scorecardresearch
 

'अगर समर्पण है तो शिव को भी आना पड़ेगा', मालिनी अवस्थी ने लोककथाओं के जरिए प्रेम को समझाया

साहित्य आजतक लखनऊ में ‘प्रेम गली अति सांकरी- लोक संगीत में प्रेम’ सेशन में पद्मश्री लोकगायिका मालिनी अवस्थी ने कहा कि भारतीय लोक और संस्कृति में प्रेम किसी उत्सव की तरह रचा-बसा है. उन्होंने लखनऊ को प्रेम का नगर बताते हुए रामचरितमानस, राम-जानकी, राधा-कृष्ण और शिव-पार्वती के प्रसंगों के जरिए समझाया कि प्रेम मर्यादा, समर्पण और बंधनमुक्त भाव का संगम है.

Advertisement
X
मालिनी अवस्थी ने कहा कि प्रेम हमारे लोक और संस्कृति में एक उत्सव की तरह शामिल है. (Photo: ITG)
मालिनी अवस्थी ने कहा कि प्रेम हमारे लोक और संस्कृति में एक उत्सव की तरह शामिल है. (Photo: ITG)

'साहित्य आजतक लखनऊ' का मंच सज चुका है. शनिवार को 'प्रेम गली अति सांकरी- लोक संगीत में प्रेम' थीम पर आयोजित सेशन में बातचीत हुई पद्मश्री, लोकगायिका मालिनी अवस्थी से. विषय था प्रेम और सामने थीं प्रेम को लोक में गाने वाली सुप्रसिद्ध लोकगायिका मालिनी अवस्थी. लोकगीतों से सजी इस महफिल में बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि प्रेम हमारे लोक और संस्कृति में बिल्कुल किसी उत्सव की तरह शामिल है. 

'लखनऊ प्रेम का नगर है'

मालिनी अवस्थी ने बताया कि हमारे ग्रंथों और लोककथाओं में किस तरह प्रेम की व्याख्या की गई है. उन्होंने कहा, 'लखनऊ प्रेम का नगर है. प्रेम का आदर्श प्रतिमान अवध में ही रचा गया. रामचरितमानस हो या राधा-कृष्ण के कोई प्रसंग. ये धार्मिक नहीं सांस्कृतिक रचनाएं हैं. ये भारत की संस्कृति है. प्रेम सबसे प्रमुख रस है.'

उन्होंने कहा, 'त्रेता युग में प्रभु राम ने, जिनके पिता की स्वयं तीन रानियां थीं, अपनी पत्नी माता जानकी को विवाह में एकपत्नी व्रत का वचन दिया और प्रेम की मर्यादा खींची. उन्होंने कहा कि अगर मैं तुमसे घनिष्ठ प्रेम करता हूं तो मेरे मन में, वचन में, जीवन में कोई दूसरी स्त्री अब नहीं आएगी. सियावर रामचंद्र प्रेम का सबसे सुंदर प्रतीक हैं. हमें अपने प्रेम के आदर्श ढूंढ़ने पड़ेंगे.'

Advertisement

'राम-जानकी का प्रेम अप्रतिम है'

उन्होंने बताया, 'जब माता जानकी का स्वयंवर हुआ था, तब उसमें जाति, धर्म, वर्ग नहीं बल्कि सिर्फ योग्यता ही एक पैमाना था. प्रभु राम तो वनवासी वेष में थे. लेकिन माता जानकी उनको देखकर कामना करती हैं कि शिव का धनुष कोई राजा ना उठा पाए. यही उठा लें और यही प्रेम है. धनुष उठाने के बाद उनका परिचय दिया जाता है. प्रेम में अपकी पृष्ठभूमि, आप कौन हैं, कुछ मायने नहीं रखता. राम और सीता का प्रेम ऐसा है कि वो 14 साल उनके साथ वनवास पर जाती हैं. वन की सभी शर्तों का पालन करती हैं. वन के कष्टों को जीवनसाथी का संघर्ष और सुख मानकर जीती हैं. और राम का प्रेम ऐसा है कि जब माता जानकी को मर्यादा के कारण, राजधर्म को आगे रखने के कारण जब माता जानकी को निर्वासित होना पड़ता है तो प्रभु राम अकेले रह जाते हैं. वो शारीरिक रूप से अयोध्या में रहते हैं लेकिन मानसिक रूप से वन में रहते हैं. राम-जानकी का प्रेम अप्रतिम है.'

मालिनी अवस्थी ने कहा, 'दूसरी ओर राधा-कृष्ण का प्रेम अनमोल है. प्रेम में कोई सीमा नहीं है. प्रेम में सिर्फ आंखों और मन की बात है. राधा कृष्ण को इसलिए प्रेम करती हैं क्योंकि वो कृष्ण को बंधन में नहीं बांधना चाहती हैं. यह बंधनमुक्त प्रेम ऐसा है कि कृष्ण का किसी से भी विवाह हो, वो राधा के ही रहते हैं.'

Advertisement

'प्रेम में अगर समर्पण होगा तो शिव को आना पड़ेगा'

उन्होंने आगे कहा, 'तीसरा है शिव-पार्वती का प्रेम जो सबसे अप्रतिम है. पार्वती शिव को पाने के लिए तपस्या करती हैं. हरतालिका तीज का त्योहार. हम उसमें व्रत रखते हैं और पार्वती के निष्ठ प्रेम का उत्सव मनाते हैं जिसमें पिता की बात ना मानकर वो व्रत करती हैं. शिव तो अघोरी हैं. किसी बंधन में नहीं बंधना चाहते लेकिन वो मना लेती हैं. प्रेम में अगर समर्पण होगा तो शिव को आना पड़ेगा. फिर यही पार्वती, जब सती होती हैं तो शिव तांडव करते हैं और प्रलय आ जाती है. सारे देवता जाकर उन्हें मनाते हैं. कहते हैं कि शोक में शिव के नेत्रों से जो आंसू बहा वही रूद्राक्ष बन गया. रूद्र के आंसू ही रूद्राक्ष हैं.'

उन्होंने कहा, 'हमारे यहां प्रेम एक उत्सव के रूप में मनाया गया है. मैं नहीं जानती कि कब प्रेम को बुरा माना जाने लगा. चाहे दो प्राणियों के बीच हो, भक्त और भगवान के बीच हो, मित्रों के रूप में हो, माता-पिता और शिशु के रूप में हो प्रेम उत्सव ही है.'

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement