एक बड़ा पुराना क़िस्सा है कि एक बार चांदनी चौक के एक बंग्ले में डकैती पड़ गयी... चार पांच डकैत थी... बंदूक वंदूक लेकर घुस गए अंदर... लूटपाट की... लेकिन तब तक पुलिस को खबर हो गयी... पुलिस जब तक आई तब तक वो डकैत भाग रहे थे... एक पुलिस वाले ने गोली चला दी...एक डकैत के लगी भी लेकिन वो लोग भाग गए... अब शुरु हुई इसकी इनवेस्टीगेशन... कि वो कहां के थे... कौन थे... कोई सुराग तो था नहीं, किसी को पता नहीं... तो फिर पुलिस ने पूरे सीन को रिक्रिएट किया तो याद आया कि जब पुलिस ने गोली चलाई थी तो एक डकैत को लगी थी... तो वो चिल्लाया था "अरे खां गोली लगवा दी" खां... "खां?" पुलिस ने सोचा कि ये खां तो भोपाल में बोला जाता है... कहीं ऐसा तो नहीं कि वो भोपाल से आए थे... इसके बाद पूरी इवनेस्टीगेशन भोपाल में हुई... और छ महीने के बाद वो डकैत पुलिस को भोपाल में ही मिले और वहीं धर लिये गए।
तो किस्सा सच्चा झूठा पता नहीं लेकिन तमाम लोग इसे सुनाते हैं भोपाल से मुंसलिक करके सुनाते हैं... इसमें कोई दो राय भी नहीं हैं कि भोपाल की जो ज़बान है वो बेहद शीरीं ज़बान लेकिन आप इस ज़बान को ज़रा औऱ ग़ौर से सुने तो पाएंगे कि ये दरअसल की कहन की ज़बान है, किस्सा कहने की ज़बान... मुबालगे की ज़बान है... यानि बढ़ा-चढ़ा कर कोई बात कहना ताकि उसने लुत्फ आए.... ये ज़बान ऐसे ही डेवलेप हुई है कि इसमें आप किसी को किस्सा बता सकें और इस तरह बताएं कि सुनने वाला हुक जाए... जैसे मान लीजिये किसी ने पूछ लिया... "क्या बात है खां बड़ी जल्दी आ गए ... सड़क पर ट्रफिक न मिला क्या"अब देखिए जवाब "मेने एक बार भाई साहू... बात यूं हुई कि नवाब साहब का हेलिकॉप्टर हो गया खराब... इकदम नई चल्ला भाई.. बड़े बड़े मकैनिक बुला लिये, इंजीनयर आ गए.. कुछ न हुआ.... फिर नवाब साहब ने हमें बुलाया... कि आ के देखो क्या मसला है... हमको नवाब साब हमको बहुत मानते थे... केने लगे देखो मियां.. हेलिकॉप्टर स्टार्ट तो हो रिया है लेकिन जब गियर मारो तो एक दम चित खड़ा रहे है"
मेने भी कहा नवाब साहब, ये हमने भी बाल धूप में बेठे-बेठे सफेद नई किये.... हमने भी बड़े-बड़े हेलिकॉप्टर चला के पुराने कर दिये हैं... हम पेंचकस अपना लेकर आए थे... पुर्ज़े पुर्ज़े खोल दिये... लेकिन... मामला समझ में न आए... बड़ी देर तक देखा खां फिर जो बोनट पर धप्प से हाथ मारा है तो बोनट यूं... और हमने पहली नज़र के दिये कि फेन बेल्ट इसकी टूटी..." नवाब साहब खुश... केने लगे मियां तुमने तो बड़े बड़े इंजीनियरों को फेल कर दिया... केने लगे तुम्हारी फीस क्या है... हमने कहा नवाब साहब शर्मिंदा न करें... फीस तो ग़ैरों से ली जाती हैं... केने लगे "खाली हाथ न जाने देंगे... अच्छा ऐसा करो... ये ले लो... ये हमारे हेलीकॉप्टर का पेट्रोल है... दो पीपों में था... ले जाओ इसको... खां कसम से बता रिया हूं दोनों डिब्बे हेलीकॉप्टर वाले पेट्रोल के यूं उठा के घर ले आया... और जो अपनी मोटरसाइकल में डाली है... तो समस से तीन दिन से मोटरसाइकिल ट्रैफिक के दो फुट ऊपर चल रही है... जभी आ गया जल्दी"
तो ये जो किस्सा है इसे कहते हैं पटियेबाज़ी.... भोपाल की पटियेबाज़ी... क्या है भोपाली लोगों की इस मज़ेदार ज़बान का किस्सा... आज स्टोरीब़क्स में सुनाऊंगा भोपाली ज़बान और उसमें सुनाए जाने वाले कुछ मशहूर किस्से....
