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न तलवार, न तीर-कमान, प्लास्टिक की कुप्पियों से राम-रावण का युद्ध, कौशांबी में 247 साल पुरानी परंपरा

कौशांबी जिले के दारानगर में रामलीला की 247 साल पुरानी परंपरा आज भी अनोखे अंदाज में निभाई जाती है. यहां राम और रावण की सेनाएं तलवार या तीर-कमान की जगह करीब 200 ग्राम की प्लास्टिक की कुप्पियों से युद्ध करती हैं. दो दिन में सात मुकाबले होते हैं. रावण का पुतला जलाने के बजाय तीर मारकर छोड़ दिया जाता है.

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राम-रावण की सेना में छिड़ता है कुप्पियों का युद्ध. (Photo: Screengrab)
राम-रावण की सेना में छिड़ता है कुप्पियों का युद्ध. (Photo: Screengrab)

उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में राम-रावण युद्ध की एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं. यहां न तलवार चलती है और न तीर-कमान से युद्ध होता है. राम और रावण की सेनाएं प्लास्टिक की खास कुप्पियों से एक-दूसरे पर हमला करती हैं. दारानगर की रामलीला से जुड़ी यह परंपरा करीब 247 साल पुरानी बताई जाती है. दो दिनों तक चलने वाले इस अनोखे युद्ध में सैनिकों के बीच सात मुकाबले होते हैं. खास बात यह है कि यहां रावण का पुतला जलाया नहीं जाता, बल्कि उसे तीर मारकर छोड़ दिया जाता है.

दारानगर के रामलीला मैदान में युद्ध के दौरान राम और रावण, दोनों पक्षों की सेनाओं में 25-25 सैनिक शामिल होते हैं. राम की सेना के सैनिक लाल रंग की पोशाक पहनते हैं, जबकि रावण की सेना के सैनिक काले कपड़ों में नजर आते हैं. दोनों दलों के हाथों में इस युद्ध के लिए खास तौर पर बनाई गई प्लास्टिक की कुप्पियां होती हैं, जिनका वजन करीब 200 ग्राम बताया जाता है. युद्ध का बिगुल बजते ही दोनों सेनाएं एक-दूसरे पर कुप्पियां फेंकना शुरू कर देती हैं. मुकाबले के दौरान सैनिक विरोधी दल को चोट पहुंचाकर उसे हराने की कोशिश करते हैं. युद्ध इतना रोमांचक और कभी-कभी खतरनाक हो जाता है कि सैनिक घायल भी हो जाते हैं. ऐसे में पुलिस को भी कई बार हस्तक्षेप करना पड़ता है.

पहले दिन रावण की सेना, दूसरे दिन राम की जीत

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इस अनोखे युद्ध में दो दिनों के दौरान कुल सात मुकाबले होते हैं. पहले दिन चार चरणों में युद्ध लड़ा जाता है. इन मुकाबलों में रावण की सेना का पलड़ा भारी रहता है और वह राम की सेना को हराने की कोशिश करती है. दूसरे दिन तीन मुकाबले होते हैं. इन तीनों में जीत हासिल करने के बाद राम की सेना विजय दशमी का पर्व मनाती है. दोनों दिन होने वाले मुकाबले करीब दस-दस मिनट के होते हैं. मैदान में बड़ी संख्या में मौजूद दर्शक सांसें थामकर युद्ध देखते हैं. आसपास के जिलों से भी लोग इस परंपरा को देखने पहुंचते हैं, क्योंकि ऐसा कुप्पी युद्ध दूसरी जगह देखने को नहीं मिलता.

स्थानीय मान्यता के मुताबिक, इस परंपरा का संबंध त्रेता युग से है. कहा जाता है कि लंका पर विजय हासिल करने के बाद अयोध्या लौटने से पहले भगवान राम ने यहां के नजदीक गंगा किनारे स्थित श्रृंगवेरपुर में पूजा-अर्चना की थी. इसी घटना की याद में इस परंपरा की शुरुआत मानी जाती है. रामलीला कमेटी की ओर से इस युद्ध का आयोजन किया जाता है. युद्ध के बाद गाजे-बाजे के साथ भगवान की सवारी रथ पर निकाली जाती है. इस दौरान भव्य मेले का आयोजन भी होता है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं.

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रावण को जलाने के बजाय तीर मारकर छोड़ते हैं

दारानगर की रामलीला की सबसे खास बात रावण के पुतले से जुड़ी है. देश के ज्यादातर हिस्सों में दशहरे पर रावण के पुतले का दहन किया जाता है, लेकिन यहां ऐसा नहीं होता. दो दिन तक कुप्पी युद्ध चलने के बाद रावण को तीर मारकर छोड़ दिया जाता है. 247 साल से चली आ रही यह परंपरा दारानगर की रामलीला को अलग पहचान देती है. प्लास्टिक की कुप्पियों से होने वाला युद्ध, दो दिन में सात मुकाबले और अंत में रावण का पुतला न जलाने की परंपरा यहां के दशहरे को खास बनाती है.
 

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