देश के कृषि क्षेत्र और अर्थव्यवस्था के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाने वाला दक्षिण-पश्चिम मॉनसून अब बहुत करीब आ गया है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अपनी ताजा भविष्यवाणी में कहा है कि अगले दो से तीन दिनों के भीतर मॉनसून केरल में दस्तक दे सकता है. आम तौर पर भारत में मॉनसून के आगमन की आधिकारिक तारीख 1 जून मानी जाती है, लेकिन इस बार इसमें कुछ दिनों की देरी देखी जा रही है.
मौसम विभाग के अनुसार, वर्तमान में वायुमंडलीय परिस्थितियां पूरी तरह अनुकूल बनी हुई हैं, जिससे दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दक्षिण-पश्चिम और दक्षिण-पूर्व अरब सागर के कुछ और हिस्सों, लक्षद्वीप द्वीप समूह, केरल के कुछ हिस्सों तथा तमिलनाडु की ओर आगे बढ़ने के लिए रास्ता साफ हो गया है.
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केरल में मॉनसून की एंट्री में देरी और अनुमानों में बदलाव
इस साल मॉनसून के आगमन को लेकर मौसम विभाग के अनुमानों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. इससे पहले, आईएमडी ने भविष्यवाणी की थी कि मॉनसून अपनी सामान्य तारीख से पहले यानी 26 मई को ही केरल पहुंच जाएगा. मौसम में आए बदलावों के कारण इसकी रफ्तार धीमी हो गई और इसमें देरी दर्ज की गई.

इसके बाद 29 मई को विभाग ने बयान जारी कर कहा था कि मॉनसून के आने में कुछ और दिनों का समय लग सकता है और यह अगले हफ्ते की शुरुआत में दस्तक देगा. अब मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि न केवल केरल और अरब सागर, बल्कि दक्षिण-पश्चिम, पश्चिम-मध्य, पूर्व-मध्य और उत्तर-पूर्व बंगाल की खाड़ी के साथ-साथ दक्षिण बंगाल की खाड़ी के बाकी हिस्सों में भी मॉनसून के आगे बढ़ने के लिए स्थितियां बेहद मजबूत हो चुकी हैं.
इस साल सामान्य से कम रहेगी बारिश
भले ही मॉनसून के आगमन की उल्टी गिनती शुरू हो गई हो, लेकिन बारिश के आंकड़ों को लेकर मौसम विभाग की नई रिपोर्ट चिंता बढ़ाने वाली है. आईएमडी ने अपने संशोधित पूर्वानुमान में साफ चेतावनी दी है कि इस साल देश में सीजन की कुल बारिश सामान्य से कम रहने की आशंका है.
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मौसम विभाग के अनुमान के मुताबिक, इस साल भारत में लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) यानी दीर्घावधि औसत की केवल 90 फीसदी बारिश होने की उम्मीद है. मौसम विज्ञान की परिभाषा के अनुसार, एलपीए (LPA) का मतलब किसी विशेष क्षेत्र में एक निश्चित अंतराल (जैसे एक महीने या पूरे सीजन) के दौरान रिकॉर्ड की गई बारिश से होता है, जिसे 30 से 50 वर्षों की लंबी अवधि के आधार पर निकाला जाता है.

भारत के संदर्भ में, 1971 से 2020 तक के आंकड़ों के आधार पर पूरे देश में मौसमी बारिश का एलपीए 87 सेंटीमीटर निर्धारित है. नियमतः, यदि किसी मॉनसून सीजन में एलपीए के 90 प्रतिशत से कम बारिश होती है, तो आईएमडी उसे कमजोर या कमी वाला (Deficient) मॉनसून घोषित करता है.
कमजोर मॉनसून के पीछे अल-नीनो का सबसे बड़ा हाथ
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इस साल मॉनसून के कमजोर रहने और सामान्य से कम बारिश होने के पीछे प्रशांत महासागर में पैदा हो रही भौगोलिक परिस्थितियां जिम्मेदार हैं. आईएमडी ने स्पष्ट किया है कि इस बार कम बारिश होने का सबसे बड़ा कारण अल-नीनो (El Nino) की स्थिति का उभरना है. जब भी प्रशांत महासागर में अल-नीनो सक्रिय होता है, तो भारत में मॉनसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं और बारिश में भारी कमी दर्ज की जाती है.
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मौसम प्रणाली की स्थिति: वर्तमान में, भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में 'न्यूट्रल अल-नीनो-साउदर्न ऑसीलेशन' (Neutral ENSO) की स्थिति समाप्त हो रही है. यह तेजी से अल-नीनो स्थितियों की ओर बढ़ रही है. मौसम विभाग का आकलन है कि अल-नीनो का प्रभाव शुरुआत में यानी जून के महीने में काफी कमजोर रहेगा, लेकिन जैसे-जैसे सीजन आगे बढ़ेगा, अगस्त और सितंबर के आते-आते यह मध्यम से बेहद मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है. यही वजह है कि मॉनसून के शुरुआत में सूखे जैसी स्थिति का खतरा बढ़ गया है.

कृषि और भारतीय अर्थव्यवस्था पर मॉनसूनी अनिश्चितता का संकट
भारत में कृषि क्षेत्र पूरी तरह से मॉनसूनी बारिश पर निर्भर करता है, इसलिए मॉनसून में होने वाली किसी भी तरह की देरी या कमी का सीधा असर देश के करोड़ों किसानों और खाद्य उत्पादन पर पड़ता है. जून के महीने में अल-नीनो के कमजोर रहने से शुरुआती बुवाई में तो मदद मिल सकती है, लेकिन सितंबर तक इसके मजबूत होने की आशंका ने खरीफ फसलों (जैसे धान, दलहन और तिलहन) के उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ा दी है.
यदि सितंबर में बारिश बेहद कम होती है, तो फसलों के पकने के समय उन्हें पानी की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है, जिससे पैदावार घट सकती है. देश के कई हिस्सों में पानी के जलाशयों का स्तर गिरने और आने वाले समय में महंगाई बढ़ने का खतरा भी इस कमजोर मॉनसून की रिपोर्ट के बाद से गहराने लगा है. सरकार और कृषि विशेषज्ञ अब से ही किसानों को कम पानी में उगने वाली फसलों को प्राथमिकता देने की सलाह दे रहे हैं.