कुछ महीने पहले तक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू एक ही टीम का हिस्सा थे. दोनों नेताओं ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का समर्थन किया. उनका लक्ष्य भी लगभग एक जैसा था. ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना और उसकी क्षेत्रीय ताकत को कमजोर करना और सत्ता परिवर्तन करना. लेकिन आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है.
युद्ध खत्म हो चुका है. कोई बड़ा रणनीतिक लक्ष्य हासिल नहीं हुआ. ईरान के साथ शांति समझौते भी हो गए. खास बात यह रही कि इस प्रक्रिया में नेतन्याहू को उतनी अहमियत नहीं मिली, जितनी उन्हें उम्मीद थी. अब दोनों नेता सार्वजनिक तौर पर एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं.
अमेरिका ने ईरान के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. ट्रंप इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत बता रहे हैं. वहीं नेतन्याहू इस समझौते से संतुष्ट नहीं हैं. उनका मानना है कि ईरान पर सैन्य दबाव बनाए रखना चाहिए था और युद्ध को अधूरा छोड़ना इजरायल की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है. यहीं से दोनों नेताओं के बीच तनाव की शुरुआत हुई.
ट्रंप-नेतन्याहू की दोस्ती में क्यों आई दरार?
राष्ट्रपति ट्रंप और पीएम नेतन्याहू के रिश्तों में सबसे बड़ी दरार उस वक्त आई जब अमेरिका ने पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता में ईरान के साथ एक अंतरिम शांति समझौते पर काम शुरू किया. बाद में इस समझौते को "इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग" नाम दिया गया. इसका मकसद युद्ध रोकना, होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलना और वैश्विक तेल आपूर्ति को सामान्य करना था.
सबसे अहम बात यह थी कि पूरी प्रक्रिया में इजरायल की भूमिका बेहद सीमित रही. नेतन्याहू सरकार को उम्मीद थी कि अमेरिका किसी भी समझौते से पहले उनकी राय जरूर लेगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इजरायली मीडिया ने इसे "कूटनीतिक झटका" बताया. नेतन्याहू शासन को लगा कि अमेरिका ने उसकी सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया है.
ट्रंप की प्राथमिकताएं क्यों बदल गईं?
युद्ध की शुरुआत में ट्रंप और नेतन्याहू के लक्ष्य लगभग एक जैसे थे. दोनों ईरान की क्षेत्रीय ताकत को कमजोर करना चाहते थे. लेकिन जैसे-जैसे जंग लंबा खिंचने लगा, ट्रंप की प्राथमिकताएं बदलने लगीं. अमेरिका में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ रहा था. होर्मुज स्ट्रेट में तनाव की वजह से वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हो रहे थे. दूसरी तरफ अमेरिकी मतदाता भी एक और लंबे विदेशी युद्ध के पक्ष में नहीं थे.
इसके अलावा नवंबर में होने वाले मिड-टर्म चुनावों का दबाव भी था. ट्रंप को महसूस हुआ कि उन्हें युद्ध नहीं, बल्कि शांति की राजनीतिक जरूरत है. यहीं से उनकी "अमेरिका फर्स्ट एग्जिट स्ट्रेटेजी" सामने आई. उनकी कोशिश थी कि युद्ध खत्म हो, तेल की कीमतें स्थिर हों और अमेरिकी जनता के सामने वह खुद को ऐसे नेता के रूप में पेश कर सकें जिसने एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष को रोक दिया.
दूसरी तरफ इजरायली पीएम नेतन्याहू बिल्कुल अलग राजनीतिक दबावों में काम कर रहे थे. इजरायल में अक्टूबर तक आम चुनाव होने हैं. उनकी राजनीति लंबे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर टिकी रही है. उनकी छवि ऐसे नेता की रही है जो ईरान और उसके समर्थक संगठनों के खिलाफ सबसे सख्त रुख अपनाते हैं.
अगर वे अचानक युद्ध रोक देते, तो उनके दक्षिणपंथी समर्थकों को यह कमजोरी लग सकती थी. यही वजह है कि नेतन्याहू लगातार कहते रहे कि ईरान समर्थित समूहों के खिलाफ अभियान अभी खत्म नहीं हुआ है. उनका मानना था कि मौजूदा हालात में युद्ध रोकना रणनीतिक गलती साबित हो सकता है.
