अल-नीनो का वो कहर, जब भूख से मर गए लाखों लोग, क्या फिर लौट सकता है ऐसा संकट?

1870 के दशक में सूखे और फसलें बर्बाद होने से दुनिया के कई हिस्सों में ऐसा अकाल पड़ा कि लाखों लोगों की जान चली गई. इस तबाही में अल-नीनो की भी बड़ी भूमिका थी. क्या आज दुनिया ऐसे संकट से बच सकती है?

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1870 के अकाल में लाखों लोगों की मौत हुई थी. इसकी वजह अल-नीनो था. (Photo: Representative/Getty) 1870 के अकाल में लाखों लोगों की मौत हुई थी. इसकी वजह अल-नीनो था. (Photo: Representative/Getty)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 17 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 1:46 PM IST

1875 से 1878 के बीच दुनिया के कई हिस्सों में बारिश की कमी के कारण भयानक अकाल पड़ा था. भारत, चीन, अफ्रीका और ब्राजील जैसे क्षेत्रों में सूखे से फसलें बर्बाद हो गईं और लोगों के सामने खाने का संकट खड़ा हो गया. इस दौरान लाखों लोगों की मौत हुई. कुछ ऐतिहासिक अनुमानों के मुताबिक, मरने वालों की संख्या 5 करोड़ से ज्यादा हो सकती है. इस संकट के पीछे कई वजहें थीं, जिनमें 1877-78 के दौरान आया ताकतवर अल-नीनो भी शामिल था.

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उस समय खाने की कमी इतनी बढ़ गई थी कि लोगों को पेट भरने के लिए पेड़ों की जड़ें और दूसरी चीजें खानी पड़ीं. कई इलाकों में लोगों को भोजन के लिए अपना घर छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ा. यह घटना बताती है कि मौसम में बदलाव किस तरह खेती और लोगों की जिंदगी पर बड़ा असर डाल सकता है.

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कैसे शुरू हुआ था अकाल?

इस अकाल की शुरुआत 1875 के आसपास हुई थी. भारत में बारिश कम होने से खेती पर बुरा असर पड़ा. चीन और अफ्रीका के कई हिस्सों में भी सूखे की स्थिति बनी रही. 1876 से 1878 के बीच कई इलाकों में बारिश की कमी के कारण फसलें बर्बाद हो गईं. खेतों में अनाज नहीं उगा, जिससे लोगों को खाने के लिए परेशान होना पड़ा.

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एक वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक, इस अकाल के दौरान भारत में करीब 1.22 करोड़ से 2.93 करोड़ और चीन में करीब 1.95 करोड़ से 3 करोड़ लोगों की मौत हुई थी. ब्राजील में भी करीब 20 लाख लोगों की मौत का अनुमान है. ये पुराने रिकॉर्ड पर आधारित आंकड़े हैं. इसलिए अलग-अलग अध्ययनों में मौतों की संख्या अलग हो सकती है.

अल-नीनो ने कैसे बढ़ाई परेशानी?

अल-नीनो प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा बढ़ने की स्थिति है. इसका असर दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर पड़ता है. इससे कुछ जगहों पर बारिश कम हो सकती है, जबकि दूसरी जगहों पर ज्यादा बारिश और बाढ़ आ सकती है.

1877-78 में अल-नीनो काफी ताकतवर था. उस समय हिंद महासागर और अटलांटिक महासागर में भी मौसम से जुड़े बदलाव हुए थे. इन बदलावों ने कई इलाकों में सूखे की स्थिति को गंभीर बनाने में भूमिका निभाई. हालांकि, उस समय मौसम से जुड़े आंकड़े आज की तुलना में कम थे. इसलिए वैज्ञानिकों के लिए उस दौर के मौसम को पूरी तरह समझना मुश्किल है.

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सिर्फ सूखा नहीं, खाने की कमी भी थी वजह

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फसलें बर्बाद होने से अनाज की कमी हो गई थी. ऐसे में गरीब परिवारों के लिए खाना खरीदना मुश्किल हो गया. जिन लोगों की कमाई खेती से होती थी, उनके पास न काम बचा और न ही खाना खरीदने के लिए पैसे. इसके अलावा, लोगों तक समय पर अनाज और दूसरी जरूरी मदद नहीं पहुंच पाई. पानी और अनाज जमा करने की व्यवस्था भी कई जगह कमजोर थी. इन वजहों से हालात और खराब हो गए. यानी सिर्फ सूखे के कारण ही लोगों की मौत नहीं हुई, बल्कि खाने की कमी और समय पर मदद नहीं मिलने से भी संकट बढ़ा.

ऐसी तबाही से कैसे बच सकते हैं?

आज मौसम का अनुमान लगाने के लिए सैटेलाइट और कंप्यूटर की मदद ली जाती है. वैज्ञानिक समुद्र के तापमान और बारिश में होने वाले बदलावों पर नजर रखते हैं. इससे अल-नीनो जैसी घटनाओं का पहले से अंदाजा लगाने में मदद मिलती है. इस जानकारी के आधार पर सरकारें सूखे की आशंका वाले इलाकों में पहले से पानी और अनाज का इंतजाम कर सकती हैं. किसानों को कम पानी में उगने वाली फसलों के बारे में जानकारी देना भी जरूरी है. इसके अलावा, अनाज का भंडार रखना और जरूरतमंद लोगों तक समय पर मदद पहुंचाना भी जरूरी है.

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1870 के दशक का अकाल बताता है कि मौसम में बदलाव से खेती बर्बाद हो सकती है और लोगों के सामने खाने का संकट खड़ा हो सकता है. अल-नीनो  को रोका नहीं जा सकता, लेकिन सही जानकारी और समय पर तैयारी से इसके नुकसान को कम किया जा सकता है. इसके लिए पानी और अनाज का इंतजाम करना और सूखे से प्रभावित लोगों की मदद करना जरूरी है.

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