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दिल्ली का कूलिंग सिस्टम खत्म! रात और दिन की गर्मी को लेकर ये रिपोर्ट डराने वाली

दिल्ली गर्मी के बाद रात में खुद को ठंडा करने की क्षमता खो रही है. 25 मई 2026 को पिछले 14 साल की सबसे गर्म रात दर्ज की गई, जो गरीब लोगों के लिए जानलेवा हो रही है.

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दिल्ली अब रातों को खुद को ठंडा नहीं कर पा रही है. (Photo: ITG)
दिल्ली अब रातों को खुद को ठंडा नहीं कर पा रही है. (Photo: ITG)

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की बेहद चिंताजनक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली अब गर्मियों के दौरान रात के समय खुद को ठंडा करने की अपनी प्राकृतिक क्षमता को तेजी से खो रही है. 25 मई 2026 को दिल्ली ने पिछले 14 वर्षों में अपनी सबसे गर्म रात दर्ज की, जिसने शहरी जलवायु परिवर्तन के एक नए और भयावह संकट को उजागर कर दिया है.  

हर साल जब दिल्ली भीषण गर्मी की चपेट में आती है, तो दिन के समय झुलसाने वाली धूप के बाद लोग रात में थोड़ी राहत की उम्मीद करते हैं, लेकिन अब दिल्ली की रातें भी लोगों को कोई राहत नहीं दे रही हैं.

यह स्थिति न केवल सामान्य जनजीवन को प्रभावित कर रही है, बल्कि शहर के बुनियादी ढांचे, पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर संकट खड़ा कर रही है. रिपोर्ट बताती है कि दिन और रात के तापमान के बीच का यह कम होता अंतर दिल्ली को ऐसे अर्बन हीट आइलैंड में बदल रहा है, जहां से गर्मी बाहर नहीं निकल पा रही है.

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क्या होती है  गर्म रात और दिल्ली में क्या हैं इसके आंकड़े

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भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार एक रात को गर्म रात तब घोषित किया जाता है, जब दिन का अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर बना रहे और रात का न्यूनतम तापमान सामान्य से 4.5 डिग्री सेल्सियस से लेकर 6.4 डिग्री सेल्सियस तक अधिक दर्ज किया जाए. 

25 मई को दिल्ली में रात का न्यूनतम तापमान आश्चर्यजनक रूप से 32.4 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जिसने इसे पिछले 14 साल का सबसे गर्म रिकॉर्ड बना दिया. सीएसई के सस्टेनेबल हैबिटैट विभाग की प्रोग्राम मैनेजर और इस रिपोर्ट की लेखिका मिताशी सिंह के अनुसार, यह स्थिति तब पैदा हुई जब पूरे मई महीने में दिल्ली का दिन का तापमान लगातार 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर बना रहा.

दिनभर की भयंकर गर्मी के बाद जब रात का तापमान भी 32 डिग्री से ऊपर रहने लगे, तो यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पर्यावरण में गर्मी को सोखने और उसे वापस अंतरिक्ष में भेजने की क्षमता पूरी तरह खत्म हो चुकी है.

delhi cooling system collapsed

दिल्ली के गर्म होने के मुख्य कारण: कंक्रीट का जाल और सिकुड़ती हरियाली

आखिर दिल्ली ने रात के समय ठंडा होने की अपनी यह अनमोल क्षमता क्यों खो दी? 

इसके पीछे कई मानव निर्मित और अनियोजित शहरीकरण के कारण जिम्मेदार हैं. दिल्ली का शहरी ढांचा बेहद सघन और कंक्रीट से भरा हो चुका है. शहर में प्राकृतिक रूप से हवा और पानी को सोखने वाले ग्रीन स्पेस (पेड़-पौधे, पार्क) और ब्लू स्पेस (तालाब, झीलें, जल निकाय) लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं. 

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दिल्ली की आधुनिक इमारतें ऐसी सामग्रियों से बनाई जा रही हैं जिनमें उचित शेडिंग (धूप से बचाव) और इंसुलेशन (गर्मी रोकने की क्षमता) की भारी कमी है. इसके अलावा, कॉलोनियों और सोसाइटियों के लेआउट इस तरह से तैयार नहीं किए गए हैं जो प्राकृतिक वेंटिलेशन या हवा के क्रॉस-फ्लो को सहारा दे सकें.

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नतीजा यह होता है कि दिनभर वाहनों और लाखों एसी से निकलने वाली गर्मी इन कंक्रीट की दीवारों और डामर की सड़कों में फंसकर रह जाती है. रात के समय पूरे शहर का तापमान बढ़ाए रखती है.

गिरती 'डियूरनल कूलिंग और इसका वैज्ञानिक पहलू

इस संकट को गहराई से समझने के लिए सीएसई ने अपने पिछले स्टडीज का भी हवाला दिया है. मई 2024 में जारी सीएसई की एक अन्य रिपोर्ट 'दिल्ली: अर्बन हीट स्ट्रेस ट्रैकर' में यह अनुमान लगाया गया था कि साल 2014 से 2023 के दशक के दौरान दिल्ली की 'डियूरनल कूलिंग' (दिन और रात के भू-सतह तापमान के बीच का अंतर) में 9 प्रतिशत की भारी गिरावट आई है. 

