
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के कुंभी क्षेत्र में लगभग 3080 करोड़ रुपये की लागत से भारत के पहले इंटीग्रेटेड बायोप्लास्टिक प्लांट की स्थापना का कार्य तेजी से शुरू हो गया है. इस प्लांट के लिए बेल्जियम से मंगाई गई मुख्य मशीन 'साइक्लाइजेशन रिएक्टर' को उड़ीसा बंदरगाह से 308 पहियों वाले एक भारी-भरकम ट्रक के माध्यम से सुरक्षित कुंभी लाया गया है. प्लांट के जीएम डॉ. सुनील कुमार यादव के अनुसार, इस इकाई में गन्ने और चीनी से लैक्टिक एसिड तैयार कर पॉलीलैक्टिक एसिड यानी पीएलए बायोप्लास्टिक बनाया जाएगा. यह दुनिया का ऐसा पहला एकीकृत प्लांट होगा जहां एक ही छत के नीचे सभी प्रक्रियाएं पूरी होंगी.
देश का पहला इंटीग्रेटेड बायोप्लास्टिक प्लांट
लखीमपुर खीरी जिले के कुंभी में देश का पहला पीएलए प्लांट लगने जा रहा है, जिसकी कुल अनुमानित लागत करीब 3,080 करोड़ रुपये है. यह फैक्ट्री हर साल लगभग 80,000 टन पीएलए का उत्पादन करेगी. इस प्लांट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह दुनिया का पहला ऐसा इंटीग्रेटेड प्लांट होगा जहां गन्ने से बायोप्लास्टिक बनाने की पूरी प्रक्रिया एक ही छत के नीचे पूरी होगी. इसका कच्चा माल भी यहीं मिलेगा और अंतिम उत्पाद भी यहीं से तैयार होकर निकलेगा.

बेल्जियम से आई 200 टन वजनी मशीन
इस मेगा प्रोजेक्ट के लिए बेल्जियम से एक विशालकाय मशीन मंगाई गई है, जिसे 'साइक्लाइजेशन रिएक्टर' कहा जाता है. इस मुख्य मशीन का वजन करीब 200 टन है. यह मशीन समुद्र के रास्ते उड़ीसा बंदरगाह पर उतरी और वहां से 308 पहियों वाले एक विशालकाय ट्रक पर लादकर लंबी यात्रा तय करते हुए लखीमपुर खीरी के कुंभी प्लांट में पहुंचाई गई है. इस भारी-भरकम ट्रक को देखने के लिए रास्ते में लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई थी.
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गन्ने से बनेगी पर्यावरण-अनुकूल प्लास्टिक
बायोप्लास्टिक प्लांट के महाप्रबंधक डॉ. सुनील कुमार यादव ने पूरी प्रक्रिया की जानकारी देते हुए बताया कि इसमें सबसे पहले शुगर या चीनी से लैक्टिक एसिड तैयार किया जाता है. इसके बाद लैक्टिक एसिड में कैटालिस्ट डालकर रिएक्शन कराया जाता है, जिससे पॉलीलैक्टिक एसिड यानी पीएलए बनता है जो पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल होता है. इस प्रक्रिया से बने उत्पाद और पैलेट्स से कपड़े, धागे, कटलरी और पॉलिथीन जैसी कई चीजें बनाई जा सकेंगी.
प्रदूषण से मिलेगी मुक्ति और सुधरेगी अर्थव्यवस्था
विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का मानना है कि पारंपरिक प्लास्टिक पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाती है और नालों को चोक कर देती है. इसके विपरीत, यह नया बायोप्लास्टिक जमीन में जाने के बाद महज छह महीने के भीतर पूरी तरह मिट्टी में घुल जाता है, जिससे प्रदूषण की समस्या खत्म होगी. इस मेगा प्रोजेक्ट के शुरू होने से न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को बड़ा बूस्ट मिलेगा, बल्कि रिटेलर्स और होलसेलर्स को भी दूसरे राज्यों और देशों में व्यापार करने के नए अवसर मिलेंगे.