
बिहार की राजनीति के समीकरणों को दिखाती हुई एक सीरीज आई थी. नाम था 'महारानी'. इसका एक डॉयलॉग सोमवार की शाम पटना के चौक चौराहों पर होने वाली चर्चाओं के लिए एकदम फिट बैठता है. डायलॉग था, "बिहार की एक खासियत है. जब-जब आपको लगेगा कि आप बिहार की राजनीति को समझ गए हैं, बिहार आपको झटका देता है."
3 अगस्त 2026. बिहार ने ऐसा ही झटका दिया. ज्यादा दिन नहीं हुए हैं. बिहार ने बीजेपी को झोली भर-भरकर वोट दिया था. NDA को 202 सीटें मिलीं. ये मात्र 9 महीने पहले की बात है. लेकिन सोमवार को पाटलिपुत्र की राजनीति में एक ऐसा दिन दर्ज हुआ जिसने सत्ता के गलियारों में हलचल मचा दी. पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर वह हुआ, जिसकी कल्पना भी बीजेपी के रणनीतिकारों ने नहीं की होगी. जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भारतीय जनता पार्टी के करीब तीन दशक पुराने गढ़ को ढहा दिया. चुनावी रणनीतिकार के तौर पर नेताओं को जीत का रास्ता दिखाने वाले 'पीके' ने पहली बार खुद चुनावी मैदान में कदम रखा और अपने पहले ही मुकाबले में बीजेपी को सीधी मात दे दी.
यह सिर्फ एक उपचुनाव की हार-जीत नहीं थी. यह उस राजनीतिक संदेश का ऐलान था कि बिहार में अब मुकाबला पुराने समीकरणों से आगे बढ़ चुका है. बांकीपुर का जनादेश बता रहा था कि राज्य की राजनीति में एक नया खिलाड़ी सिर्फ दस्तक नहीं दे रहा, बल्कि सत्ता की बिसात पर अपनी जगह भी बना रहा है.
राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट बीजेपी ने गंवाई
ध्यान रखिए. पीके ने कोई सामान्य सीट नहीं जीती है. ये बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की सीट है. नितिन नवीन ने पांच बार ये सीट जीती है. उनसे पहले उनके पिता इस सीट से जीत चुके हैं. कहना यह है कि बीजेपी का ये किला 30 साल पुराना था. पटना शहर में मौजूद इस सीट पर शहरी कायस्थ और बनिया वोटरों के दम पर बीजेपी इस सीट पर बड़े गौरव के साथ दावा करती थी. उसे अपने शहरी मतदाता वर्ग पर भरोसा था, लेकिन बीजेपी इसमें पड़ी दरार को नहीं देख पाई.
लालू-राबड़ी लहर में भी खिला था कमल
बीजेपी ये सीट 1995 से जीतती आई है. यहां 1995 में नितिन नवीन के पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने लालू-राबड़ी लहर में जीत दर्ज की थी. वे 2000 और 2005 में भी जीते. 2005 में नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा के निधन के बाद इस सीट पर नितिन नवीन की लॉन्चिंग हुई. 2006 में वे पहली बार इस सीट पर जीते. इसके बाद वे 2025 तक लगातार इस सीट पर जीतते आ रहे हैं.
लेकिन बांकीपुर उपचुनाव में पीके ने सारी बनी-बनाई धारणाएं तोड़ थी और बीजेपी को शिकस्त स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया.
बांकीपुर में चुनाव प्रचार के दौरान नितिन नवीन ने कहा था, 'जो समर्थन जनता का दिख रहा है. वो निश्चित रूप से तीन अगस्त को फिर से बीजेपी का कमल खिलाएगी.' लेकिन बांकीपुर का मिजाज उप चुनाव की घोषणा के बाद ही नित नवीन पहचान तलाश रहा था और इस मुहिम में पीके सबसे आगे रहे.
2025 के चुनाव में नितिन नवीन बांकीपुर से जीते थे. लेकिन जब बीजेपी ने अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष खोजना शुरू किया तो मोदी-शाह की नजरें नितिन नवीन पर जा टिकीं. नितिन नवीन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और राज्यसभा पहुंच गए. अब ये सीट खाली थी.
उपचुनाव में भाजपा ने युवा नेता नीरज कुमार सिन्हा को मैदान में उतारा. आरजेडी ने रेखा कुमारी को टिकट दिया. लेकिन मैदान में सबसे बड़ा सरप्राइज जन सुराज के प्रशांत किशोर ने दिया. कुछ ही महीने पहले बिहार विधानसभा चुनाव में भयानक हार झेलने वाली पीके ने एक इस सीट पर अपनी दमदार दावेदारी झोंक दी.
टिकट बंटवारे का लचर इंतजाम
पीके जितनी मजबूती के साथ इस सीट पर उतरे, बीजेपी उतनी ही लचर इंतजाम के साथ आई.
