प्रशांत महासागर में अल-नीनो ने एक नया ऐतिहासिक रिकॉर्ड बना लिया है. निनो 3.4 नामक क्षेत्र में समुद्र की सतह का औसत तापमान सामान्य से 3.05 डिग्री सेल्सियस अधिक पहुंच गया. यह 1991-2020 की औसत तुलना में अब तक का सबसे ऊंचा दैनिक तापमान है.
पिछला रिकॉर्ड 2015 में नवंबर में लगभग 3.02 डिग्री सेल्सियस का था. इस बार यह स्तर सितंबर में ही हासिल हो गया है, जो सामान्य से दो महीने पहले है. वैज्ञानिकों के अनुसार यह अल-नीनो अब भी तेज हो रहा है. दिसंबर तक अपने चरम पर पहुंच सकता है.
यह भी पढ़ें: अफगानिस्तान में PAK ने अमेरिकी GBU-12 लेजर गाइडेड बम गिराया!
अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है जिसमें प्रशांत महासागर के पूर्वी और मध्य हिस्से का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है. यह हवाओं में बदलाव से शुरू होता है. गर्म पानी वाष्पीकरण बढ़ाता है. वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करता है. इस बार की घटना नौ महीने पहले पश्चिमी प्रशांत में हवाओं के बदलाव से शुरू हुई थी और धीरे-धीरे सुपर अल-नीनो के स्तर तक पहुंच गई है.

रिकॉर्ड का वैज्ञानिक महत्व
निनो 3.4 क्षेत्र प्रशांत महासागर का वह हिस्सा है जहां तापमान मापकर अल-नीनो की तीव्रता का आकलन किया जाता है. 3.05 डिग्री सेल्सियस आधुनिक रिकॉर्ड में सबसे अधिक है. यह 1982, 1997 और 2015 जैसी मजबूत घटनाओं से आगे निकल गई है.
कुछ आंकड़ों में यह 1877 की ऐतिहासिक घटना से भी तुलना की जा रही है जिसने बड़े पैमाने पर सूखा और अकाल पैदा किया था. मॉडल बताते हैं कि मासिक औसत और भी ऊंचा जा सकता है. कुछ अनुमानों में चरम 4 डिग्री के करीब पहुंचने की संभावना जताई गई है, हालांकि यह अभी अनिश्चित है.
यह भी पढ़ें: बंगाल की खाड़ी में डीप डिप्रेशन, आंध्र-ओडिशा तट पर भारी बारिश का खतरा
यह रिकॉर्ड इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अल-नीनो जलवायु परिवर्तन के साथ मिलकर प्रभाव बढ़ा सकता है. गर्म होती दुनिया में समुद्री तापमान पहले से ऊंचा है, जिससे नई घटनाएं और तीव्र हो रही हैं. वैज्ञानिक रोजाना डेटा पर नजर रखे हुए हैं क्योंकि डेली डेटा में उतार-चढ़ाव होता रहता है.

वैश्विक मौसम पर संभावित असर
अल-नीनो के प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों में अलग होते हैं. अमेरिका में इस सर्दी में सबसे ज्यादा असर पड़ने की संभावना है. उत्तरी हिस्से में सामान्य से अधिक गर्मी और पश्चिमी-मध्य हिस्सों में ज्यादा बर्फबारी हो सकती है. दक्षिण अमेरिका में पेरू और चिली में भारी बारिश और बाढ़ की घटनाएं पहले ही देखी जा रही हैं.
मध्य अमेरिका और कैरेबियन में सूखा बढ़ सकता है जिससे फसलें प्रभावित होंगी. एशिया में भारत सहित कई देशों में मॉनसून कमजोर पड़ सकता है. इंडोनेशिया में जंगल की आग और धुएं की समस्या बढ़ सकती है. ऑस्ट्रेलिया में सूखे की स्थिति बिगड़ सकती है.
यह भी पढ़ें: जहां होती है नमक की पारंपरिक खेती, ISRO वहीं बनाएगा लॉन्च सेंटर
अफ्रीका के कुछ हिस्सों में भी बारिश के पैटर्न बदल सकते हैं. कुल मिलाकर बाढ़, सूखा, गर्मी की लहरें और तूफान जैसी घटनाओं का जोखिम बढ़ जाता है. पहले ही कुछ क्षेत्रों में तापमान रिकॉर्ड और तूफान देखे जा चुके है. मौसम एजेंसियां लगातार निगरानी कर रही हैं.

राष्ट्रीय मौसम सेवाएं किसानों, आपदा प्रबंधन टीमों और आम लोगों को अलर्ट जारी कर रही हैं. पानी का संरक्षण, फसल योजना में बदलाव और आपात तैयारियां जरूरी हो गई हैं. ऊर्जा आपूर्ति, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ सकता है. अंतरराष्ट्रीय सहयोग से प्रभावित क्षेत्रों की मदद की जा सकती है.
अल-नीनो एक प्राकृतिक चक्र का हिस्सा है लेकिन इसकी तीव्रता चिंता का विषय है. रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने से वैश्विक जलवायु प्रणाली पर दबाव साफ दिख रहा है. वैज्ञानिक आगे के महीनों में और अधिक डेटा का इंतजार कर रहे हैं. आम लोगों को आधिकारिक अपडेट्स पर ध्यान देना चाहिए और स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करना चाहिए. यह घटना याद दिलाती है कि जलवायु पैटर्न कितने शक्तिशाली हो सकते हैं और तैयारी कितनी आवश्यक है.