इजरायल और लेबनान के बीच एक बार फिर जंग तेज हो गई है. रात भर हुई लड़ाई में इजरायल के 4 सैनिक मारे गए, जो ईरान समर्थित गुट हिज्बुल्लाह की तरफ से इस जंग में किए गए सबसे बड़े हमलों में से एक माना जा रहा है. वहीं इजरायल के हमलों में लेबनान में कम से कम 18 लोग मारे गए हैं.
ये हालात उस वक्त बने हैं जब अमेरिका और ईरान के बीच पूरी जंग रोकने के लिए एक डील हुई है, लेकिन लेबनान में बढ़ती हिंसा इस डील को खतरे में डाल रही है. इसी बीच अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्विट्जरलैंड का अपना दौरा भी टाल दिया है, जहां ईरान के साथ अगले दौर की बातचीत होनी थी.
दक्षिणी लेबनान में इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच रात भर जोरदार लड़ाई चली. इजरायल के 4 सैनिक मारे गए, जिनमें एक लेफ्टिनेंट कर्नल भी शामिल था. एक ड्रोन हमले में 5 और सैनिक घायल हो गए.
लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि आधी रात से अब तक 11 कस्बों में हुए भारी हवाई हमलों में 18 लोग मारे गए और 33 घायल हुए. बमबारी की वजह से लोगों को बचाने और निकालने का काम भी नहीं हो पा रहा है. मरने वालों की गिनती अभी और बढ़ सकती है.
सबसे ज्यादा तबाही टायर शहर के पास हारौफ गांव में हुई, जहां 7 लोग मारे गए और कई लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका है.
फ्रांस ने अमेरिका से क्या कहा?
फ्रांस ने अमेरिका से कहा है कि वो इजरायल पर दबाव डाले कि लेबनान में लड़ाई बंद हो. क्योंकि इस बढ़ती हिंसा से अमेरिका और ईरान के बीच हुई अस्थायी डील पर खतरा मंडरा रहा है, जो पूरे मिडिल ईस्ट की जंग को रोकने के लिए की गई थी.
ये डील कहती है कि अमेरिका, ईरान और उनके साथी देश हर मोर्चे पर (लेबनान समेत) तुरंत सैन्य कार्रवाई बंद कर देंगे. इस हफ्ते की शुरुआत में हिंसा कम हुई थी, लेकिन अब फिर से तेज हो गई है.
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इजरायल ने क्या सफाई दी?
इजरायल का कहना है कि उसने हिज्बुल्लाह के लड़ाकों और ठिकानों पर हमले किए हैं, क्योंकि हिज्बुल्लाह बार-बार सीजफायर तोड़ रहा था. लेबनान की सरकारी न्यूज एजेंसी NNA के मुताबिक, टायर और बिंत जबील के दक्षिणी इलाकों से बड़ी संख्या में लोग घर छोड़कर उत्तर की तरफ भाग रहे हैं.
अली अल-ताहेर पहाड़ी पर भिड़ंत
रात की सबसे बड़ी लड़ाई लितानी नदी के उत्तर में 'अली अल-ताहेर' नाम की पहाड़ी पर हुई. ये ऊंची जगह हिज्बुल्लाह के लिए बहुत अहम है और इजरायल यहां आगे बढ़ना चाहता था.
हिज्बुल्लाह ने बताया कि उसके लड़ाकों ने इजरायली फौज पर घात लगाकर हमला किया, गाइडेड मिसाइलों से 3 मरकवा टैंक तबाह कर दिए और रॉकेट व तोप से सैनिकों को निशाना बनाया. बाद में जब इजरायल की फौज अपने घायल साथियों को निकालने आई, तब भी हिजबुल्लाह ने उन पर हमला किया.
जंग कैसे शुरू हुई थी?
लेबनान इस पूरे झगड़े में तब फंसा था जब 2 मार्च को हिजबुल्लाह ने इजरायल पर हमला किया था. इसके बाद इजरायल ने हिजबुल्लाह के खिलाफ बड़ी कार्रवाई शुरू की और दक्षिणी लेबनान में घुस गया.
इजरायल ने अपनी फौज वापस बुलाने से इनकार कर दिया है. वो दक्षिणी लेबनान में अपनी एक 'सुरक्षा सीमा' बनाकर बैठा है. उसका कहना है कि ये उत्तरी इजरायल को हिज्बुल्लाह के हमलों से बचाने के लिए जरूरी है. इजरायल की फौज ने दक्षिण के उन गांवों को मिट्टी में मिला दिया है जहां उसके मुताबिक हिजबुल्लाह छिपा हुआ था.
बुधवार को इजरायल ने एक नक्शा जारी किया जिसमें दक्षिणी लेबनान में अपने कब्जे का इलाका और बढ़ा दिया है. इजरायल ने ये भी कहा कि वो इस सीमा से बाहर भी हमले कर सकता है.
अब तक कितनी जानें गईं?
लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, 2 मार्च से अब तक इजरायली हमलों में 3,912 लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें 746 डॉक्टर/नर्स, औरतें और बच्चे शामिल हैं. इजरायल की तरफ से इस जंग में अब तक कम से कम 32 सैनिक और 4 आम नागरिक मारे गए हैं.
