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फिक्स डिपॉजिट

फिक्स डिपॉजिट

फिक्स डिपॉजिट

फिक्स डिपॉजिट (Fixed Deposit), जिसे संक्षेप में FD कहा जाता है, भारत में सबसे लोकप्रिय और सुरक्षित निवेश विकल्पों में से एक है. इसमें निवेशक एक निश्चित राशि को बैंक या गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC) में तय अवधि के लिए जमा करता है. इस अवधि के दौरान जमा राशि पर पहले से निर्धारित ब्याज दर के अनुसार रिटर्न मिलता है. निवेश की अवधि पूरी होने पर मूलधन के साथ ब्याज भी निवेशक को वापस मिलता है.

फिक्स डिपॉजिट की अवधि कुछ दिनों से लेकर 10 वर्ष तक हो सकती है. अलग-अलग बैंक और वित्तीय संस्थान अपनी योजनाओं के अनुसार अवधि और ब्याज दर तय करते हैं. आमतौर पर वरिष्ठ नागरिकों (Senior Citizens) को सामान्य ग्राहकों की तुलना में अधिक ब्याज दर का लाभ दिया जाता है.

एफडी में निवेश करने का सबसे बड़ा उद्देश्य सुरक्षित और निश्चित रिटर्न प्राप्त करना होता है. शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड की तरह इसमें बाजार के उतार-चढ़ाव का सीधा प्रभाव नहीं पड़ता. इसी कारण जोखिम से बचने वाले निवेशकों के बीच यह काफी लोकप्रिय है.

फिक्स डिपॉजिट में ब्याज का भुगतान अलग-अलग तरीकों से किया जाता है. कुछ योजनाओं में ब्याज हर महीने, तिमाही, छमाही या सालाना मिलता है, जबकि कुछ योजनाओं में पूरी अवधि का ब्याज मैच्योरिटी पर मूलधन के साथ दिया जाता है. निवेशक अपनी जरूरत के अनुसार विकल्प चुन सकते हैं.

भारत में अधिकांश बैंक टैक्स-सेवर फिक्स डिपॉजिट भी उपलब्ध कराते हैं. इन योजनाओं में आयकर अधिनियम की निर्धारित शर्तों के अनुसार कर लाभ मिल सकता है. हालांकि, इनकी लॉक-इन अवधि सामान्यतः पांच वर्ष होती है और इस दौरान राशि नहीं निकाली जा सकती.

यदि निवेशक तय समय से पहले एफडी तोड़ता है, तो बैंक या वित्तीय संस्था पूर्व-निकासी (Premature Withdrawal) पर कुछ शर्तें लागू कर सकती है. कई मामलों में ब्याज दर कम हो जाती है या पेनाल्टी भी देनी पड़ सकती है.

फिक्स डिपॉजिट खोलने के लिए बैंक शाखा, इंटरनेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग या वित्तीय संस्था के डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जा सकता है. आज अधिकांश बैंक ऑनलाइन एफडी खोलने की सुविधा भी प्रदान करते हैं.

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