नेपाल में आए फ्लैश फ्लड ने जो भीषण तबाही मचाई है, उसमें मृतकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. इस आपदा में सबसे दुखदायी ये है कई परिवारों को अपने प्रियजनों के शव भी नहीं मिल पा रहे हैं. इसलिए वह इस पशोपेश में हैं कि बिना शव के उनकी अंतिम संस्कार की प्रक्रिया कैसे पूरी कराई जाए. क्योंकि मृत्यु की सूचना के साथ ही घर में सूतक लग जाता है. इसके बाद जब तक मरने वाले व्यक्ति से जुड़े सभी संस्कार पूरे न हो जाएं सूतक नहीं हटता है, लिहाजा शुभ कार्यों पर भी एक तरह से रोक लगी रहती है.
नेपाल में लोग घास को शव मानकर कर रहे अंतिम संस्कार!
ऐसे में सामने आया है कि जिन लोगों की मृत्यु का पता चल गया है, लेकिन उनके शव नहीं मिल पा रहे हैं तो अब परिवार उनका लिए प्रतीकात्मक तौर पर अंतिम संस्कार का सहारा ले रहे हैं. नेपाल में बागमती नदी के तट पर कई परिवार के लोग कुश की घास से प्रतीकात्मक शव बना रहे हैं और न्हीं प्रतीकात्मक शवों का पशुपति आर्यघाट अंतिम संस्कार किया जा रहा है.
सनातन परंपरा की ओर देखें तो 16 संस्कारों में अंत्येष्टि आखिरी है. यह व्यक्ति की मृत्यु से जुड़ा है और इसमें मृतक के शरीर को सम्मान के साथ विदा करते हुए दशगात्र, पिंडदान, नारायण बलि और तेरहवीं जैसी परंपरा का पालन किया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया का विस्तार से जिक्र गरुड़ पुराण में मिलता है. लेकिन ये परंपराएं तो तब के लिए हैं जब मृतक का शव मौजूद हो.

क्या कहता है गरुड़ पुराण?
कई बार ऐसी परिस्थिति बनती है कि मरने वाले की सूचना तो मिल जाती है, लेकिन उसका शव भी नष्ट, गायब या लापता रहता है. ऐसी स्थिति में अंतिम संस्कार कैसे हो गरुड़ पुराण की प्रेतकल्प-परंपरा में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है.यानी मृत्यु हो गई हो, लेकिन शव प्राप्त न हुआ हो तो गरुड़ पुराण में क्या कहा गया है कि इस स्थिति में दर्भाकुश या कुशा घास का पुतला बनाकर शवदाह किया जाता है.
गरुड़ पुराण-सारोद्धार, प्रेतकल्प, अध्याय 10, श्लोक 88–90 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति, निर्जन स्थान या जंगल में मर गया हो, डाकुओं या चोरों द्वारा मारा गया हो या फिर किसी मृतक का उसका शव न मिल सके, तो उसकी मृत्यु का समाचार मिलने पर दर्भ यानी कुश घास से उसकी प्रतिकृति बनाकर उसका दाह करना चाहिए.
अथ कश्चिद्विदेशे वा वने चौरभये मृतः।
न लब्धस्तस्य देहश्चेच्छृणुयाद्यद्दिने तदा॥॥
दर्भपुत्तलकं कृत्वा पूर्ववत्केवलं दहेत्।
तस्य भस्म समादाय गङ्गातोये विनिक्षिपेत्॥॥
अर्थ: यदि कोई व्यक्ति विदेश में, वन में अथवा चोरों के भय से मारा गया हो और उसका शव प्राप्त न हुआ हो, तो जिस दिन उसकी मृत्यु का समाचार मिले तो दर्भ यानी कुश घास से उसकी प्रतिकृति बनाकर पूर्वविधि के अनुसार उसका दहन करें. फिर उसकी राख एकत्र करके गंगाजल में विसर्जित करें.
दशगात्रादिकं कर्म तद्दिनादेव कारयेत्।
स एव दिवसो ग्राह्यः श्राद्धे सांवत्सरादिके॥॥
इसके बाद उस प्रतीकात्मक दाह की राख को इकट्ठा करके गंगा या पवित्र जल में विसर्जित करने और उसी दिन से दशगात्र आदि क्रियाएं आरंभ करने का विधान है. वार्षिक श्राद्ध के लिए भी उसी तिथि को आधार बनाया जाता है. अब दर्भाकुश के पुतले का दाह संस्कार करने के बाद आगे सभी विधि उसी तरह से की जानी चाहिए, जैसे कि अन्य मामलों में की जाती है. गरुड़ पुराण-सारोद्धार के अध्याय 10 में श्लोक 88, 89 और 90 में इसका पूरा विधान मिलता है.
पुराणों में है पुत्तल या पुतला दाह संस्कार का जिक्र
इस तरह शव दाह करने को तृणपिंड दाह, पुत्तल दाह, दर्भादाह आदि कहा जाता है. दर्भकुश घास से शव की प्रतीकात्मक आकृति बनाकर उसका दाह-संस्कार किए जाने के बाद उसी दिन से दशगात्र और आगे के अन्य संस्कार किए जाते हैं. तेरहवीं के बाद घर में शुद्धि हो जाती है और फिर सूतक हट जाता है.
राजा सगर के पुत्रों का नहीं हो सका था दाह संस्कार
सवाल है कि क्या किसी पौराणिक घटना में ऐसा कोई उदाहरण मिलता है? इस तरह का मिलता-जुलता मामला श्रीराम के पूर्वज राजा सगर के पुत्रों से जुड़ा था. जब महर्षि कपिल ने राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को शाप से जलाकर भस्म कर दिया तो उनके शव नष्ट हो गए थे. इसलिए उनकी मुक्ति नहीं हो पाई थी. लेकिन उनके शव भस्म हुए ही थे, इसलिए उसे ही अंतिम संस्कार मान लिया गया.
फिर जब राजा भगीरथ गंगा नदी को धरती पर उतार लाए तब उनके स्पर्श से राजा सगर के पुत्रों की मुक्ति हो सकी थी. इसीलिए दर्भाकुश के शव का दहन करके उसकी राख को ही अस्थि मानकर गंगाजी (या पवित्र नदी) में विसर्जन करना चाहिए. गरुड़ पुराण में इस तरह के अंतिम संस्कार का विस्तार से वर्णन है. नेपाल में लोग इसी आधार पर अंतिम संस्कार कर रहे हैं.