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तमिलनाडु के मंदिरों में 'फ्लाइट मोड' में मोबाइल, वजह विजय ही जानें!

तमिलनाडु सरकार ने 52 मंदिरों के परिसर में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी है. विजय सरकार के इस फैसले के बाद ईश्वर को भी शायद यह देखकर राहत मिलेगी कि अब मंदिरों में कंटेंट बनाने पर कम और भक्ति पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा.

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विजय सरकार ने मंदिर जाने वाले श्रद्धालुओं पर नियम सख्त किए हैं. (Photo- ITGD)
विजय सरकार ने मंदिर जाने वाले श्रद्धालुओं पर नियम सख्त किए हैं. (Photo- ITGD)

तमिलनाडु के मंदिरों में हजारों वर्षों से श्रद्धालु फूल, नारियल, कपूर के साथ प्रार्थनाएं करते आए हैं. इस दौरान वे अपनी निजी जिंदगी की परेशानियां भी भगवान से शेयर करते रहें, ताकि मन को शांति मिल सके. हालांकि वक्त बदलने के साथ-साथ 21वीं सदी के श्रद्धालुओं ने अपनी टोकरी में एक और चीज जोड़ ली है- वह है पूरी तरह चार्ज किया हुआ स्मार्टफोन.

शुरुआत में लोग मोबाइल से देवी-देवताओं की तस्वीरें और वीडियो बनाते थे. लेकिन जल्द ही ऐसा होने लगा कि मोबाइल ही श्रद्धालु को निर्देश देने लगा. पहले दर्शन का अर्थ था भगवान को देखना और उनकी दृष्टि में आना. अब अक्सर इसका अर्थ यह हो गया है कि हम भगवान को देख चुके हैं, यह बात बाकी सभी लोग भी देख लें.

ईश्वर और भक्त के बीच अब तीसरी आंख आ गई है- भगवान शिव की तीसरी आंख नहीं, बल्कि फोन के कैमरे की आंख.

दरअसल, विजय सरकार ने 1 सितंबर से प्रदेश के 52 प्रमुख मंदिरों के अंदर श्रद्धालुओं के मोबाइल फोन ले जाने पर पाबंदी लगा दी.  श्रद्धालुओं को दर्शन से पहले अपने मोबाइल फोन संबंधित काउंटर पर जमा करने होंगे. आमतौर पर इसके लिए पांच रुपये शुल्क लिया जाएगा.

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सरकार के इस फैसले का मकसद उन जगहों पर फोटोग्राफी और वीडियो बनाने से रोकना है, जहां यह प्रतिबंधित है. सेल्फी और सोशल मीडिया रील्स को हतोत्साहित करना है. लोगों की निजता की रक्षा करना है. भीड़ की आवाजाही को बेहतर बनाना है. मंदिरों में उस पवित्र और आध्यात्मिक वातावरण को फिर से कायम करना है, जो मंदिरों की मूल भावना का हिस्सा होना चाहिए.

सरकार का यह फैसला अदालत के निर्देश से भी जुड़ा है. दिसंबर 2022 में मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने तमिलनाडु के सभी मंदिरों में मोबाइल फोन पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया था, ताकि मंदिरों की पवित्रता बनी रहे. अदालत ने यह भी कहा था कि मोबाइल जमा करने के लिए लॉकर और सुरक्षा कर्मचारियों की व्यवस्था हो, ताकि श्रद्धालुओं को दर्शन के दौरान कोई दूसरी परेशानी ना हो.

कोर्ट के निर्देश के बाद विजय सरकार ने मंदिरों में मोबाइल के यूज को लेकर यह फैसला लिया. हालांकि, इस नीति को किस तरह लागू किया जाए, यह कितना निष्पक्ष हो और यह वास्तव में कितनी सफल हो, इन सबकी जिम्मेदारी अब सरकार की है.

दरअसल, स्मार्टफोन मंदिर में एक कैमरे के रूप में आया, फिर एक साथी बनकर रहने लगा और आखिरकार ऐसा व्यवहार करने लगा जैसे वही सृष्टिकर्ता हो.

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मोबाइल फोन पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में गंभीर तर्क है. मोबाइल को न तो मंदिर की पवित्रता भंग करने वाला कहना सही है और न ही इसे केवल निर्दोष कैमरा मानना. यह एक ऐसा टूल है, जो अब हमारी जिंदगी में व्यवहार और मानसिकता का हिस्सा बन चुका है.

जो लोग नियमित रूप से किसी प्रसिद्ध मंदिर में जाते हैं, उन्हें यह बखूबी पता है. जब कोई श्रद्धालु एक घंटे इंतजार करने के बाद गर्भगृह तक पहुंचता है, देवी-देवता के दर्शन के लिए उसे कुछ ही सेकंड मिलते हैं.

लेकिन उन कुछ सेकंड में से आधा समय वह सही एंगल और फ्रेम वाली तस्वीर लेने में लगा देता है. वह भी ऐसी तस्वीर, जिसे खींचना स्पष्ट रूप से मना है और जिसे शायद बाद में रखने लायक भी न समझा जाए.

कुछ लोग संकरे रास्तों में मंदिर के खंभों और मूर्तियों के सामने खड़े होकर फोटो खिंचवाते हैं. कोई वीडियो कॉल शुरू कर देता है ताकि अमेरिका में रहने वाली उसकी चाची भी दर्शन में शामिल हो सके.

कोई दूसरा लगातार अपनी आवाज में वहां हो रही चीजों के बारे में बताते रहता है. कोई तीसरा कतार में पीछे मुड़कर रील बनाने लगता है. इस तरह बाकी श्रद्धालुओं को बिना उनकी इच्छा के अपनी वीडियो के ‘कलाकार’ बना देता है.

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