सोमवार को दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी मार-ए-लागो में बैठा था शायद बाथरोब पहने और पक्का 'ट्रुथ सोशल' पर. ठीक उसी पल जब न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज कारोबार के लिए खुला, वह 'ALL CAPS' में एक पोस्ट टाइप कर रहा था. टाइमिंग एकदम सटीक थी. लेकिन स्पेलिंग? वह तो बिल्कुल नहीं! अमेरिका के राष्ट्रपति ने लिखा, "witch will continue throughout the week" शायद वह दुनिया के एनर्जी बाजारों पर कोई जादू-टोना कर रहे थे. और सच कहूं तो ये बाजार पिछले कुछ समय से वैसे भी किसी जादू के असर में ही हैं.
ट्रंप के उस ऐलान से पहले भारतीय शेयर बाजार 1,500 अंक गिर गया था. पूरी दुनिया के साथ-साथ, हम भी लगातार तीन हफ्तों से अपना पैसा गंवाते जा रहे थे.
यह वही शख्स है जिसने महज तीन दिन पहले कहा था, "आप जानते हैं कि जब आप दूसरे पक्ष को पूरी तरह से तबाह कर रहे हों, तो आप युद्धविराम नहीं करते." वही शख्स जिसने शुक्रवार को सीना तानकर और ठुड्डी ऊपर उठाकर ऐलान किया, "मुझे लगता है कि हम जीत गए हैं."
सोमवार सुबह तक इस शख्स ने जिसे वे बड़े ही शानदार अंदाज में वॉर डिपार्टमेंट कहते हैं, उसे इन्होंने निर्देश दे दिया था कि सभी हमले पांच दिनों के लिए टाल दिए जाएं. न कोई जीत. न कोई समझौता. बस एक विराम.
क्या यह सुनकर कुछ याद आया? क्या 'TACO Bell' की घंटी बजी? देवियों और सज्जनों, 'TACO सिद्धांत' में आपका स्वागत है. ट्रंप हमेशा पीछे हट जाते हैं. सुनने में यह काफी दमदार लगता है, है ना? ठीक उस फायर अलार्म की घंटी जैसा, जिसे किसी ऐसी इमारत में घबराहट में आकर बजा दिया गया हो, जिसमें असल में कभी आग लगी ही न हो.
आइए उस कथित जीत की पड़ताल करें जिसे दुनिया के सामने पेश किया जा रहा है. ट्रंप ने ईरान के साथ हुई "बेहद अच्छी और सार्थक बातचीत" को अपने पांच-दिन के सीजफायर का आधार बताया और अमेरिकी स्टॉक मार्केट जो सुबह के समय गिर रहे थे, ट्रंप की इस पोस्ट के बाद अचानक तेजी से ऊपर चढ़ गए, जबकि तेल की कीमतें नीचे आ गईं.
यह घोषणा ठीक उसी समय की गई जब बाजार खुले थे; इसमें 'इनसाइडर टाइमिंग' जैसी एक-एक खास नफासत थी. उन्होंने कहा कि बातचीत सार्थक रही. बाजार ने उनकी बात पर यकीन कर लिया. लेकिन ईरानियों ने नहीं.
ईरान के विदेश मंत्रालय ने साफतौर पर इस बात से इनकार किया कि ईरान और अमेरिका के बीच कोई बातचीत हुई है, हालांकि इस क्षेत्र के कुछ देश तनाव कम करने की कोशिश करते दिख रहे थे. तो या तो ट्रंप ने ऐसे लोगों के साथ बहुत ही फायदेमंद बातचीत की जो वहां मौजूद ही नहीं थे, या फिर वे बहुत अच्छी बातचीत बिचौलियों के जरिए हुई, जिसे तेहरान सीधे संपर्क का दर्जा नहीं देता.
दोनों ही मामलों में कोई न कोई झूठ बोल रहा है, लेकिन उस देश का विदेश मंत्रालय तो झूठ नहीं बोल रहा है जिसने अभी-अभी ट्रंप के खाड़ी सहयोगियों को पीने के पानी से वंचित करने की धमकी दी थी. क्योंकि असल में ईरान ने यही करने की धमकी दी थी. ये गीदड़भभकी नहीं है. बल्कि एक ऐसी धमकी है जिसमें इरादा भी है.
UAE में पीने के पानी का 42%, सऊदी अरब में 70%, ओमान में 86% और कुवैत में 90% हिस्सा खारे पानी को मीठा बनाकर हासिल किया जाता है. IRGC ने ऐसी भाषा में जो न तो कूटनीतिक थी और न ही जिससे इनकार किया जा सकता था, यह साफ कर दिया कि इस क्षेत्र में अमेरिका और इजरायल से जुड़े सभी ऊर्जा, IT और वाटर ट्रीटमेंट प्लान के बुनियादी ढांचों को निशाना बनाया जाएगा.
