आज की डिजिटल दुनिया में जहां बिना स्मार्टफोन के एक घंटा बिताना भी किसी सजा जैसा महसूस होता है, वहीं अमेरिका के सिनसिनाटी के रहने वाले एक लेखक और पब्लिक स्पीकर के लिए जेल की सजा जिंदगी बदल देने वाला अनुभव बन गई. लगातार बजता और चहचहाता स्मार्टफोन उन्हें जब जेल जाने की वजह से छोड़ना पड़ा तब उन्हें एहसास हुआ कि उनके लिए ज्यादा बड़ी कैद उनके हाथ में मौजूद 6 इंच की स्क्रीन थी जिसके वो पूरी तरह गुलाम बन चुके थे.
अपने स्मार्टफोन से इस अनचाही जुदाई पर बात करते हुए उन्होंने दुनिया को बताया कि कैसे सलाखों के पीछे रहते हुए भी उन्होंने अपने स्मार्टफोन की गुलामी से आजादी महसूस की और एक ऐसी मानसिक शांति पाई जो तकनीक की इस भागदौड़ भरी दुनिया में कहीं खो चुकी थी. यहां हम आपको उन्हीं जुबानी उनकी कहानी बता रहे हैं.
पी.जी. सिटेनफेल्ड एक लेखक और पब्लिक स्पीकर हैं जो अपनी पत्नी और तीन बेटों के साथ अमेरिका के खूबसूरत शहर सिनसिनाटी में रहते हैं. उन्होंने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा कि जनवरी 2024 में मैकडॉनल्ड्स की पार्किंग में कार में बैठे हुए मैंने अपनी पत्नी सारा को आखिरी बार फोन करके बताया कि मैं उससे कितना प्यार करता हूं. केंटकी की जेल में खुद को सरेंडर करने से पहले यह आखिरी बार था जब मेरे पास मेरा आईफोन था. मेरी आंटी और मेरी बहन कर्टिस मेरे साथ थीं. जेल वहां से बस पांच मिनट की ड्राइव पर थी.
इसलिए पहुंचा जेल
सारा सिनसिनाटी में ही रुक गई थीं, जहां हम रहते हैं ताकि हमारे छोटे बेटों की जिंदगी में जितना हो सके सामान्य स्थिति बनी रहे. उनसे विदा लेना मेरी पूरी जिंदगी का सबसे दुखद पल था. जेल जाने से पहले मैं एक दशक तक सिनसिनाटी सिटी काउंसिल का सदस्य रहा था. 2018 और 2019 में मैं मेयर का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा था. तभी FBI ने एक बड़े स्टिंग ऑपरेशन में मुझे निशाना बनाया.
रियल-एस्टेट इन्वेस्टर बनकर आए अंडरकवर एजेंटों ने मेरे कैंपेन के लिए मुझे डोनेशन दिया. मुझे लगा कि यह साधारण और सामान्य बात है और मैंने इसकी जानकारी अपनी पब्लिक फाइलिंग में भी दी थी. फिर भी फेडरल प्रॉसिक्यूटर ने मुझ पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और 'क्विड प्रो क्वो' (लेन-देन या बदले में कुछ पाने) का आरोप लगाया.
तीन हफ्ते तक चले ट्रायल के बाद मुझे चार आरोपों से बरी कर दिया गया और दो मामलों में दोषी ठहराया गया जिसके बाद जज ने मुझे 16 महीने की जेल की सजा सुनाई. बाद में इस अजीब घटनाक्रम के बीच 2025 में राष्ट्रपति की ओर से मुझे माफ कर दिया और इस साल अप्रैल में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से मेरी सजा को रद्द कर दिया. लेकिन उससे पहले क्या-क्या हुआ, वो मैं यहां बता रहा हूं.
'फोन छिना तो लगा जिंदगी थम गई...'
उन्होंने बताया कि उनके लिए जेल जाने का मतलब कई चीजें थीं. एक दम से आजादी छिन जाना, मान-सम्मान को बड़ा नुकसान होना और इस सबसे मेरे परिवार पर होने वाला असर, जिसे मैं कंट्रोल नहीं कर सकता था. साथ ही जेल जाने का मतलब यह भी था कि मुझसे मेरा स्मार्टफोन छिन चुका था जो पिछले 15 सालों में से मुझसे अलग नहीं हुआ था. ज्यादातर अमेरिकियों की तरह मेरा सेलफोन भी मेरे शरीर का ही एक हिस्सा जैसा बन चुका था.
