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जयंत चौधरी के इलाके में BJP रही सुपरहिट, जानिए MLC चुनाव में कौन सहयोगी कितना काम आया?

आरएलडी के प्रमुख जयंत चौधरी के गढ़ पश्चिमी यूपी में एमएलसी चुनाव में बीजेपी का स्ट्राइक रेट सुपरहिट रहा, जहां पार्टी ने 5 में से 4 सीटों पर कब्जा जमाया. वहीं, पूर्वांचल और बुंदेलखंड में पार्टी के सहयोगी दल पूरी तरह बेअसर साबित हुए और बीजेपी को भारी नुकसान उठाना पड़ा.

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एमएलसी चुनाव में सीएम योगी और जयंत चौधरी की जोड़ी रही हिंट (Photo-ITG)
एमएलसी चुनाव में सीएम योगी और जयंत चौधरी की जोड़ी रही हिंट (Photo-ITG)

उत्तर प्रदेश विधान परिषद (एमएलसी) की 11 सीटों के नतीजों ने प्रदेश के क्षेत्रीय और राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह साफ कर दिया है. स्नातक कोटे की 5 और शिक्षक कोटे की 6 सीटों पर चुनाव हुए, जिसमें से बीजेपी 6 एमएलसी सीटें जीतने में कामयाब रही तो सपा 5 एमएलसी सीटों पर जीत का परचम फहराने में सफल रही.

एमएलसी चुनाव के क्षेत्रीय आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि बीजेपी का परचम पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो पुरजोर तरीके से लहराया, लेकिन पूर्वांचल, अवध और बुंदेलखंड के इलाकों में पार्टी को मात खानी पड़ी है.

बीजेपी ने इस चुनाव में सबसे बेहतर प्रदर्शन पश्चिमी यूपी में किया, जो जयंत चौधरी की आरएलडी का मजबूत गढ़ माना जाता है. ऐसे में बीजेपी के सहयोगी ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा, अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस) और संजय निषाद की निषाद पार्टी के प्रभाव वाले इलाकों में पार्टी का प्रदर्शन कैसा रहा और ये दल कितने मददगार साबित हुए, यह देखना अहम है.

पश्चिमी यूपी में बीजेपी का सुपरहिट स्ट्राइक

उत्तर प्रदेश एमएलसी चुनाव नतीजों का अगर क्षेत्रीय आधार पर आंकलन करते हैं तो पाते हैं कि पश्चिमी यूपी में बीजेपी ने अपना सबसे शानदार प्रदर्शन दोहराया है. 11 एमएलसी सीटों में से पांच सीटें पश्चिमी यूपी क्षेत्र की थीं. पश्चिमी यूपी की पांच एमएलसी सीटों में से चार सीटें बीजेपी जीतने में कामयाब रही और एक सीट आगरा शिक्षक क्षेत्र की सपा जीत सकी.

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मेरठ स्नातक सीट पर दिनेश गोयल, मेरठ शिक्षक सीट पर श्रीचंद शर्मा, बरेली-मुरादाबाद शिक्षक सीट पर डॉ. हरि सिंह ढिल्लों और आगरा स्नातक सीट पर डॉ. मानवेंद्र प्रताप सिंह बीजेपी के टिकट पर जीते हैं. आगरा शिक्षक सीट ही सपा के खाते में गई है, जहां से डॉ. आकाश अग्रवाल जीते हैं.

पूर्वांचल और बुंदेलखंड  में फ्लॉप रही बीजेपी

पूर्वांचल के इलाके की तीन सीटों पर एमएलसी चुनाव हुए हैं, जिनमें दो सीटें बीजेपी हार गई और सिर्फ एक सीट ही जीत सकी. पूर्वांचल में बीजेपी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा. गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट पर तो बीजेपी के ध्रुव कुमार त्रिपाठी जैसे-तैसे सीट बचा पाए, लेकिन वाराणसी की दोनों सीटें बीजेपी हार गई. वाराणसी शिक्षक सीट पर सपा के लाल बिहारी यादव और वाराणसी स्नातक सीट पर आशुतोष सिन्हा ने एकतरफा जीत दर्ज की.

अवध बेल्ट की दो सीटों पर चुनाव हुए, जहां बीजेपी और सपा के बीच कांटे की टक्कर रही. लखनऊ शिक्षक सीट पर बीजेपी के उमेश द्विवेदी हैट्रिक लगाने में सफल रहे, लेकिन लखनऊ स्नातक सीट पर सपा उम्मीदवार कांति सिंह पटेल ने बीजेपी को करारी मात दे दी. इसी तरह बुंदेलखंड की एक सीट पर चुनाव हुआ. इलाहाबाद-झांसी स्नातक सीट पर सपा के डॉ. मान सिंह यादव ने बीजेपी प्रत्याशी को हराकर सीट अपने नाम कर ली.