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मिताशी सिंह कहती हैं कि साल 2001 से 2010 के दशक में दिल्ली के दिन और रात के सतही तापमान में लगभग 12 डिग्री सेल्सियस का अंतर होता था, यानी रातें दिन के मुकाबले 12 डिग्री तक ठंडी हो जाती थीं. लेकिन साल 2023 तक आते-आते यह अंतर घटकर मात्र 9.8 डिग्री सेल्सियस रह गया है.

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विज्ञान के नजरिए से देखें तो कंक्रीट के ढांचे दिनभर सूरज की रोशनी और गर्मी को सोखते हैं. रात में इसे धीरे-धीरे हवा में छोड़ते हैं. जब यह अंतर कम होने लगता है, तो इसका मतलब है कि शहर चौबीसों घंटे एक भट्टी की तरह तप रहा है, जिससे डामर की सड़कें और कंक्रीट की इमारतें रात में भी ठंडी नहीं हो पा रही हैं.

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दिल्ली की आधी आबादी पर मंडराता खतरा

इस भीषण गर्मी और गर्म रातों का सबसे क्रूर और असंतुलित प्रभाव दिल्ली के उन नागरिकों पर पड़ रहा है जो आर्थिक रूप से कमजोर और समाज के संवेदनशील हिस्सों से आते हैं. सीएसई के सस्टेनेबल हैबिटैट विभाग के प्रोग्राम डायरेक्टर रजनीश सरीन के अनुसार, दिल्ली की कुल आबादी का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं संवेदनशील समुदायों से मिलकर बना है. 

इनमें निर्माण कार्य करने वाले मजदूर, गिग वर्कर्स, रेहड़ी-पटरी वाले स्ट्रीट वेंडर्स, बेघर लोग, अनाधिकृत और झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोग, महिलाएं, छोटे बच्चे और बुजुर्ग शामिल हैं. इन लोगों के पास बढ़ती गर्मी से बचने या खुद को उसके अनुकूल ढालने के लिए एयर कंडीशनर या बेहतर हवादार मकानों जैसे साधन नहीं हैं. 

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ये मजदूर अपने परिवार का पेट पालने के लिए दिनभर चिलचिलाती धूप में कड़ा परिश्रम करते हैं. जब रात को भी उन्हें गर्मी से कोई राहत नहीं मिलती, तो स्थिति उनके लिए बिल्कुल जानलेवा हो जाती है. यदि गर्मी के कारण वे बीमार पड़ते हैं, तो उन्हें अपनी दिहाड़ी और मजदूरी से हाथ धोना पड़ता है, जो उनके पूरे परिवार को आर्थिक तबाही की ओर धकेल देता है.

गर्म रातों का स्वास्थ्य पर खतरनाक और स्थायी शारीरिक असर

मेडिकल साइंस और पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि रात के समय का बढ़ा हुआ तापमान मानव स्वास्थ्य के लिए दिन की गर्मी से भी अधिक खतरनाक साबित हो सकता है. जब कोई व्यक्ति दिनभर अत्यधिक गर्मी या 'हीट स्ट्रेस' का सामना करता है, तो मानव शरीर को खुद को सामान्य करने और आंतरिक तापमान को संतुलित करने के लिए रात के ठंडे माहौल की आवश्यकता होती है. 

मिताशी सिंह बताती हैं कि यदि रातें भी गर्म रहेंगी, तो मानव शरीर को खुद को ठंडा करने का मौका नहीं मिलेगा. इसके परिणामस्वरूप लोगों के दिल और कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम पर अत्यधिक दबाव बढ़ जाता है. यह स्थिति स्लीप साइकिल को पूरी तरह से बाधित कर देती है, जिससे अनिद्रा और मानसिक तनाव बढ़ता है. 

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रात में गहरी नींद न आने के कारण शरीर की कोशिकाओं और ऊतकों की प्राकृतिक मरम्मत (टिश्यू रिपेयर) की प्रक्रिया रुक जाती है. सरल शब्दों में कहें तो, रात की यह गर्मी इंसानी शरीर को अंदरूनी तौर पर खोखला कर रही है और लोगों को स्थायी शारीरिक व मानसिक नुकसान पहुंचा रही है.

हीट एक्शन प्लान की विफलता और कूलिंग इनइक्वेलिटी 

दिल्ली में प्रशासन द्वारा गर्मी से निपटने के लिए हीट एक्शन प्लान तो बनाए गए हैं, लेकिन सीएसई की रिपोर्ट इनकी एक बड़ी खामी को उजागर करती है. रजनीश सरीन का कहना है कि हालांकि ये शहर के हीट एक्शन प्लान कागजों पर विभिन्न संवेदनशील समूहों की पहचान तो करते हैं, लेकिन उनके पास इन गरीब और मजदूर समुदायों के संतुलित करने या उन्हें इस आपदा से सीधे बचाने की कोई ठोस योजना या रणनीति नहीं है. 