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देखिए हर शहर का अपना एक कल्चर होता है... जैसे लखनऊ जाइये तो खाने वाले मिलेंगे.. आप जनाब और नफीस उर्दू वाला कल्चर मिलेगा... बनारस जाइये तो अलग तरह का कल्चर है ... रोहानी माहौल... इसी तरह हैदराबाद का अपना कल्चर है... भोपाल का क्या है कि यहां कल्चर है पटियेबाज़ी का... यानि सड़क चौराहों चाय की दुकानों पर पटिये लगे रहते हैं... यानि बैठने की जगह और वहां आदमी बैठ कर किस्से सुनाता है... मज़े की बात ये है कि किस्से सुनाने वाला और सुनने वाला दोनों जानते हैं कि किस्सा झूठा है लेकिन लुत्फ आता है... मज़ा आता है सुनने में... वो बड़ा चढ़ा के आपको किस्सा सुनाएंगे कि आप को मज़ा आएगा... और इतने सलीके से झूठ बोलेंगे कि आप जानते हुए भी उसे सच मान लेंगे वो... शेर है ना वसीम साहब का ... कि वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से... मैं ऐतबार न करता तो और क्या करता... ये एक खत्म होती हुई आर्ट है भोपालियों की... लेकिन आज भी इस बतोलेबाज़ी की कला को ज़िंदा रखने वालों की कोई कमी नही है। स्टोरीबॉक्स में इसकी बात करने का ख्याल यूं आया कि एक बतोलेबाज़ से दो रोज़ पहले मुलाकात हो गयी... तो कुछ मौसम की बात चल रही थी... कि ठंड आने वाली है... इस बार ठंड तेज़ होगी... कहने लगे
"मियां जमशेद भाई, आजकल अब तो ठंड पड़ती है... ठंड तो हमाए ज़माने में पड़ती थी... एक साल तो खां एसी पड़ी कि बड़ा तलाब और छोटा तलाब दोनों जम गए... हालत एसी हो गयी कि तालाब के ऊपर हम किरकेट खेल ले भिया... और जो हमने मारे हैं चौके छक्के तो बाल जा रही अरेरा कॉलोनी तक... इधर मार रे शॉट तो जा रही साकेत नगर... एक शॉट तो ऐसी मार दी इंदौर से तीन किलोमीटर पहले गिरी बॉल..." मुझे हंसी आई तो मैंने कहा, मियां जब फेंक ही रहे हो तो गेंद इंदौर से तीन किमी दूर क्यों गिराई... इंदौर में ही गिरा देते... कहने लगे... “अच्छा तो अब तीन किलोमीटर के लिए हम झूठ बोल दे?”
