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'बांग्लादेश लौटना नामुमकिन, कोलकाता ज्यादा प्रोग्रेसिव...', 19 साल बाद कोलकाता लौटी तसलीमा नसरीन बोलीं

लेखिका तसलीमा नसरीन ने आजतक से विशेष बातचीत में कहा कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी होनी चाहिए. अगर अपनी बात कहने के अधिकार का सम्मान नहीं किया जाता, अगर बोलने की आज़ादी नहीं है, अगर किताबों पर प्रतिबंध लगाया जाता है, या लोगों को देश से बाहर भेज दिया जाता है तो अभिव्यक्ति के अधिकार का उल्लंघन होता है. यह लोकतंत्र की हत्या करने जैसा है.

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तसलीमा नसरीन ने अभिव्यक्ति के अधिकार की जोरदार पैरवी की है. (Photo: ITG)
तसलीमा नसरीन ने अभिव्यक्ति के अधिकार की जोरदार पैरवी की है. (Photo: ITG)

लेखिका तसलीमा नसरीन 18 साल, 8 महीने और 10 दिन बाद कोलकाता की धरती पर कदम रखीं. लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी पहनीं तसलीमा ने अपनी एक तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा की है. शनिवार, 1 अगस्त को कोलकाता के रवींद्र सदन में उनकी एक पुस्तक का विमोचन होगा. तस्लीमा के पोस्टर शहर भर में लगे हुए हैं. 

रवींद्र सदन में कट्टरपंथ-विरोधी कवियों और लेखकों का एक कार्यक्रम आयोजित किया गया है. इसका आयोजन उस्मान गनी मल्लिक के धर्मनिरपेक्ष मिशन द्वारा किया जा रहा है. बांग्लादेशी लेखक भी इसमें शामिल होंगे. 

आजतक से बात करते हुए तसलीमा गुजरे दिनों को याद करने लगीं. उन्होंने राज्य सरकार का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि जो दरवाजा कभी बंद था, वह आखिरकार खुल गया है. मैं चाहता हूं कि यह दरवाज़ा खुला रहे ताकि जब भी मेरा मन करे, मैं यहां आकर बंगाल की खुली और आज़ाद हवा में सांस ले सकूं. 

जब तसलीमा से पूछा गया कि वे उन लोगों को क्या संदेश देना चाहेंगी जिन्होंने उनको बंगाल की धरती छोड़ने पर मजबूर किया. तो उन्होंने कहा कि वे बस इतना कहना चाहती हैं कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी होनी चाहिए. उन्होंने कहा, "अगर अपनी बात कहने के अधिकार का सम्मान नहीं किया जाता, अगर बोलने की आज़ादी नहीं है, अगर किताबों पर प्रतिबंध लगाया जाता है, या लोगों को देश से बाहर भेज दिया जाता है तो अभिव्यक्ति के अधिकार का उल्लंघन होता है. यह लोकतंत्र की हत्या करने जैसा है. मेरा मानना ​​है कि जो कोई भी लोकतंत्र से प्यार करता है, उसे अभिव्यक्ति की आज़ादी का समर्थन करना चाहिए."

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तसलीमा नसरीन से बांग्लादेश लौटने पर भी उनके विचार पूछे गए. इस पर उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि बांग्लादेश में अपने घर लौटना कभी मुमकिन हो पाएगा. यहां कोलकाता, भारत में ऐसा मुमकिन है, क्योंकि यहां प्रगतिशील सोच वाले लोग रहते हैं. मुझे नहीं लगता कि मैं इस ज़िंदगी में कभी बांग्लादेश जा पाऊंगी. अगर ऐसा हुआ तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा. मुझे खुशी है कि मैं बंगाल के इस हिस्से में आ पाई हूं; अब यही मेरा देश है."

बता दें कि  8 अगस्त 1994 को तसलीमा नसरीन को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था. पश्चिम बंगाल से उन्हें 21 नवंबर 2007 को निर्वासित किया गया. हालांकि 2011 के बाद तसलीमा को दिल्ली में स्थायी रूप से रहने की अनुमति मिल गई थी, लेकिन पश्चिम बंगाल से उनका आध्यात्मिक जुड़ाव हमेशा बना रहा.  उन्होंने कई बार कहा है कि जब भी वह कोलकाता आती हैं, विभाजन का दर्द उनके दिल में फिर से जाग उठता है. 

तसलीमा नसरीन से पूछा गया कि क्या पश्चिम बंगाल की पूर्व की सरकारों ने उनसे कभी बंगाल लौटने को नहीं कहा. इस पर उन्होंने कहा कि उन्होंने मुझे कभी वापस नहीं बुलाया. एक सेकुलर ट्रस्ट संस्था ने इसके लिए पैरवी की थी; उन्होंने कोशिश की, लेकिन उस समय सफल नहीं हो पाए. इस बार यह सफल रहा क्योंकि सुरक्षा के इंतज़ाम किए गए थे. मैं चाहती हूं कि मैं अक्सर आ-जा सकूं. खासकर बुक फेयर और साहित्यिक उत्सवों जैसे कार्यक्रमों के लिए. 

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तसलीमा कई बार कह चुकी हैं कि वह किसी भी राजनीतिक तनाव में नहीं पड़ना चाहतीं. दिल्ली में उनका जीवन अच्छा चल रहा है. 

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