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कहानी : आख़िरी उम्र का इश्क़ | स्टोरीबॉक्स विद जमशेद

ये कहानी है एक ऐसे अमीर रईस की जो चालीस साल के बाद अपने उस इश्क़ की तरफ लौटता है जिसे वो जवानी में छोड़ आया था... वो इश्क़ जो उसे इसलिए छोड़ना पड़ा क्योंकि वो बगावत नहीं कर पाया था अपने वालिद से... पर अब जब वो उम्र के उस मोड़ पर है जहां वो तन्हा है, अकेला है तो वो उस आफ़रीन को ढूंढता है जिसे छोड़कर आया था... अब आफ़रीन कैसी है, कहां है... क्या हुआ था उसके साथ... क्या वो अपनाएगी खां साहब को.. दोबारा? देखिए जमशेद क़मर सिद्दीक़ी की लिखी कहानी 'आख़िरी उम्र का इश्क़' स्टोरीबॉक्स में

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Aakhir Umr Ka Ishq
Aakhir Umr Ka Ishq

हाइवे पर नीले रंग की एक तेज़ गाड़ी चली जा रही थी... ये गाड़ी थी इनायत अली खां साहब की... खां साहब रसूलपुर स्टेट के मालिक थे. खानदानी रईस थे... रसूलपुर में उनकी कई खानदानी हवेलियाँ थीं जिनमें से एक में वो खुद रहते थे. अपने बाकी में उनके बेटे, बेटियां और नाती-पोतियां। कुछ साल पहले उनकी बीवी पैंसठ की उम्र में... गुज़र गयीं। तब से खां साहब ने गोल्फ खेलना भी छोड़ दिया था और दुनिया से कटे-कटे रहने लगे। लेकिन दिन ठहरे हुए पानी में एक कंकड़ उछल गया. हुआ यूँ की खां साहब के एक पुराने दोस्त थे शौकत मिर्ज़ा .... जो उस ज़माने से उनके साथ थे जब ये दोनों कैनिंग यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे... कैनिंग कॉलेज, जो बाद में लखनऊ यूनिवर्सिटी बना। तो एक दिन शौक़त मिर्ज़ा का फोन आया खां साहब के पास... यहाँ-वहाँ की बातचीत के बाद मिर्ज़ा ने कहा, "यार इनायत, दो हफ़्ते पहले एक अजीब बात हुई, मैं एक खानदान की शादी में गया था... लौटते वक्त जलापुर नाम की एक बस्ती में गाड़ी खराब हो गयी... वहाँ एक औरत मिली... वो लगभग नाबीना है, देख नही सकती... पर मुझे लगता है कि वो... वो आफ़रीन है... आफरीन याद तो होगी तुम्हें. या भूल गए?"

 

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आफ़रीन का जिक्र आते ही खां साहब चौंक गए... "क्या? आफ़रीन?" जवानी के दिनों के अपने अधूरे इश्क़ का जिक्र सुनकर, बस यही तीन जुमले उनकी कांपती आवाज़ से निकल सके। मिर्ज़ा बोले, "हाँ यार पूरे एतबार से तो नहीं कह सकता लेकिन अंदाज़ा है कि वो आफरीन ही है। जलालपुर में बहुत बुरे हालात में ज़िन्दगी गुज़ार रही है"

इस जानकारी ने खां साहब के ज़हन में उबाल ला दिया... वक्त कुछ सुनी-सुनी सी दास्तान सुनाने लगा था. गुज़रे हुए ज़माने की झलकियाँ आँखों के सामने से गुज़रने लगी थीं. आज से 40 साल पहले आफरीन खां साहब का जुनून था. तब वो एक जवान और मजबूत कद-काठी का नौजवान हुआ करता था. रसूलपुर के एक ज़मींदार घराने का लड़का जिसकी मुस्कुराहट पर लड़कियाँ फिदा थी. वो जब गाँव में अपनी बग्घी पर गुज़रता था. तो इलाके की लड़कियाँ अपना दिल थाम लेती थीं. पतली मोहरी वाली पतलून कंधों पर कसा हुआ कोट और दिलफरेब मुस्कुराहट... इलाके का सबसे खूबसूरत नौजवान हुआ हुआ करते थे खां साहब.... लेकिन खां साहब का दिल आया ऐसे चेहरे पर जो खूबसूरत तो था लेकिन उन्हीं के हवेली में मुलाजिमा थी, नौकर थीं. आफरीन... रसोई में खाने की तैयारी करना, आने वाले खास मेहमानों के हाथ धुलाना, जब फसल कट कर आए तो बाकी औरतों के साथ बैठकर गेहूं छानना.. ये सब काम थे....  ये वही वक्त था जब खां साहब दो मंजिल पर पतंग उड़ाया करते थे और तनी हुई पतंग की डोर संभालते हुए बार-बार झांककर नीचे बरामदे की तरफ देखते थे. कभी नजरें मिल जाती तो दोनों तरफ से मुस्कराहट की अदला-बदली होती। आफ़रीन सब समझती थी, वो शर्म के मारे सर झुका लेती और खां साहब मुस्कुराते हुए दीवार से टिक कर खड़े हो जाते.

