Norway vs India: माता-पिता जब बूढ़े होते हैं तो उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत किस चीज की होती है? पैसे की, दवाइयों की या फिर अपने बच्चों के साथ की? इस सवाल का जवाब हर परिवार के लिए अलग हो सकता है. लेकिन हाल ही में नॉर्वे में रहने वाले एक भारतीय शख्स ने बुजुर्गों की देखभाल को लेकर ऐसी बात कही, जिसने सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी है.
विनोद नाम के इस भारतीय ने नॉर्वे और भारत में बुजुर्ग माता-पिता की जिंदगी की तुलना की. उनका कहना है कि नॉर्वे में उम्र बढ़ने के बाद माता-पिता का बच्चों के साथ रहना जरूरी नहीं माना जाता. कई बुजुर्ग अपने घर में ही रहते हैं, जबकि कुछ लोग ऐसे केयर होम में रहते हैं, जहां उनकी जरूरतों का ध्यान रखा जाता है. उन्हें खाना, मेडिकल मदद और दूसरी जरूरी सुविधाएं मिलती हैं. सबसे खास बात यह है कि वहां इसे परिवार से दूरी या बच्चों की बेरुखी के तौर पर नहीं देखा जाता.
अलग घर का मतलब अलग दिल नहीं
विनोद के मुताबिक, नॉर्वे में बुजुर्ग अपने बच्चों से अलग रह सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके रिश्ते खत्म हो जाते हैं. बच्चे उनसे मिलने जाते हैं, पोते-पोतियों के साथ समय बिताते हैं, परिवार साथ मिलकर छुट्टियां मनाता है और पारिवारिक कार्यक्रमों में बुजुर्ग भी शामिल रहते हैं.

यानी वहां परिवार का प्यार इस बात से तय नहीं होता कि माता-पिता और बच्चे एक ही छत के नीचे रहते हैं या नहीं. यह बात शायद भारत के लोगों को थोड़ी अलग लग सकती है. हमारे यहां अक्सर माना जाता है कि अच्छे बच्चे वही हैं जो अपने बूढ़े माता-पिता को अपने साथ रखें. अगर कोई बेटा या बेटी माता-पिता को ओल्ड एज होम में रख दे तो रिश्तेदार और पड़ोसी तरह-तरह के सवाल करने लगते हैं.
भारत में प्यार के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी
भारत में माता-पिता की सेवा को सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, बल्कि संस्कार माना जाता है. बचपन में माता-पिता बच्चों की हर जरूरत पूरी करते हैं. इसलिए जब वे बूढ़े होते हैं तो बच्चों से भी उम्मीद की जाती है कि वे उनका सहारा बनें. लेकिन आज की जिंदगी पहले जैसी नहीं रही. बहुत से परिवारों में पति-पत्नी दोनों नौकरी करते हैं. घर की EMI, बच्चों की पढ़ाई, रोजमर्रा का खर्च और अपने भविष्य की चिंता पहले से ही होती है. इसके साथ अगर माता-पिता की दवाइयों और इलाज की जिम्मेदारी भी जुड़ जाए तो कई परिवारों पर आर्थिक और मानसिक दबाव बढ़ सकता है. विनोद ने इसी परेशानी की ओर ध्यान दिलाया. इस पूरी बहस का सबसे भावुक हिस्सा शायद यही है.
कई बुजुर्ग अपने बच्चों से अपनी जरूरतें बताने में भी झिझकते हैं. उन्हें डर रहता है कि कहीं बच्चे परेशान न हो जाएं. कहीं उनकी दवाइयों का खर्च बच्चों के बजट पर भारी न पड़ जाए. कहीं उनकी वजह से बच्चों की जिंदगी मुश्किल न हो जाए. दूसरी तरफ बच्चे भी कई बार अपने माता-पिता के लिए बहुत कुछ करना चाहते हैं, लेकिन नौकरी, दूरी और आर्थिक जिम्मेदारियों के कारण हर समय उनके साथ नहीं रह पाते. ऐसे में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि माता-पिता बच्चों के साथ रह रहे हैं या नहीं. असली सवाल यह होना चाहिए कि क्या वे सुरक्षित, सम्मान के साथ और खुश रह रहे हैं?
क्या भारत को भी बदलने की जरूरत है?
विनोद की बात का मतलब यह नहीं है कि भारत में बच्चों को अपने माता-पिता से अलग हो जाना चाहिए. बल्कि उनका सवाल इससे बड़ा है. क्या ऐसी व्यवस्था हो सकती है जहां बुजुर्गों को अपने बच्चों पर पूरी तरह निर्भर न रहना पड़े और जरूरत पड़ने पर उन्हें अच्छी देखभाल मिल सके? सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इस विचार का समर्थन किया, जबकि कुछ लोगों ने कहा कि भारत और नॉर्वे की संस्कृति और पारिवारिक व्यवस्था काफी अलग है. कुछ लोगों ने संयुक्त परिवार को भारत की बड़ी ताकत बताया. वहीं कुछ लोगों का कहना था कि भारत में अच्छे केयर होम अभी भी इतने महंगे हैं कि आम और मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए उन्हें अफोर्ड करना आसान नहीं है.
किसी बुजुर्ग मां-बाप का बच्चों के साथ रहना बहुत खूबसूरत हो सकता है. लेकिन अगर किसी वजह से वे अलग रहते हैं और फिर भी बच्चे रोज फोन करते हैं, समय निकालकर उनसे मिलते हैं, उनकी दवाइयों और जरूरतों का ध्यान रखते हैं, तो क्या उस रिश्ते में प्यार कम हो जाता है? माता-पिता की देखभाल सिर्फ एक घर में साथ रहने का नाम नहीं है. यह उनके सम्मान, सुरक्षा, भावनाओं और आत्मसम्मान का भी सवाल है. भारत की सबसे बड़ी खूबसूरती उसका पारिवारिक जुड़ाव है. लेकिन बदलते समय के साथ शायद हमें यह भी समझना होगा कि माता-पिता से प्यार करना और उनकी पूरी जिम्मेदारी अकेले उठाना हमेशा एक ही बात नहीं होती.
बुजुर्गों को ऐसा जीवन मिलना चाहिए जिसमें उन्हें अपने बच्चों से प्यार भी मिले और अपनी जिंदगी जीने की आजादी भी. क्योंकि आखिर उम्र के उस पड़ाव पर इंसान को सबसे ज्यादा जरूरत होती है- सहारे की, लेकिन बोझ बनने के डर की नहीं.