के किसी दूसरे नेता को लाना चाहती है, तो यह पूरी तरह से उनका फैसला है. हमें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन जिसे भी चुना जाए,वह कुशवाहा समुदाय का एक सक्षम और ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए.'
30 साल की सत्ता-विरोधी लहर
बांकीपुर विधानसभा सीट 20 साल तक नितिन नवीन के पास रही, उससे पहले, यह सीट दो कार्यकाल तक उनके पिता, नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा के पास थी. 1995 से यह सीट नितिन नवीन के परिवार के पास रही है और यहां सत्ता-विरोधी लहर (एंटी-इनकंबेंसी) की भावना काफी मजबूत थी,
वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने कहा कि बांकीपुर बीजेपी के लिए कोई वैचारिक रूप से सुरक्षित सीट नहीं थी. यह नितिन नवीन परिवार की पारिवारिक जागीर थी, बांकीपुर में दो शख्सियतों के बीच मुकाबला हुआ. एक तरफ दिग्गज प्रशांत किशोर थे तो दूसरी तरफ से गुमनाम चेहरा नीरज कुमार सिन्हा थे. एक नाकाम मुख्यमंत्री ने 'जन सुराज' के लिए जीत हासिल करना आसान बना दिया. इस बिना-मुकाबले वाली लड़ाई से कोई बड़ा सबक नहीं मिलता.
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प्रशांत किशोर ने स्थानीय विकास के मुद्दों पर प्रचार किया है. उन्होंने कहा कि अगले कुछ महीनों में साफ़ बदलाव दिखेंगे. हम बांकीपुर को बेहतर बनाने के लिए हर संभव कोशिश करेंगे. उन्होंने कहा कि अगले दो-तीन महीनों में आपको बदलाव दिखने लगेंगे. मैं बड़े-बड़े वादे नहीं करना चाहता. मेरे विधायक बनने से बांकीपुर रातों-रात बेंगलुरु नहीं बन जाएगा. लेकिन अगले दो-तीन महीनों में आपको यहां निश्चित रूप से कुछ सुधार दिखेंगे.
आरजेडी के वोटबैंक के बंटवारा
प्रशांत किशोर के पक्ष में काम करने वाला एक अहम कारण बांकीपुर उपचुनाव पर आरजेडी का पारंपरिक मुस्लिम-यादव (M-Y) वोटबैंक में बंटवारा था, जिसे लंबे समय से आरजेडी की चुनावी रीढ़ माना जाता रहा है.राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी ने इंडिया टुडे ग्रुप से बात करते हुए कहा कि उन्हें लगता है कि मुस्लिम वोटरों का एक वर्ग, जिनका मुख्य मकसद हमेशा से बीजेपी को हराना रहा है, हो सकता है कि बांकीपुर में अपनी रणनीति बदल ली हो.
अमिताभ तिवारी ने बताया कि ऐसा लगा कि उनका पारंपरिक मुस्लिम-यादव सपोर्ट बेस बंट गया. मुस्लिम वोटर, जो हमेशा से BJP का विरोध करते रहे हैं, हो सकता है कि उन्होंने प्रशांत किशोर को बीजेपी को हराने के लिए सबसे मज़बूत दावेदार के तौर पर देखा हो. आरजेडी का समर्थन करने के बजाय जन सुराज की ओर चले गए हों. ऐसा लगता है कि इसी वजह से RJD तीसरे स्थान पर खिसक गई.
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उपचुनाव नतीजों ने इस तर्क को कुछ हद तक सही साबित किया। मुख्य दावेदार के तौर पर उभरने के बजाय, RJD बहुत पीछे तीसरे स्थान पर रही. आरजेडी उम्मीदवार रेखा कुमारी को सिर्फ़ 14,000 वोट मिले और जमानत जब्त हो गए.
अमिताभ तिवारी ने तर्क दिया कि यह नतीजा आरजेडी के राजनीतिक भविष्य को लेकर बड़ी चिंताओं को भी बढ़ाता है. उन्होंने कहा कि पार्टी आज एक चौराहे पर खड़ी है. उन्होंने निराशाजनक चुनावी प्रदर्शन, परिवार के अंदरूनी कलह और तेजस्वी यादव के नेतृत्व और संगठन से जुड़ाव पर लगातार उठ रहे सवालों की ओर इशारा किया. उन्होंने कहा कि अगर यह ट्रेंड जारी रहता है, तो जन सुराज धीरे-धीरे विपक्ष की उस जगह पर कब्ज़ा कर सकता है जो कभी RJD के पास थी.
सवर्ण जातियों का बीजेपी से मोहभंग
राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी ने कहा कि बांकीपुर सीट पर प्रशांत किशोर की जीत के पीछे एक कारण बीजेपी के पारंपरिक ऊंची जाति के सपोर्ट बेस में सेंधमारी रही. उन्होंने बताया कि ऐसे संकेत थे कि ऊंची जाति के वोटरों के कुछ वर्ग, खासकर ब्राह्मण और कायस्थ पिछले चुनावों की तरह एकजुट होकर बीजेपी को वोट नहीं दिया. इसकी वजह प्रशांत किशोर खुद ब्राह्मण समाज से हैं, इसलिए ऐसा लगता है कि जन सुराज ने इन वोटरों के एक वर्ग को अपनी ओर आकर्षित किया.
बांकीपुर में यह बात काफ़ी मायने रखती है, वोटरों में से एक-चौथाई से ज़्यादा लोग कायस्थ समुदाय से हैं, और भूमिहार भी एक असरदार गुट हैं. बीजेपी के ख़िलाफ़ रणनीतिक वोटिंग के साथ इसमें थोड़ा भी बदलाव होता, तो नतीजे पर काफ़ी असर पड़ सकता था.
इंडिया टुडे की पत्रकार मारिया शकील ने कहा कि बांकीपुर उपचुनाव के फ़ैसले का एक बड़ा राजनीतिक संदेश है. उन्होंने अपने X पर लिखा कि प्रशांत किशोर की बांकीपुर जीत सिर्फ़ एक उपचुनाव का नतीजा नहीं है. बीजेपी के लिए, नितिन नबीन के गढ़ को हारना, वो भी उम्मीदवार की गड़बड़ी और कम वोटिंग 34% के बाद, यह दिखाता है कि सवर्ण जातियों के पक्के वोट अब हमेशा के लिए उनके साथ नहीं है.