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आफ़रीन की एक सहेली उससे कहती, "काम पर ध्यान दे, ऊपर मत देख" आफरीन भी जानती थी कि उफक पर नज़र डालो तो ज़मीन और आसमान मिलते हुए लगेत तो हैं लेकिन वो असल में मिलते नहीं है... ज़मीन और आसमान कभी नहीं मिलते।

बहरहाल वक्त गुजरता रहा और इश्क परवान चढ़ता रहा… हवेली में सबकी नज़र बचाकर चलते फिरते वो एक दूसरे को कभी छेड़ देते कभी कोई जुमला खान साहब कहते हुए गुजर जाते तो घंटो आफरीन के कान गर्म रहते और चेहरे पर तबस्सुम छाया रहता. उन्हें याद था कि एक बार हवेली की छत पर जब खान साहब अकेले बैठे कुछ पढ़ रहे थे. तो अफरीन उनके लिए चाय लेकर आई थी. लीजिए, कहते हैं उसने चाय मेज पर रख दी. वाह चाय तो बड़ी अच्छी बनी है. खाँ साहब ने कहा तो वो हँसते हुए बोली "बिना पिए इतना भरोसा" खां साहब ने किताब का पन्ना पलटते हुए कहा "भरोसा चाय पर नहीं बनाने वाले हाथों पर है" आफरीन मुस्करा दी.. तभी उसकी नज़र खां साहब की किताब के दो पन्नों के बीच में रखे मोरपंख पर गई। वो बोली, - "मोर पंख वाह"

"तुम्हें पसंद है?" खां साहब ने पूछा तो आफरीन ने बच्चों की तरह हाँ में सर हिलाया और कहा, "मेरी सहेली कहती है कि एक मोरपंख किताब में रखो तो कुछ साल बाद दो हो जाते हैं" उसकी मासूमियत पर मुस्कुराते हुए खां साहब बोले, "अच्छा... ऐसा है तो फिर ये तुम रख लो... अगर ये दो हो जाएं तो एक मुझे लौटा देना" ना जाने कितने रातें उसे अपनी तकिया के नीचे रख कर सोती रही। पर अब ये इश्क़ का अफ़साना आगे बढ़ गया था... उनकी अक्सर मुलाकातें होने लगी थीं… वो दुनिया की नज़र बचाकर एक-दूसरे का हाथ थामे कस्बे की नहर के पास घंटो बैठे रहते थे लेकिन इश्क़ जब आगे बढ़ता है तो इम्तिहान मांगता है। इस रिश्ते को भी इम्तिहान से गुज़रना पड़ा।

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खां साहब के वालिद सुल्तान अहमद खान को जब इस रिश्ते की ख़बर हुई तो उनकी रगों में दौड़ते शाही खून में उबाला आ गया। उस दोपहर हवेली की दीवारों ने उनकी चीखती आवाज़ सुनी, "हमारा खानदानी खून पिछले तीन सौ सालों की विरासत का खून है... तुम्हारी अय्याशी की वजह से इस खून में मिलावट नहीं होने देंगे.. ये मुमकिन नहीं होगा... सुन रहे हो तुम?" खां साब की जुबान से कुछ निकल सका... कुछ भी नहीं। इश्क की कहानियों में बग़ावत जीत जाती है पर असल में ऐसा नहीं होता। झूठ कहते हैं वो जो कहते है की इश्क हर बार जीतता है, इश्क कभी कभी हार भी जाता है। नहीं होती सब में हिम्मत दुनिया से टकरा जाने की बग़ावत की आग की चिंगारी सब में कहाँ होती है. हालांकि ऐसा भी नहीं था कि इनायत अली खान ने अपने वालिद सुलतान अहमद खान को समझाने की कोशिश नहीं की... लेकिन बात नहीं बनी… आखिरी रास्ता बगावत का था जो खां साहब नहीं कर सके.