बीजेपी ने पहले नितिन नवीन के करीबी अभिषेक कुमार ‘बंटी’ को टिकट दिया. लेकिन नामांकन के एक दिन बाद ही उन्हें 'पारिवारिक कारणों' से हटा दिया गया और उनकी जगह नीरज कुमार सिन्हा को टिकट दिया गया. नीरज पीके के सामने अपेक्षाकृत कैंडिडेट थे,
यह बदलाव पार्टी की लापरवाही, बैकग्राउंड चेक की कमी और आंतरिक गुटबाजी दर्शाता है. सुरक्षित सीट पर अति-आत्मविश्वास ने अभियान को ठेस पहुंचाया और विपक्ष को हमले का मौका दिया. इससे मतदाताओं को संदेश गया कि पार्टी इस सीट को गंभीरता से नहीं ले रही है.
राजनीति के माहिर खिलाड़ी पीके ने इन मुद्दों को खूब उठाया. उनका निशाना सीधे सीएम सम्राट चौधरी थे. इसे उन्होंने चुनाव अभियान की शुरुआत से लेकर जीत के बाद तक जारी रखा है.
'लिखकर ले लीजिए...'
चुनाव प्रचार के दौरान पीके ने कहा था, "आपका एक वोट एक विधायक नहीं चुनेगा. मुख्यमंत्री बदल देगा. अगर सम्राट चौधरी को हटाना चाहते हैं तो बीजेपी को बांकीपुर में हटाइए. लिखकर ले लीजिएगा सम्राट चौधरी को हटाने का रास्ता खुल जाएगा."
इस बीच नीट पेपर लीक, भरत तिवारी एनकाउंटर जैसे मुद्दों ने बीजेपी की भद्द पिटवाई. पीके ने जनता की भावनाओं को आवाज दी.
इससे उनके पक्ष में गोलबंदी हुई. जनता के सामने जब नीरज कुमार सिन्हा और पीके के बीच विकल्प चुनने का मौका आया तो बीजेपी के 'नमक' से बंधा रहने वाले वोटर ने भी इस बार बदलाव को तवज्जो दिया.
चुनाव आयोग के अनुसार पीके ने 19324 वोटों से जीत हासिल की है. आरजेडी कैंडिडेट की जमानत जब्त हो गई.
लेकिन आंकड़ों का विश्लेषण कई और कहानी खोलते हैं.
चुनाव के नतीजे बताते हैं कि बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत सवर्ण वोटर इस सीट पर बीजेपी से नाराज है. 1995 से जहां बीजेपी लगातार जिस इलाके में जीतती रही वहां भगवा पर पीके का पीला रंग चढ़ जाना, लोगों की नाराजगी का संकेत है.

पटना की जिस बांकीपुर में बीजेपी को 2005 से कुल वोटों का 59 फीसदी से कम नहीं मिला. जिस बांकीपुर में 9 महीने पहले चुनाव में नितिन नवीन को 63 फीसदी वोट मिला, वहां अबकी बार बीजेपी प्रत्याशी को केवल 34.50 फीसदी वोट मिला है. जबकि प्रशांत किशोर 49.23 फीसदी वोट लेकर जीते हैं.
'बांकीपुर से बैंगलोर नहीं बन जाएगा'
चुनाव जीतने के बाद पीके ने सधी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने साफ कहा है कि उनके जीतने से बांकीपुर बैंगलोर नहीं बन जाएगा. पीके मतदाताओं की उम्मीदों को कोई झूठा दिलासा नहीं देना चाहते हैं, लेकिन बदलाव की बात जरूर करते हैं. बदलाव के उनके एजेंडे में सीएम सम्राट चौधरी को हटाना उनकी पहली प्राथमिकता है.
उन्होंने कहा, "सुधार का प्रयास करेंगे. बड़ी-बड़ी बात नहीं बोलना चाहता हूं, मेरे विधायक बनने से बांकीपुर से बैंगलोर नहीं बनेगा. लेकिन सुधार होगा. बड़ी बात ये है कि ये चुनाव बांकीपुर की नाली गली के लिए नहीं लड़ा गया है, लेकिन किसी अच्छे आदमी को सीएम बनाइए."
उन्होंने कहा कि सम्राट चौधरी का जो चाल चरित्र और चेहरा है वो पब्लिक डोमेन में है, अगर आप किसी अपराधी को सीएम बनाएंगे तो बिहार की तरक्की नहीं हो सकती है. उनके पास बहुमत है, किसी अच्छे, चरित्रवान. काबिल आदमी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाइए ताकि बिहार के लोग भी गर्व कर सकें.
बांकीपुर के नतीजों ने साफ कर दिया है कि कोई भी किला स्थायी नहीं होता. जब जनता बदलाव चाहती है तो पुराने गढ़ भी गिर जाते हैं. प्रशांत किशोर ने 30 दिन के अभियान में 30 साल का किला ढहा दिया है.