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Success Story: मिट्टी में दिखा सोना, 2 लाख के सरकारी लोन ने घोड़ा-बग्गी चलाने वाले गरीब युवक की बदल दी किस्मत

सहारनपुर के जड़ौदा पांडा निवासी देवेंद्र कुमार ने मुख्यमंत्री माटीकला रोजगार योजना से दो लाख रुपये का ऋण लेकर बंद पड़ा पुश्तैनी कारोबार दोबारा शुरू किया. अब वह गमले, फ्लावर पॉट, गुल्लक, दीपक, मूर्तियां और अन्य मिट्टी के सामान बना रहे हैं. सहारनपुर के साथ मुजफ्फरनगर, चरथावल और करनाल से भी उन्हें ऑर्डर मिल रहे हैं. उनके साथ चार लोग काम कर रहे हैं.

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सरकारी योजना ने फिर खड़ा कर दिया कारोबार. (Photo: ITG)
सरकारी योजना ने फिर खड़ा कर दिया कारोबार. (Photo: ITG)

सहारनपुर के जड़ौदा पांडा गांव निवासी देवेंद्र कुमार के लिए मिट्टी सिर्फ एक सामान नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी और परिवार की रोजी-रोटी का सहारा रही है. बचपन से मिट्टी के बर्तन और दूसरे सामान बनाने वाले देवेंद्र का पुश्तैनी काम एक समय ऐसा मंदा पड़ा कि उन्हें अपना कारोबार बंद करना पड़ा. परिवार का खर्च चलाने के लिए उन्होंने घोड़ा-बग्गी चलाना शुरू कर दिया. लेकिन इससे भी घर चलाना मुश्किल हो रहा था. फिर वर्ष 2025 में देवेंद्र को उत्तर प्रदेश सरकार की मुख्यमंत्री माटीकला रोजगार योजना के बारे में जानकारी मिली. उन्होंने खादी ग्रामोद्योग विभाग में आवेदन किया. योजना के तहत उन्हें दो लाख रुपये का ऋण मिला. इसके बाद देवेंद्र ने फिर से अपने पुश्तैनी काम को बड़े स्तर पर शुरू करने का फैसला किया.

ऋण मिलने के बाद मिट्टी के काम ने एक बार फिर उनके घर में जगह बना ली. अब वह पहले की तरह सिर्फ पारंपरिक बर्तन ही नहीं बनाते, बल्कि मांग के हिसाब से अलग-अलग तरह के सामान तैयार करते हैं. उनके यहां फ्लावर पॉट, गमले, पानी के फैन्सी कैंपर, ग्लास, गुल्लक, दीपक और अलग-अलग तरह की मूर्तियां तैयार होती हैं. देवेंद्र के मुताबिक वह दो दर्जन से अधिक तरह के मिट्टी के उत्पाद बनाते हैं. सबसे बड़ा बदलाव उनके सामान की बिक्री में आया है. पहले गांव से इक्का-दुक्का लोग ही सामान खरीदने आते थे. कई बार तैयार माल बिकता ही नहीं था और घर में पड़ा रहता था. कम कीमत मिलने की वजह से मेहनत के हिसाब से मुनाफा भी नहीं हो पाता था. इसी वजह से धीरे-धीरे उनका काम बंद हो गया था.

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2025 में मिली सरकारी योजना की जानकारी

अब स्थिति बदल गई है. देवेंद्र को सहारनपुर के अलावा चरथावल, मुजफ्फरनगर, करनाल और दूसरे शहरों से भी ऑर्डर मिल रहे हैं. उनका कहना है कि अब तैयार सामान के अच्छे दाम मिल रहे हैं और मांग भी लगातार बढ़ रही है. यानी जिस मिट्टी के काम से कभी दूरी बनानी पड़ी थी, वही काम अब दोबारा उनके परिवार की कमाई का बड़ा जरिया बन गया है. देवेंद्र बताते हैं कि अब उन्हें जिस तरह की मांग मिलती है, उसी हिसाब से सामान तैयार करते हैं. दीपावली को लेकर दीपक और मिट्टी से बने दूसरे सामान की मांग भी बढ़ रही है. वह बताते हैं कि करनाल से भी गमलों का बड़ा ऑर्डर मिला है. वहां उनसे एक गाड़ी भरकर गमले तैयार करने को कहा गया.