CIA के 2010 के एक आकलन में ही यह चेतावनी दी गई थी कि अरब देशों में वाटर ट्रीटमेंट प्लान को नष्ट करने का परिणाम किसी भी अन्य उद्योग या वस्तु के नुकसान से कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकते हैं. ट्रंप ने इन धमकियों पर गौर किया, पेंटागन से आ रहे बिल को देखा, अमेरिकी मतदाताओं की कमर तोड़ती पेट्रोल की कीमतों पर नजर डाली, और अपना फोन उठा लिया. कुछ पोस्ट करने के लिए, स्थिति को रोकने के लिए, और रणनीति बदलने के लिए.
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी को 1970 के दशक के ऊर्जा संकट के बाद से ईंधन सप्लाई में सबसे बड़ी बाधा बताया है. वास्तव में यह वैश्विक तेल बाजार के इतिहास की सबसे बड़ी बाधा थी. ब्रेंट क्रूड की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार पहुंच गईं, और पिछले हफ्ते कुछ इंट्राडे पीक के दौरान ये कीमतें 126 डॉलर तक पहुंच गईं. इस स्ट्रेट से रोजाना होने वाला आवागमन जो इस साल की शुरुआत में 120 से ज़्यादा के ऑल टाइम हाई पर था, अब गिरकर लगभग शून्य हो गया है.
और फिर भी शुक्रवार को संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति पत्रकारों से कह रहे थे कि उन्हें इस स्ट्रेट की जरूरत नहीं है. "हमें इसकी जरूरत नहीं है," उन्होंने उस बेफिक्री के साथ कहा, जैसा कि कोई ऐसा व्यक्ति कहता है जिसने अपने ईंधन के लिए कभी खुद पैसे न दिए हों.
उनके अपने युद्ध मंत्री ने बात ज़्यादा साफगोई से कही. जब उनसे युद्ध के लिए जरूरी संभावित $200 अरब के बारे में पूछा गया, तो पीट हेगसेथ ने एक यादगार बात कही: "बुरे लोगों को मारने के लिए पैसे लगते हैं." यह बात ताजगी भरी ईमानदारी वाली थी. अब उस खर्च का बिल आ गया है. रक्षा विभाग खुद डॉलर नहीं छापता. उसे इसके लिए कांग्रेस से मंजूरी लेनी पड़ती है.
राष्ट्रपति के इस खास तरह के 'पोकर' खेल के नतीजे सिर्फ किताबी नहीं हैं. वे भू-राजनीतिक, पीढ़ियों तक असर डालने वाले और बेहद गंभीर हैं. 'अब्राहम समझौते' जो अमेरिका की मध्यस्थता से अरब और इजरायल के बीच संबंधों को सामान्य बनाने का एक बहुत सराहा गया ढांचा था. अब ज्वार के समय रेत से बने किसी महल जैसा नजर आता है.
जिन अरब सहयोगियों को फुसलाकर और मनाकर उन समझौतों में शामिल किया गया था, उनसे सुरक्षा की गारंटी का वादा किया गया था. अब वे अपनी आंखों के सामने यह देख रहे हैं कि कैसे तेहरान उनकी पानी की सप्लाई काटने की धमकी दे रहा है, और वॉशिंगटन भू-राजनीतिक तौर पर 'टाइम-आउट' का इशारा कर रहा है. अगर उदार होकर कहें तो यह नजारा बिल्कुल भी अच्छा नहीं है.
ईरान जैसा कि उम्मीद थी और जो सही भी है, अभी से ही अपनी जीत का जश्न मना रहा है. IRGC ने सरकारी टेलीविज़न, सोशल मीडिया और हर मुमकिन माध्यम से अपने लोगों को यह बताया है कि उसने एक महाशक्ति को सीधी चुनौती दी और उस महाशक्ति को झुकने पर मजबूर कर दिया.
ईरानी मीडिया ने सीजफायर को इस तरह पेश किया कि जैसे इसे इजरायल के कब्जो वाले इलाकों पर हमलों की चार लहरों के बाद "दुश्मन पर थोपा गया" हो; वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने दावा किया कि उसने "दुश्मन के मुख्य रणनीतिक लक्ष्य को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है."
यह नैरेटिव, चाहे सच हो या झूठ, अब पक्का हो जाएगा. इसे स्कूलों में पढ़ाया जाएगा. अगले दो दशकों तक हर बातचीत में इसका इस्तेमाल एक हथियार के तौर पर किया जाएगा. फारसी साम्राज्य जो पिछले 40 सालों से काफी हद तक कमजोर पड़ गया था, उसे अपनी खोई हुई कहानी फिर से मिल गई है.
वे अरब देश, जिन्होंने अपने कूटनीतिक भविष्य को अमेरिका की विश्वसनीयता पर दांव पर लगा दिया था, अब निराश और असमंजस में होंगे. वे राष्ट्रपति से मिन्नतें कर रहे थे, "मिस्टर प्रेसिडेंट, इस काम को पूरा कीजिए." लेकिन ये राष्ट्रपति किसी भी काम को पूरा करने के लिए खास तौर पर जाने नहीं जाते.