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इस वैज्ञानिक  प्रतिक्रिया के अभाव में दिल्ली की एक बहुत बड़ी आबादी सीधे तौर पर इस जानलेवा मौसम के रहमोकरम पर छोड़ दी गई है. दूसरी तरफ, संपन्न तबका इस गर्मी से बचने के लिए बड़े पैमाने पर एयर कंडीशनर (AC) का सहारा ले रहा है, जिसके कारण दिल्ली की बिजली की मांग हाल ही में 8,231 मेगावाट (MW) के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गई है. 

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एसी का यह अत्यधिक उपयोग ऊर्जा प्रणालियों पर भारी दबाव तो डाल ही रहा है. साथ ही यह 'अर्बन हीट आइलैंड' के प्रभाव को और बदतर बना रहा है. एक चलता हुआ एसी कमरे को तो ठंडा करता है, लेकिन वह अपने पीछे के हिस्से से अत्यधिक गर्म हवा सीधे बाहरी वातावरण में फेंकता है.

यह गर्म हवा उन गरीब लोगों के आसपास के माहौल को और ज्यादा तपा देती है जो कूलिंग के लिए पूरी तरह से बाहरी और प्राकृतिक हवा पर निर्भर हैं. इसे समाज में कूलिंग इनइक्वेलिटी बढ़ रही है.  

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सीएसई का दोहरी रणनीति वाला रोडमैप और भविष्य की राह

इस गंभीर स्थिति से निपटने और दिल्ली को भविष्य में रहने योग्य बनाए रखने के लिए सीएसई की रिपोर्ट ने एक व्यापक और व्यावहारिक दोहरी रणनीति (Dual-Strategy Roadmap) का प्रस्ताव रखा है, जिसे तुरंत लागू किए जाने की आवश्यकता है...

प्लान 1: लंबे समय का और शहरों से जुड़ा बुनियादी कदम 

इसके तहत सबसे पहले सरकार को गर्मी को एक 'अधिसूचित आपदा' (Notified Disaster) के रूप में मान्यता देनी चाहिए ताकि इसके प्रबंधन के लिए विशेष फंड जारी हो सके. पूरे शहर के तापमान पर नजर रखने के लिए एक 'हीट डैशबोर्ड' विकसित किया जाना चाहिए.

औद्योगिक क्षेत्रों, सरकारी और निजी ऑफिस परिसरों, बड़े बाजारों और अनौपचारिक बस्तियों (झुग्गियों) की छतों को 'थर्मली एफिशिएंट' या हीट-रिफ्लेक्टिव (गर्मी को वापस भेजने वाली) छतों में बदलना अनिवार्य किया जाना चाहिए. 

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नए भवनों के निर्माण और पुरानी इमारतों के नवीनीकरण में जलवायु-अनुकूल डिजाइनों और 'पैसिव कूलिंग' सिद्धांतों को लागू किया जाए जो बिना बिजली के भी कमरों को ठंडा रख सकें. इसके साथ ही, सार्वजनिक स्थानों पर 'पब्लिक कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर' (जैसे ठंडे पानी के कियोस्क, छायादार आश्रय स्थल और शहरी वन) का विकास किया जाना चाहिए और इसके लिए क्लाइमेट फंड्स की मदद ली जानी चाहिए.

प्लान 2: संवेदनशील आबादी के लिए तत्काल हस्तक्षेप  

जो मजदूर और कर्मचारी सीधे तौर पर बाहर धूप में काम करने के लिए मजबूर हैं, उनके स्वास्थ्य की रक्षा के लिए विशेष नियम बनाए जाने चाहिए. इसके अंतर्गत गर्मियों के महीनों में काम के बीच अनिवार्य रूप से 'कूलिंग ब्रेक्स' (ठंडी जगहों पर आराम के लिए समय) देना लागू किया जाना चाहिए. 

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दोपहर की सबसे तेज धूप के दौरान काम को रोकने के लिए काम के घंटों में बदलाव किया जाना चाहिए. सभी नियोक्ताओं के लिए हीटवेव से जुड़े मानक संचालन प्रक्रियाएं (SOPs) विकसित की जाएं. अत्यधिक गर्मी के कारण होने वाली आपातकालीन चिकित्सा स्थितियों से निपटने के लिए संवेदनशील आबादी को वित्तीय सहायता, मुफ्त चिकित्सा उपचार और आपातकालीन एम्बुलेंस सेवाएं प्रदान की जानी चाहिए.

रजनीश सरीन ने अंत में यह चेतावनी दी है कि दिल्ली में गर्मी के संकट को अब एक अस्थाई या मौसमी समस्या के रूप में देखना बंद करना होगा. यह जलवायु परिवर्तन के दौर की एक कड़वी और क्रूर वास्तविकता है जो अब हमेशा हमारे साथ रहने वाली है. आने वाले समय में और भी बदतर हो सकती है. यदि दिल्ली को भविष्य में इंसानों के रहने योग्य बनाए रखना है, तो प्रशासन, पॉलिसी मेकर्स और आम नागरिकों को मिलकर तुरंत एक सक्रिय और वैज्ञानिक हीट मैनेजमेंट दृष्टिकोण अपनाना होगा.

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