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बीजेपी कौन सहयोगी रहा 'हिट' और कौन 'फ्लॉप'?

शिक्षक और स्नातक एमएलसी चुनाव में पढ़े-लिखे वोटर होते हैं. इस वर्ग में जातीय लामबंदी के बजाय मुद्दों, प्रशासनिक छवि और वैचारिक जुड़ाव की बड़ी भूमिका होती है. पश्चिमी यूपी की 5 में से 4 सीटों पर बीजेपी की जीत में राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) का सहयोग कुछ हद तक मददगार जरूर रहा.

हालांकि, एमएलसी चुनाव मुख्य रूप से शहरों, कॉलेजों और शिक्षकों के बीच लड़ा जाता है, लेकिन पश्चिमी यूपी के शहरी, ग्रामीण-कस्बाई इलाकों में आरएलडी का ग्राउंड नेटवर्क बीजेपी उम्मीदवारों के लिए समर्थन जुटाने में मददगार साबित हुआ. इसी वजह से जाट-किसान बाहुल्य वाले इस इलाके में बीजेपी 80 फीसदी सीटें निकालने में सफल रही.

बरेली-मुरादाबाद-बिजनौर, संभल जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों वाली सीटों पर भी बीजेपी जीतने में सफल रही है, तो उसमें आरएलडी का अहम रोल माना जा रहा है. इसके अलावा मेरठ-सहारनपुर की दोनों सीटें बीजेपी जीती है, जिसके दायरे में जयंत चौधरी का अपना बागपत और मुजफ्फरनगर इलाका भी आता है.

पूर्वांचल में बीजेपी को सबसे बड़ा झटका लगा है, जहां बीजेपी के सहयोगी सुभासपा, अपना दल (एस) और निषाद पार्टी का प्रभाव है. ओपी राजभर का दावा पूर्वांचल के राजभर और ओबीसी मतदाताओं पर पकड़ का रहता है, लेकिन वाराणसी शिक्षक और स्नातक दोनों ही सीटों पर बीजेपी की करारी हार ने यह साफ कर दिया कि सुभासपा अपने कोर वोटर को स्नातक/शिक्षक चुनाव में बीजेपी के पाले में ट्रांसफर करवाने में पूरी तरह नाकाम रही.

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निषाद पार्टी (संजय निषाद) और अपना दल (एस) भी काम नहीं आ सके. पूर्वांचल, अवध और बुंदेलखंड में इन दोनों दलों का गठजोड़ भी बीजेपी को सहारा नहीं दे सका. लखनऊ की स्नातक सीट पर बीजेपी के कुर्मी प्रत्याशी होने के बाद भी सपा की कुर्मी प्रत्याशी भारी पड़ीं. इसके अलावा अपना दल (एस) के प्रभाव वाले मिर्जापुर-वाराणसी क्षेत्र की स्नातक सीट भी बीजेपी हार गई.

क्यों काम नहीं आ सके बीजेपी के सहयोगी

निषाद पार्टी और अपना दल का असर पारंपरिक विधानसभा या लोकसभा चुनाव में जातिगत आधार पर तो दिखता है, लेकिन शिक्षक और बुद्धिजीवी मतदाताओं के बीच उनकी अपील बेहद सीमित रही. यही कारण है कि पूर्वांचल, अवध और बुंदेलखंड की 6 सीटों में से बीजेपी दो सीटें ही जीत सकी. इस बेल्ट में बीजेपी अकेले पड़ गई और सपा बाजी मार ले गई.

एमएलसी चुनाव के इन नतीजों से साफ संदेश मिलता है कि बीजेपी को अपनी सबसे बड़ी सफलता (पश्चिमी यूपी में) अपने खुद के कैडर (आरएसएस समर्थित शिक्षक संगठन और एबीवीपी नेटवर्क) तथा आरएलडी के सहयोग से मिली है.

पूर्वांचल और बुंदेलखंड में जातिगत राजनीति का दावा करने वाले ओपी राजभर, डॉ. संजय निषाद और अनुप्रिया पटेल जैसे सहयोगी बीजेपी के लिए 'असरदार वोट-ट्रांसफर मशीन' साबित नहीं हो सके. नतीजतन, गैर-पश्चिम यूपी के इलाकों में सपा ने शिक्षकों और युवाओं के मुद्दों को भुनाते हुए बीजेपी के एनडीए गठबंधन को पटखनी दे दी.

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