प्रियंका गांधी लापता तो नहीं हैं. न ही कहीं कोई ऐसा पोस्टर ही लगा है. लेकिन, बातें तो ऐसी ही हो रही हैं. दलील यह दी जा रही है कि प्रियंका गांधी के होते हुए असम कांग्रेस में भगदड़ भला क्यों मचेगी? दलील में दम भी है. जब भी कांग्रेस नेताओं के बीच विवाद की स्थिति आती है, प्रियंका गांधी मोर्चा संभाल लेती हैं.
कांग्रेस की राजनीति में कई ऐसे मौके आए हैं जब प्रियंका गांधी वाड्रा को संकटमोचक के रूप में देखा गया है. चाहे मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पर विवाद हो, चाहे कहीं सीटों के बंटवारे को लेकर. ऐसे मौकों पर प्रियंका गांधी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. सचिन पायलट से लेकर सिद्धू तक, सभी को अपनी बात कहने का मौका प्रियंका गांधी ही देती रही हैं.
कुछ दिन पहले संसद में किरेन रिजिजू ने भी विपक्ष के नेता राहुल गांधी से तुलना करते हुए वायनाड सांसद प्रियंका गांधी की तारीफ की थी. बोले, 'कम से कम वे बैठकर सुनती तो हैं. आपके विपक्ष के नेता तो सुनते भी नहीं. वह मुस्कुराती भी हैं.'
अभी दो दिन पहले प्रियंका गांधी और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की मुलाकात का वीडियो सामने आया था. मुलाकात के दौरान राहुल गांधी भी मौजूद थे. यह तो है कि सब कुछ हो रहा है, लेकिन असम को लेकर प्रियंका गांधी की सक्रियता की कोई बात सामने नहीं आई है - असम में प्रियंका गांधी संकटमोचक वाली भूमिका में नजर क्यों नहीं आ रही हैं?
असम कांग्रेस में भगदड़ थम क्यों नहीं रही है
असम विधानसभा चुनाव के लिए मतदान 9 अप्रैल को होना है, और उससे पहले, महीने भर के भीतर असम के कई नेता कांग्रेस छोड़कर जा चुके हैं. ताजा और सबसे बड़ा झटका प्रद्युत बोरदोलोई का कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो जाना माना जा रहा है.
22 फरवरी को भूपेन बोरा से कांग्रेस छोड़ दी थी. 5 मार्च को कांग्रेस के 3 विधायक बीजेपी में पहुंच गए. फिर असम कांग्रेस के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष राणा गोस्वामी ने भी कांग्रेस छोड़ दी. यूथ कांग्रेस की नेता अंकिता दास और परबा दास कलिता ने भी कांग्रेस को अलविदा बोल दिया. प्रद्युत बोरदोलोई ने बीजेपी छोड़ने से पहले लोकसभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया. उनके बेटे प्रतीक बोरदोलोई को कांग्रेस ने मार्गेरिटा विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया गया है, लेकिन, बताते हैं, पिता के पार्टी छोड़ते ही बेटे ने भी कांग्रेस का टिकट ठुकरा दिया है.
प्रद्युत बोरदोलोई के कांग्रेस छोड़ने को लेकर जब प्रियंका गांधी से जब प्रतिक्रिया पूछी गई, तो 'दुर्भाग्यपूर्ण' बोलते हुए आगे बढ़ गईं.
बड़ा सवाल यह है कि प्रियंका गांधी के हाथ में असम चुनाव की कमान होने के बावजूद कांग्रेस के नेता पार्टी क्यों छोड़ रहे हैं?
कांग्रेस छोड़ने वाले किसी भी नेता ने प्रियंका गांधी का नाम नहीं लिया है. असम कांग्रेस प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह भी सीधे निशाने पर नहीं देखे गए हैं. कांग्रेस नेताओं की सबसे ज्यादा नाराजगी असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई की कार्यशैली को लेकर है.
ध्यान रहे 2015 में हिमंत बिस्वा सरमा के भी कांग्रेस छोड़ने की वजह गौरव गोगोई ही थे. तब मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई के तो गौरव गोगोई बेटे ही थे, राहुल गांधी को भी तभी से पसंद आते हैं. जब हिमंता बिस्वा सरमा ने अपनी बात रखनी चाही, तो अनसुना कर दिया गया. बाद में हिमंत बिस्वा सरमा ने आरोप लगाया था कि राहुल गांधी मुलाकात के दौरान अपने पालतू डॉगी ज्यादा इंटरेस्ट में ले रहे थे.
