भारत सरकार और भारतीय जनता पार्टी रोज आठों प्रहर यह उपलब्धि गिनाते थक नहीं रही है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग के जरिए भारत ने कितनी बड़ी आर्थिक उपलब्धि हासिल की है. दावा किया जा रहा है कि 2014-15 से जून 2026 तक पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की वजह से देश ने करीब 1.90 लाख करोड़ रुपये का विदेशी मुद्रा भंडार बचाया. सरकार का तर्क है कि अगर यही ईंधन आयातित पेट्रोल के रूप में खरीदना पड़ता तो देश को उतनी विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती.
इसी के साथ सरकार ने इथेनॉल प्रोजेक्ट को और आगे बढ़ाने के लिए 4,687 करोड़ रुपये की ब्याज सब्सिडी योजना का ऐलान किया है. सरकार यह भी कह रही है कि 2014 से अब तक किसानों को इथेनॉल के लिए इस्तेमाल होने वाली फसलों के बदले करीब 1.66 लाख करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है. सरकार की नजर में यह प्रोजेक्ट एक साथ एनर्जी सिक्योरिटी, किसानों की आय और विदेशी मुद्रा की बचत का कंबाइंड मॉडल है.
लेकिन, E20 पेट्रोल को लेकर चल रही बड़ी बहस के बीच मंगलवार को आए खाद्य तेलों के आयात के आंकड़ों ने सरकार के डॉलर बचाने के दावे को तो आईना दिखा दिया.
11 साल की बचत, एक साल में खर्च
सरकार के अपने दावे के मुताबिक 2014-15 से जून 2026 तक इथेनॉल ब्लेंडिंग से करीब 1.84 से 1.90 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बची. दूसरी तरफ, 2024-25 ऑयल ईयर में भारत ने सिर्फ खाद्य तेलों के आयात पर करीब 1.61 लाख करोड़ रुपये खर्च कर दिए. जो 2025-26 में करीब 1.90 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है.
यानी इथेनॉल ब्लेंडिंग से करीब 11 साल में जितनी विदेशी मुद्रा बचाने का दावा किया जा रहा है, उतना सिर्फ एक साल के खाद्य तेल आयात में खर्च हो गया. दूसरे शब्दों में कहें तो इथेनॉल से बचाए गए डॉलर और खाद्य तेल खरीदने में खर्च हुए डॉलर लगभग बराबरी पर खड़े दिखाई देते हैं.
खाद्य तेलों के लिए विदेशों पर बढ़ती निर्भरता
भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक है. घरेलू उत्पादन देश की जरूरत पूरी नहीं कर पाता, इसलिए पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सूरजमुखी तेल का बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है.
सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 में देश ने करीब 1.60 करोड़ टन खाद्य तेल आयात किया. नवंबर 2025 से जून 2026 के बीच भी आयात का स्तर ऊंचा बना रहा. इस दौरान लगभग 1.04 करोड़ टन कच्चे खाद्य तेल और करीब 3.69 लाख टन रिफाइंड तेल आयात किया गया. कुल मिलाकर आठ महीनों में ही 1.03 करोड़ टन से ज्यादा खाद्य तेल विदेशों से मंगाया गया.
आंकड़े यह भी बताते हैं कि आयात में कच्चे खाद्य तेल की हिस्सेदारी 95 से 100 फीसदी के बीच रही, यानी भारत की विदेशी बाजार पर निर्भरता अभी भी बहुत ज्यादा है.

जुलाई में फिर बढ़ा आयात
खाद्य तेलों की यह निर्भरता कम होती नहीं दिख रही. रॉयटर्स की एक रिपोर्ट बता रही है कि जुलाई 2026 के महीने में ही भारत का खाद्य तेल आयात पिछले दस महीनों में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है़. इसकी सबसे बड़ी वजह पाम ऑयल के आयात में तेज बढ़ोतरी रही. इसका मतलब है कि सरकार को यदि विदेशी मुद्रा बचाने ही थी, तो उसने खाद्य तेल की आत्मनिर्भरता पर फोकस क्यों नहीं किया?