उसी हफ्ते आफ़रीन को हवेली से निकाल दिया गया। और अगले दिन हवेली से एक नौकर उसके घर पहुंचा। आफरीन के सामने नोटों की गड्डियाँ रखते हुए कहा कि वो इनायत अली खान की जिंदगी से निकल जाए. ये सारे रुपए रख सकती है। बोला, “हुज़ूर ने बस ये कहा है की इसके बाद आप इस कस्बे में, इस इलाके में दोबारा नज़र मत आइएगा”

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आफरीन ने थाल में रखे नोटों के बंडलों को गौर से देखा और आँसुओं से उसकी नज़र धुंधला गई। इसके बाद आफ़रीन और उसका परिवार कहाँ गया, कोई नहीं जानता. ना किसी ने उसके बाद उन्हें इलाके में देखा, ना कहीं से उनकी कोई खबर आई.

लेकिन आज 40 साल के बाद फिर से... उसी आफरीन के बारे में सुनकर खां साब बेचैन हो गए थे... उसकी एक झलक के लिए उनकी शाही गाड़ी जलालपुर की तरफ जा रही थी। “हुजूर गाड़ी इसके आगे नहीं जा पाएगी” ड्राइवर ने एक चौड़ी सड़क के मोड़ पर गाड़ी रोकते हुए कहा, “यही वो गली है जिसके बारे में मिर्ज़ा साहब ने बताया था” लड़खड़ाते कदमों से 71 साल का बुजुर्ग गाड़ी से उतरा और उस गली से 40 साल पुराने इश्क की झलक की उम्मीद में चल पड़ा। महंगी शेरवानी, नक्काशी वाली छड़ी, जरा झुकी हुई कमर और उन महंगे जूतों पर आज उस गली की धूल लग रही थी. अंधेरा हो गया था... कुछ आगे बढ़ते हुए वो एक गर्दो गुबार वाली गली में पहुंचे। जहाँ शहर के शायद सबसे गरीब तबके के लोग रहते थे. बजबजाती नालियाँ, कच्चे रास्ते, यहाँ वहाँ टाट के पर्दों से बनी झुग्गियाँ, मुर्गियों का शोर और कुछ लोग जो खां साहब की तरफ गौर से देख रहे थे. वो एक टाट के पर्दे वाली झुग्गी के सामने आकर रुक गए. बताया गया था कि आफरीन इस इलाके में अब बड़ी बी के नाम से जानी जाती थी। कोई नहीं जानता कि वो यहां कब से रह रही है। लोग कहते हैं कि जब वो यहां रहने आई तब ये जगह वीरान थी, उस ज़माने में कसाई लोग इस जगह जानवर की खाल और दूसरा बेकार गोश्त फेंकते थे... यहां बदबू थी.. कोई रह नहीं सकता था... फिर धीरे धीरे आबादी बढ़ी, झुग्गियां आबाद गयीं। खां साहब को ये भी पता चला कि बड़ी बी बताती थीं कि उनका एक शौहर था... जो जवानी में ही मर गया... तब ये यहां चली आईं और अकेले रह रही हैं... और अब तो उन्हें ना के बराबर दिखाई देता है।

“कौन है?” तभी एक बूढ़ी आवाज़ पर्दे के पार से गूंजी। खां साब का दिल धक से हो गया। कांपते हाथों से पर्दा हटाया तो एक चेहरा सामने था.

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चेहरा बदल गया था. वक्त झुर्रियों की लिखावट में जाने कितना कुछ लग गया था. हालांकि बाल कहीं-कहीं से अब भी काले थे, निचले होंठ के किनारे वो तिल गवाही दे रहा था... मैं वही हूँ। खां साब उस चेहरे को करोड़ों की भीड़ में पहचान सकते थे, एक पल में पिछले 40 साल खां साहब के सामने से गुजरने लगे... आँखें बहने लगीं। पर अफसोस की आफरीन जो अब बड़ी बी थी, उसकी आंखो की रौशनी लगभग जा चुकी थी इसलिए वो खां साहब को पहचान नही पाई। खां साहब के आंसू कोरों के किनारे जमा थे। वक्त ने एक खूबसूरत मुस्कुराते चेहरे को किस कदर गर्द-आलूदा बना दिया था. सोच रहे थे कि इन 40 सालों में इस चेहरे ने गम के कौन-कौन से पहाड़ ढोए होंगे. और हर बार उसने मुझे याद किया होगा। वो उस छोटे से कच्चे फर्श वाले कमरे में बैठ गए. एक तरफ छोटा सा पलंग था जिस पर बड़ी बी बैठी थी। एक तरफ थोड़े से टूटे-फूटे बर्तन, दूसरी तरफ कुछ कपड़े थे. घर गुर्बत का ऐसा नज़ारा दिखा रहा था कि खां साहब का दिल भरा जा रहा था।

“कौन है हाँ? बोलिए क्या चाहिए?” बुजुर्ग आफ़रीन ने कहा, तो हाँ साहब ने लड़खड़ाते हुए कहा