प्रियंका गांधी असम चुनाव में स्क्रीनिंग कमेटी की अध्यक्ष बनाई गई हैं, जिनका रोल उम्मीदवारों के चयन तक सीमित है. लेकिन, कांग्रेस की बड़ी नेता और गांधी परिवार से होने के कारण उनसे कहीं ज्यादा अपेक्षा की जा रही है. चुनावों में स्क्रीनिंग कमेटी का काम हर विधानसभा सीट के लिए उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि, संगठन के प्रति उनकी निष्ठा, इलाके में लोकप्रियता को बारीकी से परखना होता है. दलबदल की आशंका में उम्मीदवारों की छंटनी का काम भी स्क्रीनिंग कमेटी की ही जिम्मेदारी होती है. उम्मीदवारों के नाम पर आखिरी मोहर तो केंद्रीय चुनाव समिति ही लगाती है, लेकिन उम्मीदवारों के नाम स्क्रीनिंग कमेटी की तरफ से ही भेजे जाते हैं.
क्या केरलम में प्रियंका गांधी बेहतर नतीजे ला सकती थीं?
प्रियंका गांधी 2021 के असम विधानसभा चुनाव में भी काफी सक्रिय नजर आई थीं. तब छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल असम चुनाव में प्रियंका गांधी के साथ थे, जो उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश के चुनावों में उनके साथ रह चुके हैं. प्रियंका गांधी के साथ इस बार भी भूपेश बघेल को सीनियर ऑब्जर्वर बनाया गया है. कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार भी इस बार असम चुनाव में प्रियंका गांधी के साथ हैं.
जब प्रियंका गांधी को असम चुनाव में जिम्मेदारी दी गई, तो एकबारगी लोगों को काफी हैरानी हुई. प्रियंका गांधी वायनाड से सांसद हैं. जब राहुल गांधी वायनाड के सांसद हुआ करते थे तब भी प्रियंका गांधी केरलम की राजनीति में काफी रुचि लेती थीं, और संसद पहुंचने के बाद तो उनका हक भी बनता था.
केरलम में कांग्रेस भी असल के मुकाबले बेहतर स्थिति में है. लेकिन, लोकसभा सीटों के हिसाब से देखें तब. दोनों राज्यों की विधानसभाओं में तो नंबर लगभग बराबर है - निश्चित तौर पर अगर प्रियंका गांधी को कमान दी गई होती, अलग बात होती.
1. केरलम कांग्रेस में कई शक्ति केंद्र: केरलम में कांग्रेस के भीतर कई पावर सेंटर्स हैं. एक तरफ राहुल गांधी के करीबी केसी वेणुगोपाल और उनके संगी-साथी हैं, तो दूसरी तरफ शशि थरूर जैसे नेता भी हैं. अपनी अहमियत साबित करने के लिए शशि थरूर अक्सर राजनीतिक पैंतरे अपनाते रहते हैं. और, कहीं ज्यादा नुकसान न हो जाए, कांग्रेस भी जिनसे कांग्रेस हाईकमान को हमेशा शिकायत रही है. ऐसे में कांग्रेस के लिए विधानसभा चुनाव से पहले चुनौती पार्टी के भीतर के हालात को दुरुस्त करने की होगी.
प्रियंका गांधी की मौजूदगी केरलम में एक और पावर सेंटर बढ़ा देती, और कांग्रेस नेतृत्व के लिए भी नई चुनौतियां खड़ी हो सकती थीं.
2. केरलम में प्रियंका गांधी की सीमित भूमिका: केरलम में कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती टिकटों का बंटवारा है. प्रियंका गांधी के देशभर में कांग्रेस के भीतर उपजे विवादों में संकटमोचक की भूमिका निभाने के बावजदू, फ्री-हैंड देना जोखिमभरा लगा होगा. केरलम जैसे अति महत्वपूर्ण राज्य में सारे सूत्र राहुल गांधी और केसी वेणुगोपाल ने अपने हाथ ही रखे हुए हैं - प्रियंका गांधी अगर केरलम के मैदान में मोर्चा संभाल लेंगी, तो केंद्र में उनको रोल निभाने से कोई रोक नहीं पाता.