माटीकला के इसी काम ने देवेंद्र को एक और मौका दिया. उन्हें लखनऊ में अपने मिट्टी के उत्पाद प्रदर्शित करने के लिए बुलाया गया. उन्होंने वहां कई आकर्षक उत्पाद भेजे. इसके साथ ही मंदिर का मॉडल भी तैयार करके भेजा. देवेंद्र बताते हैं कि उन्होंने एक मंदिर बनाकर दिया था, जिसे यहां पास किया गया. इसके बाद उसे लखनऊ ले जाने के लिए कहा गया. देवेंद्र के लिए यह पहली बार था जब उनका मिट्टी का काम इस स्तर तक पहुंचा. देवेंद्र की कहानी सिर्फ एक कारोबार दोबारा शुरू करने की कहानी नहीं है. उनका कहना है कि इसी काम की कमाई से उन्होंने अपने बच्चों की शादी की और परिवार को संभाला. उनके दो बेटे नौकरी कर रहे हैं. परिवार के दूसरे लोग भी माटीकला के काम में सहयोग करते हैं. उनकी पत्नी और बच्चे भी इस काम में हाथ बंटाते हैं.

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आज देवेंद्र के साथ चार अन्य लोग भी काम कर रहे हैं. यानी जिस काम को कभी मंदी और कम बिक्री के कारण बंद करना पड़ा था, वही अब दूसरे लोगों के लिए भी रोजगार का जरिया बन गया है. देवेंद्र के मुताबिक परिवार के लोग तो काम करते ही हैं, उनके साथ चार अन्य लोग भी उनके यहां काम कर रहे हैं. देवेंद्र का कहना है कि उन्हें जो ऋण मिला, उससे कारोबार को दोबारा खड़ा करने में मदद मिली. हालांकि उनका मानना है कि अगर उन्हें इससे बड़ा ऋण मिलता तो वह और बड़ा प्लांट लगा सकते थे और उत्पादन बढ़ा सकते थे. उनके पास काम और मांग दोनों हैं, लेकिन बड़े स्तर पर उत्पादन के लिए ज्यादा संसाधनों की जरूरत है.

देवेंद्र की जिंदगी में मिट्टी का काम बचपन से जुड़ा रहा है. उनके पिता भी बड़े स्तर पर यह काम करते थे. बाद में पिता के एक्सीडेंट के बाद जिम्मेदारी देवेंद्र पर आई. उन्होंने काम संभाला, लेकिन कारोबार उस समय बहुत अच्छा नहीं चल रहा था. समय के साथ काम और मंदा हुआ तो उन्होंने इसे बंद कर दिया. अब कई साल बाद वही पुश्तैनी काम नए तरीके और नए बाजार के साथ वापस आया है. देवेंद्र के मुताबिक पहले तैयार माल के बिकने की चिंता रहती थी, लेकिन अब अलग-अलग जगहों से मांग आ रही है. त्योहारों के समय दीपक जैसे उत्पादों की मांग बढ़ जाती है, जबकि दूसरे समय गमले, फ्लावर पॉट, मूर्तियां और अन्य सामान तैयार किए जाते हैं.

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बड़ा प्लांट लगाने के लिए बड़े ऋण की जरूरत

मुख्यमंत्री माटीकला रोजगार योजना के तहत मिले दो लाख रुपये के ऋण ने देवेंद्र को अपने बंद पड़े काम को फिर से शुरू करने का मौका दिया. आज मिट्टी से बने उनके उत्पाद गांव से निकलकर दूसरे शहरों तक पहुंच रहे हैं. परिवार की जरूरतें इसी काम से पूरी हो रही हैं और उनके साथ चार अन्य लोगों को भी रोजगार मिल रहा है. देवेंद्र के लिए मिट्टी का यह पुश्तैनी कारोबार अब फिर से उनके परिवार और रोजगार का आधार बन गया है.

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