लेबनान बना सबसे बड़ा विवाद
ट्रंप और नेतन्याहू के बीच सबसे बड़ा टकराव लेबनान को लेकर सामने आया. ईरान के साथ हुए शांति समझौते में लेबनान की संप्रभुता का सम्मान करने और वहां सैन्य गतिविधियां कम करने की बात शामिल थी. लेकिन इजरायल दक्षिणी लेबनान के कुछ इलाकों में अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखना चाहता था.
नेतन्याहू ने साफ कहा कि इजरायल "सिक्योरिटी जोन" बनाए रखेगा. उनका तर्क था कि हिजबुल्लाह जैसे संगठनों से सुरक्षा के लिए यह जरूरी है. यही बात ट्रंप की शांति योजना से सीधे टकरा रही थी. ईरान ने भी चेतावनी दी कि अगर लेबनान में इजरायली हमले जारी रहे तो वह पूरे समझौते से पीछे हट सकता है.
इससे ट्रंप की पूरी कूटनीतिक कोशिश खतरे में पड़ गई. जब ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से नेतन्याहू को डांटना शुरू किया. तनाव सिर्फ बंद कमरों तक सीमित नहीं रहा. जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से नेतन्याहू की आलोचना की. उन्होंने कहा कि इजरायल को "थोड़ा नरम रवैया" अपनाने की जरूरत है. ट्रंप ने तंज कसते हुए कहा, "हर बार किसी को ढूंढने के लिए पूरी इमारत गिराने की जरूरत नहीं होती." इस बयान को इजरायल की सैन्य रणनीति पर सीधा हमला माना गया.
जब फोन पर ट्रंप ने नेतन्याहू को कह दिया 'पागल'
अमेरिकी राष्ट्रपति का किसी इजरायली प्रधानमंत्री पर इस तरह सार्वजनिक टिप्पणी करना बेहद असामान्य माना जाता है. तनाव बढ़ने के साथ बयान भी तीखे होते गए. रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक फोन कॉल के दौरान ट्रंप ने नेतन्याहू को "पागल" तक कह दिया था.
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि ट्रंप ने उनसे कहा, "अगर मैं नहीं होता तो तुम राजनीतिक रूप से खत्म हो चुके होते." बाद में ट्रंप ने सार्वजनिक मंचों से भी कहा, "अमेरिका के बिना इजरायल नहीं होता. और मेरे बिना तो बिल्कुल नहीं." यह बयान इजरायल में काफी विवादित रहा. कई लोगों ने इसे अमेरिकी समर्थन को राजनीतिक दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश बताया.
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी ट्रंप का खुलकर समर्थन किया. उन्होंने इजरायल को चेतावनी दी कि उसे अपने सबसे ताकतवर सहयोगी के खिलाफ नहीं जाना चाहिए. वेंस ने कहा, "अगर मैं इजरायली कैबिनेट में होता तो उस एकमात्र शक्तिशाली सहयोगी पर हमला नहीं करता जो अभी भी हमारे साथ खड़ा है." यह बयान दिखाता है कि मतभेद अब सिर्फ ट्रंप और नेतन्याहू तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि दोनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व के बीच भी दिखाई देने लगे हैं.
क्या यह वही पैटर्न है जो पहले भी दिखा था?
दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप और नेतन्याहू के रिश्तों में तनाव पहली बार नहीं दिख रहा. ट्रंप के पहले कार्यकाल के अंत में भी दोनों नेताओं के बीच मतभेद सामने आए थे. खासकर तब, जब नेतन्याहू ने अमेरिकी चुनाव नतीजों के बाद जो बाइडेन को जल्दी बधाई दे दी थी. उस समय भी ट्रंप नाराज हुए थे. हालांकि मौजूदा संकट कहीं बड़ा है, क्योंकि यह सिर्फ व्यक्तिगत नाराजगी का मामला नहीं बल्कि युद्ध और शांति की रणनीति से जुड़ा टकराव है.
अमेरिका और इजरायल के रिश्ते किसी एक नेता पर निर्भर नहीं करते. सैन्य सहयोग, खुफिया साझेदारी और अरबों डॉलर की सहायता दोनों देशों को मजबूती से जोड़ती है. लेकिन यह भी साफ है कि ट्रंप और नेतन्याहू पहली बार इतने बड़े रणनीतिक मुद्दे पर आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं. ट्रंप युद्ध खत्म कर राजनीतिक जीत चाहते हैं. नेतन्याहू युद्ध जारी रखकर सुरक्षा और घरेलू राजनीति दोनों को साधना चाहते हैं. यानी दोनों नेता एक ही संघर्ष को बिल्कुल अलग नजरिए से देख रहे हैं.