इजरायल के मंत्रियों का गुस्सा फूटा
अमेरिका और ईरान की डील से इजरायल बहुत नाराज है. इजरायल का कहना है कि ये डील ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर पूरी रोक नहीं लगाती और लेबनान में इजरायल की सैन्य कार्रवाई पर पाबंदी लगाती है.
इजरायल के दक्षिणपंथी मंत्री इतमार बेन-ग्विर और बेजालेल स्मोट्रिच ने 4 सैनिकों की मौत के बाद बदले की भाषा बोली. बेन-ग्विर ने एक्स पर लिखा कि 'हर इजरायली मां के एक आंसू के बदले हजार लेबनानी माओं को रोना चाहिए. पूरा लेबनान जलना चाहिए.' वहीं स्मोट्रिच ने लिखा कि अब 'नर्क के दरवाजे खोलने' का वक्त आ गया है.
एक बड़े इजरायली अधिकारी ने बताया कि इजरायल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन से 'जिद्दी बातचीत' कर रहा है ताकि वो दक्षिणी लेबनान के अंदर 10 किलोमीटर (6 मील) तक अपनी फौज रख सके.
अमेरिका-ईरान डील में क्या है?
गुरुवार को अमेरिका ने ईरान पर लगाई गई नाकाबंदी हटा दी. इसके बाद महीनों से रुके तेल के टैंकर होर्मुज से आराम से निकलने लगे. ये रास्ता तेल के व्यापार के लिए बहुत जरूरी है.
ईरानी सरकारी मीडिया का कहना है कि उनके दक्षिणी बंदरगाहों पर शिपिंग 'सामान्य' हो गई है, लेकिन ये होर्मुज अब भी ईरानी फौज की निगरानी में है और यहां से निकलने के लिए तालमेल जरूरी है.
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अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने कहा है कि उसके युद्धपोत इस इलाके में मौजूद रहेंगे ताकि डील की हर शर्त मानी जा रही है या नहीं, ये देखा जा सके. कम से कम 2 तेल टैंकर बिना रोक-टोक के अमेरिकी नाकाबंदी पार करके निकल गए, जिनमें कुल मिलाकर 38 लाख बैरल ईरानी कच्चा तेल था.
बुधवार रात को होर्मुज से 1 करोड़ 25 लाख बैरल से ज्यादा तेल निकला, जिससे जंग के दौरान बढ़ी तेल की कीमतों में और राहत मिल सकती है.
डील की शर्तें क्या हैं
लेकिन यूरोपीय यूनियन ने अभी ईरान पर अपने प्रतिबंध नहीं हटाए हैं. EU की विदेश नीति प्रमुख काया कालास ने कहा कि अभी इसका सही वक्त नहीं आया है.
डोनाल्ड ट्रंप ने डील क्यों की?
राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि उन्होंने ये डील इसलिए साइन की ताकि अमेरिका को 'आर्थिक तबाही' से बचाया जा सके. जंग की वजह से तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं, शेयर बाजार डगमगा रहा था और महंगाई बढ़ रही थी.
ट्रंप ने ये भी कहा कि वो हर्बर्ट हूवर जैसे राष्ट्रपति नहीं बनना चाहते, जिनकी नीतियों ने 1930 के दशक की महामंदी को और बिगाड़ दिया था.
ट्रंप ने ये डील बुधवार को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ वर्साय पैलेस में डिनर के दौरान साइन की. ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजेश्कियान ने अलग से इस पर दस्तखत किए.
वेंस का स्विट्जरलैंड दौरा क्यों टला
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को शुक्रवार को स्विट्जरलैंड के ओबबर्गन गांव जाना था, जहां ईरान के साथ बातचीत होनी थी. उनका स्टाफ और मीडिया जॉइंट बेस एंड्रयूज पर पहुंच भी गया था. वहीं स्विट्जरलैंड में भी व्हाइट हाउस के अधिकारी और मीडिया तैयार थे.
लेकिन गुरुवार रात अचानक ये दौरा रद्द कर दिया गया. व्हाइट हाउस ने कहा कि 'लॉजिस्टिक्स' की वजह से वेंस वॉशिंगटन में ही रहेंगे.
असली वजह ये बताई जा रही है कि अल-मय्यादीन (हिजबुल्लाह से जुड़ा चैनल) के मुताबिक, ईरान ने इजरायल के लेबनान में जारी हमलों की वजह से अपना डेलिगेशन भेजने से मना कर दिया.
दो क्षेत्रीय अधिकारियों ने बताया कि ईरान ने नेतन्याहू के बयानों और लेबनान में लड़ाई को डील का उल्लंघन माना और मीटिंग से हाथ खींच लिया. पाकिस्तान भी ईरान के इस फैसले से 'हैरान' है.
पाकिस्तान भी पीछे हटा
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को भी स्विट्जरलैंड जाना था, जहां पाकिस्तान को साइनिंग सेरेमनी की मेजबानी करनी थी. लेकिन चूंकि ईरान और अमेरिका दोनों डील पहले ही साइन कर चुके थे, इसलिए ये दौरा भी टाल दिया गया.