एक और किस्सा हमारे एक दोस्त सुनाते थे सलीम नशेड़ी का... वो भी सुन लीजिए... भोपाल में एक साहब थे उनका नाम था सलीम नशेड़ी, दिन भर अपने कमरे में लेटे नशा करते रहते थे। काम धाम से कोई ताल्लुक था नहीं। नहाने धोने की परवाह कभी करते नहीं थे। एक रोज़ उनके घर कुछ जमाती आए... वो कुछ दाढ़ी वाले लोग जो ऐसे भटके हुए लोगों को रास्ता दिखाते हैं... समझाते हैं... कि भई काम धंधा करो, ज़ंदगी में कुछ बनो, साफ सफाई रखो और नमाज़-रोज़े की पाबंदी करो। तो वो जमाती एक रोज़ इनके दरवाज़े आ गए.. और इनको समझाया बुझाया... अच्छा समझाने का फायदा भी हुआ.... सलीम नशेड़ी को तौफ़ीक मिल गयी। इन्होंने नशा छोड़ दिया... और बिल्कुल अल्लाह वाले बन गए... ये दाढ़ी बढ़ा ली... और जमातियों के साथ गश्त वश्त करने लगे। बल्कि दूसरे जो भटके हुए लोग थे उनको समझाने लगे कि भई आप दीन की राह पर आइये.... लेकिन एक चीज़ ये हो गयी कि जमाती जब भी किसी नए मोहल्ले में जाते तो वहां लोगों से कहते, "देखिए भई... अल्लाह किसी को भी तौफ़ीक दे सकता है.. सुधरने का मौका दे सकता है... अब इन्हें ही देखिए, ये सलीम हैं, पेले बहुत चरस पिया करते थे। बहुत बड़े वाले नशेड़ी थे... घर में पड़े लोटा करते थे। ये जितना अपने घर में नहीं मिलते थे... उससे ज़्यादा शहर की नालियों में भी पाए जाते थे... कसम खुदा की कह रिया हूं भाई.... इनकी और घर की टूटी-बेकार चप्पल की ज़िंदगी समझ लीजिए एक जैसी थी। लेकिन अब इन्हें देखिए। कोई के सकता है कि कभी लोग इन्हें कुत्ते की तरह दुतकारते थे.... अब तो माशाल्लाह आपके सामने खड़े हैं... अल्लाह मियां जिसको भी तौफ़ीक दे दे" अब बेचारे सलीम चरसी ख़ड़े सुनते रहते। हालांकि लोगों पर इस बात का बड़ा असर पड़ता। कई लोग सही रास्ते पर आ गए। इसलिए जमातियों ने सलीम के बारे में और लोगों को बताना शुरु कर दिया। उन्हें लगा ये पैंतरा काम कर रहा है... तो ये बेचारे जो अब वो सब छोड़ चुके थे... जमाती लोग उनके वही दिन लोगों को याद कराते और इस बहाने सही रास्ते पर लाते...
एक दिन जमात एक दूसरे शहर गयी। जमात के 'अमीर' ने गश्त के दौरान एक शख्स से बात करते हुए फिर कहा, "देखो खां... तोफ़ीक तो अल्लाह देता है। अब इनको देखिए.. ये हमारे साथी हैं। सलीम नाम है माशाल्लाह, कभी नशेड़ी हुआ करते थे। इनकी ज़िंदगी ज़िल्लत से भरी हुई थी। दुनिया भर की लानतें इनके मुंह पर थीं। सलीम हाथ बांधे बेचारे सर हिला रहे... “बेशक-बेशक” मौलाना साहब बोले जा रहे... “तो भिया.. ये समल्लो लो कि इतना नशा करते थे... कि एकदम चितत हो जाते थे... और हालत ये था खां कि इनमें और गली के कुत्ते में कोई फर्क नहीं रहता था... लेकिन आज देखिए माशाल्लाह..." उस शख्स ने सलीम से हैरानी से पूछा, "हैं भाईजान? ऐसा था क्या?" सलीम नशेड़ी ने सर झुका कर बहुत बेचारगी से कहा, "हां खां... लेकिन ये भी समझ लीजिए कि इज़्ज़त और बेइज़्ज़ती देने वाला खुदा है। वरना लोग चरस पीते हुए उतना ज़लील नहीं होते, जितना मैं चरस छोड़कर हुआ हूं”
तो ये है भोपाल का रंग... वैसे कुछ भोपाली किस्सों में मुबालगा होता है यानि अतिश्योकिति होती है... और इतनी ज़्यादा की किस्सा अनबिलीवबल लगता है... लेकिन मसला उसका बस आपको हंसाना जैसे...और कभी ऐसा होता है कि जोक का जो बेसिक स्ट्रक्टर है वो बहुत ऊंचाई पर होता है... आप सोचेंगे अब क्या होगा... अब क्या होगा... और अचानक से यूं ही खत्म हो जाता है... जैसे ये वाला देखिए... एक भोपाली खां ठंड की रात में बाग में आग जला के बैठे हाथ ताप रहे हैं... साथ मे कुछ कम उम्र लड़के हैं... एक ने कह दिये... “चच्चा हम लोग हाथ ताप रहे हैं... मान लीजिए शेर आ जाए तो”
तो एक कहेंगे “आ... जाए मतलब... अरे चुका है भिया... और एसा-वेसा शेर... ये लंबा और ये चौड़ा... दहाड़ दे तो कटारा हिल्स तक आवाज़ जाए... अब हमें क्या हम बेठे इसी बाग में हाथ ताप रहे थे... कि अचानक से... शेर मेरे बिल्कुल पीछे आकर खड़ा गिया... इतना करीब कि उसकी गर्म गर्म सांसे मेरी गर्दन पर .. यहां पीछे महसूस हो रही हैं मुझे... “तो... फिर... फिर क्या किया चच्चा?” करना क्या था चेले... हमने कॉलर ऊपर कर ली... किस्सा ही खत्म...