खाड़ी के राजतंत्रों को यह भरोसा दिलाया गया था कि अमेरिका उनकी सुरक्षा का एक अनिवार्य, अथक और कभी न खत्म होने वाला गारंटर है; अब उनकी रातों की नींद उड़ जाएगी. ट्रंप ने खुद NATO सहयोगियों पर यह कहकर जोरदार हमला किया कि उन्होंने युद्ध में मदद के लिए सैनिक और साजो-सामान भेजने में नाकामी दिखाई है. उन्होंने खुले तौर पर यह भी शिकायत की कि स्ट्रेट से होने वाली ज़्यादातर ऊर्जा की खेपें वैसे भी एशियाई बाजारों के लिए ही होती हैं. इसके जरिए ट्रंप ने अपने खास अंदाज में यह इशारा किया कि खाड़ी की समस्याएं खाड़ी वालों की ही समस्याएं हैं.
कोई भी यह कल्पना कर सकता है कि खाड़ी के क्राउन प्रिंस इस पूरे घटनाक्रम को उस शांत, नियंत्रित दहशत के साथ देख रहे होंगे, जो उन लोगों के चेहरे पर होती है जिन्हें अभी-अभी यह एहसास हुआ हो कि जिस बॉडीगार्ड के लिए उन्होंने पैसे दिए थे, वह असल में तो बस एक कलाकार निकला.
आर्थिक नुकसान कोई भविष्य की समस्या नहीं है. यह वर्तमान की समस्या है. दुनिया भर के उपभोक्ताओं को किराने के सामान और यात्रा के लिए ज़्यादा पैसे चुकाने पड़ सकते हैं, क्योंकि अमेरिका-इजरायल युद्ध के कारण पैदा हुआ ऊर्जा संकट लगातार गहराता जा रहा है.
भले ही स्ट्रेट कल खुल जाए, और भले ही इस हफ्ते की बातचीत से कोई ऐसी बात निकले जिसे वास्तव में 'डील' कहा जा सके, फिर भी बुनियादी ढांचा बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुका है, शिपिंग बीमा कंपनियां भी इस झटके से उबर नहीं पाई हैं, और एनर्जी प्रोडक्शन कैपासिटी भी इतनी जल्दी ठीक नहीं हो पाएगी.
कतर पहले ही कह चुका है कि अपने सबसे बड़े गैस उत्पादन केंद्र 'रास लफान' की मरम्मत में उसे तीन से पांच साल का समय लगेगा. व्यापारियों को पहले से ही यह उम्मीद है कि इस साल के बाकी समय में तेल की कीमतें ऊंची ही बनी रहेंगी, क्योंकि इस कमी को पूरा करने के लिए कोई वैकल्पिक सप्लाई अभी तैयार नहीं है.
यह युद्ध जो 28 फरवरी को एक ऐसे शख्स के बेपरवाह आत्मविश्वास के साथ शुरू हुआ था जिसने कभी खुद इसके नतीजों का सामना नहीं किया, ये जंग अब चार हफ्तों तक खींच चुका है और इसके ये नतीजे हुए: ईरान की क्षेत्रीय हैसियत बढ़ गई, ऊर्जा बाजार तबाह हुए, अमेरिकी सहयोगी खौफ में आ गए, बाकी दुनिया नाराज हुई, और पांच दिन का एक ब्रेक हुआ जिसकी घोषणा एक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर 'ALL CAPS' अक्षरों में की गई, जिस प्लेटफॉर्म का मालिक खुद राष्ट्रपति है.
ट्रंप को अपनी 'आर्ट ऑफ द डील' पर गर्व है, जिसे किसी और ने उनके लिए तैयार किया था. लेकिन यह तो 'नो-डील' की कला है. यह एक तरह की 'इनसाइडर ट्रेडिंग' है, जिसे बाकी सभी चीजों पर अभूतपूर्व प्राथमिकता दी जा रही है. वरना उन बातचीत का क्या मतलब है, जिनके बारे में ईरान का कहना है कि वे कभी हुई ही नहीं? वैसे, वह आखिर किससे बात कर रहे थे? दोस्तो, इसका जवाब राष्ट्रपति के दोस्तों के पास ही है; वे लोग बाजार में आई गिरावट का फायदा उठाएंगे, क्योंकि जब बाजार में भारी गिरावट आ रही थी, तब उन्होंने ही शेयर खरीदे थे. ऐसा इसलिए क्योंकि कुछ लोगों को इस बात की कोई चिंता नहीं है कि एक बिना सोचे-समझे और बिना किसी योजना के छेड़े गए युद्ध में ईरानी और साथ ही इजराइली लोगों का खून बह रहा है.