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अमेरिका और इजरायल के बीच तकरार
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इजरायल सरकार के कुछ सदस्यों पर खुलकर हमला किया. उन्होंने कहा कि इजरायल बहुत अकेला पड़ गया है और उसके नेता अमेरिकी मदद की कद्र नहीं कर रहे.
वेंस ने कहा, 'डोनाल्ड ट्रंप पूरी दुनिया में इकलौते ऐसे राष्ट्र प्रमुख हैं जो इस वक्त इजरायल के साथ हमदर्दी रखते हैं. इजरायल में जो भी समझता है कि उसकी सबसे बड़ी समस्या अमेरिकी राष्ट्रपति हैं, उसे जागकर हकीकत देखनी चाहिए.'
इजरायल और अमेरिका ने मिलकर 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ जंग शुरू की थी. लेकिन 8 अप्रैल के सीजफायर के बाद दोनों के बीच मतभेद बढ़ गए. नेतन्याहू जंग जारी रखना चाहते थे, जबकि ट्रंप उसे खत्म करना चाहते थे क्योंकि ये अमेरिका में लोकप्रिय नहीं थी और वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला रही थी.
नेतन्याहू ने खुद डील की आलोचना नहीं की है, लेकिन उनके मंत्री इतमार बेन-ग्विर ने कहा है कि इजरायल ट्रंप की डील से 'बंधा' नहीं है.
ट्रंप भी नेतन्याहू से नाराज हैं. उन्होंने नेतन्याहू को 'पागल' तक कहा है. ट्रंप ने कहा, 'मेरे बिना इजरायल नहीं होता, क्योंकि किसी और राष्ट्रपति ने वो नहीं किया जो मैंने किया. अब बीबी (नेतन्याहू) को लेबनान के मामले में ज्यादा जिम्मेदारी से काम लेना होगा.'
नेतन्याहू ने गुरुवार को कहा कि इजरायली फौज दक्षिणी लेबनान के 'सुरक्षा क्षेत्र' में तब तक रहेगी 'जब तक इजरायल की सुरक्षा को जरूरी हो.' इस बयान से डील पर खतरा बढ़ गया है, क्योंकि डील में लेबनान की अखंडता का सम्मान करने की बात है.
ईरान के सुप्रीम लीडर का रुख
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला मोजताबा खामेनेई ने अमेरिका के साथ सीधी बातचीत का समर्थन किया है. ये जंग के बाद उनकी पहली प्रतिक्रिया है. उन्होंने कहा, 'ये साफ है कि भविष्य में होने वाली आमने-सामने की बातचीत का मतलब दुश्मन की बात मान लेना नहीं है.'
खामेनेई जंग की शुरुआत में एक हमले में घायल हुए थे और तब से सार्वजनिक रूप से नहीं दिखे हैं. उनके पिता (पिछले सुप्रीम लीडर) हमेशा अमेरिका से सीधी बातचीत के खिलाफ रहे, खासकर तब जब ट्रंप ने 2015 की परमाणु डील से अमेरिका को बाहर निकाला था.
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान खुद को मजबूत स्थिति में मान रहा है, क्योंकि उसने होर्मुज को बंद करके पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था हिला दी थी. अब अमेरिका को 'जंग से पहले वाली स्थिति' में लौटने के लिए बातचीत करनी पड़ रही है.
अमेरिका में डील पर सवाल
अमेरिका में कुछ रिपब्लिकन सांसद भी इस डील से नाराज हैं. उनका कहना है कि वॉशिंगटन ने ईरान को बहुत ज्यादा रियायतें दे दीं, खासकर प्रतिबंध हटाकर और 300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण फंड का जिक्र करके.
सीनेट आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के रिपब्लिकन चेयरमैन सीनेटर रोजर विकर ने कहा कि डील के कुछ हिस्से 'ट्रंप के लक्ष्यों से बिल्कुल मेल नहीं खाते.' उन्होंने कहा कि 300 अरब डॉलर का फंड ओबामा की 2015 की डील में दी गई रकम के मुकाबले 'बहुत ज्यादा' है.
ट्रंप और वेंस ने सफाई दी है कि इस फंड में अमेरिकी टैक्स देने वालों का पैसा नहीं जाएगा और ये बिना ईरान की रियायतों के नहीं मिलेगा.
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आगे क्या?
डील के मुताबिक 60 दिन के अंदर ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर पक्की बातचीत होनी है. लेकिन ट्रंप ने ये भी कहा है कि जरूरत पड़ी तो हमले फिर शुरू हो सकते हैं.
होर्मुज का मुख्य रास्ता अभी भी बंद है, क्योंकि वहां करीब 80 बारूदी सुरंगें निकाली जानी हैं. जहाज फिलहाल ईरानी और ओमानी पानी के छोटे रास्तों से निकल रहे हैं. पूरा रास्ता खोलने में हफ्तों या महीनों का वक्त लग सकता है.
मध्यस्थ अभी लेबनान में लड़ाई को शांत करने पर ध्यान दे रहे हैं, ताकि अमेरिका-ईरान बातचीत फिर से शुरू हो सके.