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“आ… वो... देखिए मैं... एक एक NGO से आया हूं... हमारी तंज़ीम आप जैसे जरूरतमंदों की मदद करती हैं... तो.... तो हम आपकी मदद करना चाहते हैं”
बड़ी बी बोलीं, “अरे मुझे कुछ नहीं चाहिए। गुज़र-बसर भर का मोहल्ले के बच्चों को अरबी पढ़ा कर निकल आता है। बाकी ईद-बकरीद पर मुहल्ले वाले कपड़े बनवा देते हैं और कुछ चाहिए” बड़ी बी बोलती जा रही थी, खां साब सोच रहे थे खि ठीक ही है कि आफ़रीन उन्हें पहचान नहीं पा रही। वरना कैसे आंखें मिलाते। वक्त की सिलवटों में ढलकर चेहरा कितना बदल गया. एक शिकन तक नहीं थी जैसे ज़मानों से मुस्कुराई ना हो. आज उन्हें ख्याल आ रहा था कि ... काश उस दिन... अब्बा के सामने... थोड़ी सी हिम्मत दिखाई होती. तो वक्त का सिरा कहीं और खत्म हो रहा होता किसी और दुनिया में, किसी और मंजिल पर. खान साहब वहाँ से लौट आए.

हवेली पर लौट आए लेकिन रातें बेचैन हो गईं… करवटें बदलते रहते... पुराना वक्त आंखों में चलता रहा... पर कुछ मंज़िले ऐसी होती हैं जो गुज़र जाती हैं तो आप उन तक लौट नहीं सकते... वो बस एक अफ़सोस बनकर रह जाती हैं उम्र भर। खां साहब अब क्या कर सकते थे, सिवाए इसके कि कुछ रुपये-पैसे से आफरीन की मदद कर देते ताकि ज़िंदगी का आख़िरी वक्त कुछ आराम से गुज़रे।

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कुछ दिन के बाद खां साहब ने एक फैसला किया.... एक लिफाफे में मोटी रकम रखी और एक खत लिखा... और अपने दोस्त मिर्ज़ा को बोलकर, उसके एक नौकर के हाथ भिजवा दिया. ऐसा नहीं था कि इसके बाद वो मुतमइन हो गए. एक टीज तो थी... कि काश मैं... मैंने हिम्मत दिखाई होती... काश मैं बुज़दिल ना होता…

लिफाफ़ा भेजने के चार दिन बाद, मिर्जा का नौकर खान साहब के पास आया... खां साहब उस वक्त छत पर बैठे थे। दूर तक फैली हरियाली को देख रहे थे। नौकर को देखकर बोले, “आओ आओ... आ गए... ये बताओ कि ख़त लेते हुए उसने कुछ कहा था?” नौकर ने हाथ आगे किया तो लिफ़ाफा और खत उसके हाथ में थी। बोला, “सरकार, उन्होंने ये नहीं लिया
- क्या? लेकिन क्यों?
- पता नहीं साहब, लेकिन उन्होंने आप के लिए ये ख़त भेजा 
कहते हुए उसने एक अलग खत का लिफाफा उनकी तरफ बढ़ा दिया।

खां साहब ने लिफ़ाफ़े से ख़त निकाला और पढ़ना शुरू किया। लिखा था -
 

आदाब...
आपने मदद के लिए सोचा, इसके लिए बहुत-बहुत शुक्रिया… लेकिन मुझे इसकी ज़रूरत नहीं है… थोड़ी सी ज़िंदगी बाकी है… दिखाई देता नहीं है... लेकिन पता है... आंख धुंधला भी जाए तो क्या... दिल आवाज़ पहचानता है… इनायत अली खां साहब...
मुझे लगभग नहीं दिखाई देता लेकिन आपकी आवाज़ मैं हज़ारों आवाज़ों में पहचान सकती हूँ। मुझे पता है कि उस दिन आप ही मेरे घर आए थे. पर क्या हसीन इत्तेफाक है कि एक बार आपके वालिद साहब ने रक़म भिजवाई थी और आज आप भिजवा रहे हैं… ना मैंने तब ली थी, ना आज करूँगी. खत बस ये बताने को लिख रही हूँ... कि मेरा मरा हुआ शौहर कोई और नहीं... आप ही है। मैंने शादी नहीं की… और हाँ, आप सही कहते थे कि किताब में रखने से मोर के पंख दो नहीं होते… नहीं हुए… ग़म न कीजिएगा. खुश हूँ. आप भी रहिए…


एक मोर पंख लिफाफे से निकलकर खां साहब के गोद में गिर पड़ा और आंसुओं के कतरे उनके गालों पर लकीर बना रहे थे... दूर फिज़ा में ज़मीन और आसमान मिलते हुए… लग रहे थे।

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