इकोनॉमिक सर्वे की आशंका सच साबित हुई
सरकार का इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 भी एक अहम बात की ओर इशारा करता है. सर्वे में कहा गया है कि कई इलाकों में किसान मक्का और दूसरी फसलों का रुख इथेनॉल उद्योग की डिमांड को देखते हुए बदल रहे हैं. साथ ही कुछ क्षेत्रों में तिलहन की खेती का रकबा भी प्रभावित होने की आशंका जताई गई है.
हालांकि सर्वे यह नहीं बताता कि इसकी वजह से खाद्य तेल आयात पर कितना अतिरिक्त बोझ पड़ा. लेकिन यह जरूर संकेत देता है कि फसलों का रकबा बदलने का असर खाद्य तेल उत्पादन पर पड़ सकता है. इथेनॉल के लिए उगाए जाने फसलों और तिलहन के बीच बढ़ती स्पर्धा पर इकोनॉमिक सर्वे की ये कुछ लाइनें पूरी चिंता का सारांश बयां करती है-
'दालें और तिलहन भारत की खाद्य जरूरतों के लिए बेहद जरूरी हैं. लेकिन जब से इथेनॉल प्रोजेक्ट शुरू हुआ है, इनकी प्राथमिकता घटती जा रही है. कहीं ये असंतुलन खाद्य तेलों के इंपोर्ट और सप्लाय कम होने से घरेलू खाद्य जरूरतों के लिए विदेशों पर हमारी निर्भरता न बढ़ा दे. अंत में इससे यही होगा कि भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता और खाद्य आत्मनिर्भरता आपस में टकरा रही होंगी.'
बड़ा सवाल यही है
यहीं से बहस शुरू होती है. अगर देश का उद्देश्य विदेशी मुद्रा बचाना है, तो क्या केवल पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने पर जोर देना पर्याप्त है? या फिर उतनी ही गंभीरता से तिलहन उत्पादन बढ़ाने की भी जरूरत है?
इथेनॉल के बहाने सरकार जिस किसान की आय बढ़ाने का दावा कर रही है, उसी किसान समेत भारत की बाकी आबादी महंगे आयातित खाद्य तेल खरीदने में अपनी जेब ढीली कर रहे होंगे.
कृषि अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग लंबे समय से कहता रहा है कि भारत की खाद्य तेलों पर आयात निर्भरता ऊर्जा आयात जितनी ही गंभीर चुनौती है. अगर देश में सरसों, सोयाबीन, सूरजमुखी और दूसरी तिलहन फसलों का उत्पादन तेजी से बढ़े, तो हर साल लाखों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचाई जा सकती है.
ऐसे में ये सवाल उठना लाजमी है कि जिस जमीन पर तेजी से गन्ना और मक्का जैसी इथेनॉल फीडस्टॉक फसलें बढ़ाई जा रही हैं, क्या उसके एक हिस्से का इस्तेमाल तिलहन उत्पादन बढ़ाने में किया जा सकता था?
दो तस्वीरें, एक चुनौती
इसमें कोई संदेह नहीं कि इथेनॉल ब्लेंडिंग ने पेट्रोल आयात पर कुछ दबाव कम किया है और किसानों के लिए एक नया बाजार भी बनाया है. लेकिन दूसरी तरफ खाद्य तेल आयात का लगातार बढ़ता बिल यह भी दिखाता है कि विदेशी मुद्रा बचत की तस्वीर अधूरी है.
एक तरफ सरकार इथेनॉल से 11 साल में बचाए गए लगभग 1.90 लाख करोड़ रुपये को उपलब्धि बता रही है. दूसरी तरफ, देश लगभग उतनी ही रकम सिर्फ एक साल में खाद्य तेल खरीदने पर खर्च कर रहा है.
यानी विदेशी मुद्रा बचाने की लड़ाई सिर्फ पेट्रोल पंप पर नहीं लड़ी जा सकती. एक चुनौती रसोई में जलने वाले तेल की भी है.