अब इस जोक में कोई क्लोज़र नहीं था... लेकिन लास्ट वाली लाइन आपको बताती है कि आप बेवकूफ हैं जो इस पर भरोसा कर रहे थे... तो ये कहन की एक आर्ट है... भोपाल में सिर्फ कहना का तरीका नहीं है... माकूल जवाब देने का भी हुनर है... और एक मज़ेदार किस्सा सुनाता हूं...
तो हुआ यूं साहब कि हैदराबाद से आए एक साहब किसी दिल्ली वाले से बात कर रहे थे। बातचीत का मौज़ू खाना था। हैदराबाद वाले ने कहा, 'देखिए खाने की सलाहियत तो हैदराबाद वालों को ही है... बाकी लोग तो बस कोशिश करते हैं खाना बनाने की। आप यकीन नहीं करेंगे कि एक ज़माना था कि हमारे यहां जो बिरयानी बनती थी हैदराबाद में... उसका चावल साहब... सुबह भिगो दीजिए तो दोपहर तक उंगली बराबर हो जाता था...”क्या बात कर रहे हैं” “हां भई, आप एक चावल को चम्मच से काटकर खा सकते थे इतना बड़ा होता था'.... दिल्ली वाला बोला... "ये तो कुछ भी नहीं है... हमारी पुरानी दिल्ली में एक दुकान थी... जिसके बारे में हमारे दादा कहते थे कि वहां चावल इतना शानदार था.. कि एक चावल दोपहर में भिगो दीजिए तो शाम तक इतना बड़ा हो जाता था कि चार चावल में पेट भर जाता था... नींद आने लगती थी। बाकायदा... दुकान पर सोने का इंतज़ाम किया जाता था। वहां बिस्तर लगे रहते थे, बस तकिया खुद से लेकर आना होता था"
तभी उन दोनों की नज़र पास बैठे एक भोपाली पर गयी जो मुस्कुरा रहा था। उन्होंने कहा, "अरे आप मुस्कुरा क्यों रहे हैं... कुछ आ भी बताइये...भोपाल की बिरयानी का चावल कितना बड़ा होता था?" वो भोपाली मुस्कुराया फिर सर खुजाते हुए बोला, "अब...ठीक-ठीक तो याद नहीं, बात बहुत पुरानी हो गयी लेकिन हां हमारे दादा-अब्बा बताते थे कि उनके ज़माने में भोपाली बिरयानी में चावल इतना बड़ा होता था कि एक चावल रात में भिगो दीजिए तो सुबह फूल कर तकिया के बराबर हो जाता था”
- “क्या बात कर रहे हैं तकिये के बराबर”
- हां गांव तकिये के बराबर, लंबा
फिर दिल्ली वाले की तरफ देखकर बोले, “फिर कुछ लोग वही एक चावल तकिया बनाकर दिल्ली चले जाते थे... सोने के लिए”
तो ये है रंग जो भोपाल का है, भोपाली पटियेबाज़ी का है... बतोलेबाज़ी का है ... वो इसलिए है क्योंकि वहां आज भी दूसरे शहरों के मुकाबले कुछ फुर्सत है... कुछ सांस लेने का मौका है... ज़िंदगी थोड़ी सुस्त हालांकि उतनी भी नहीं जितनी पहले होती थी... लेकिन फिर भी भोपाल अपने कतार के शहरों में आज भी दिलकश है, खूबसूरत है, मज़ेदार है और किस्सागो ...