फोन पर इतना समय गुजारते हैं अमेरिकी
स्क्रीन टाइम सर्वे और डेटा एनालिस्ट के अनुसार, अमेरिका में ज्यादातर वयस्क अब दिन में चार घंटे से ज्यादा समय अपने फोन पर बिताते हैं.यहां वो हर घंटे में 10 से ज्यादा बार अपना फोन चेक करते हैं और टीवी देखते समय डेट पर जाते समय या गाड़ी चलाते समय भी नहीं रुकते.
मैं भी इससे अलग नहीं था. जब भी मेरा फोन बजता या वाइब्रेट होता तो मैं जो भी काम कर रहा होता, उससे तुरंत अपना ध्यान हटाकर फोन की तरफ चला जाता, भले ही वे नोटिफिकेशन हमेशा जरूरी न हों.
काम के ईमेल, बच्चों के स्कूल से अपडेट, पॉलिटिकल कैंपेन से लगातार आने वाले स्पैम मैसेज. सारा और मैं अपने दिन की प्लानिंग के दौरान कम से कम एक दर्जन टेक्स्ट मैसेज भी एक-दूसरे को भेजते थे. वो ऑन्कोलॉजिस्ट के तौर पर अपनी हॉस्पिटल की नौकरी से और मैं सिटी हॉल से या शहर में लोगों से मिलने, आस-पास के बिजनेस एरिया में जाने और कम्युनिटी सेफ्टी वॉक करने के दौरान. जैसे-जैसे मेरी सजा का समय नजदीक आ रहा था. हमारे बीच होने वाले मैसेज में अक्सर प्यार और अपनापन झलकता था. जैसे कि बिना किसी खास वजह के अचानक 'आई लव यू' कह देना.
जेल में पहुंचते ही सबसे पहले मैंने एक पोस्टर देखा जिसमें कैदियों और उनसे मिलने आने वालों को चेतावनी लिखी थी कि वो परिसर के अंदर फोन जैसी प्रतिबंधित चीजें न लाएं वरना उन्हें सजा दी जाएगी. मुझे सारा से बात न कर पाने की अपनी बेबसी बहुत ज्यादा महसूस हो रही थी. तलाशी (जिसमें कपड़े उतरवाकर शरीर की जांच की जाती है) के बाद एक कैदी मुझे जेल परिसर घुमाने ले गया. दूसरे कैदियों से मिलवाया और मुझे मेरी कोठरी तक ले गया. यह 8-बाय-10 फीट का एक छोटा सा कमरा था जिसे मुझे एक दूसरे आदमी के साथ शेयर करना था जिसे जेल की भाषा में 'सेली' (celly) कहा जाता है.
जब मैं अपने नई जगह को देख रहा था तो बस यही चाहता था कि सारा को फोन करूं (या कम से कम टेक्स्ट करूं) और कहूं कि मैं शारीरिक रूप से सुरक्षित महसूस कर रहा हूं अब तक जिन लोगों से मैं मिला हूं, वे मेरे साथ अच्छा व्यवहार कर रहे हैं और सबसे बड़ी बात कि मुझे तुम्हारी बहुत-बहुत याद आ रही है.
लेकिन शुरू में मेरे पास ऐसा करने का कोई जरिया नहीं था. जल्द ही मैंने अपने आस-पास कैदियों को स्मार्टफोन इस्तेमाल करते देखा. जेल के अंदर की इकॉनमी कैपिटलिज्म की ताकत का एक जबरदस्त सबूत है. यह दिखाती है कि सामान उन लोगों तक कितनी क्रिएटिविटी से पहुंचता है जिन्हें उनकी जरूरत होती है, बशर्ते खरीदार बेचने वाले को सही कीमत दे सके. कई लोगों को पता था कि मैं नया हूं इसलिए उन्होंने मुझे सारा से फेसटाइम करने के लिए अपना स्मार्टफोन इस्तेमाल करने का ऑफर दिया. उसे देखने के ख्याल से ही मैं बेचैन और बेताब हो उठता था.
लेकिन मैंने जेल में रहने के लिए कुछ प्राथमिकताएं पहले ही तय कर ली थीं और लिस्ट में सबसे ऊपर था. घर वापस जाना. मैं ऐसा कुछ नहीं करता जिससे मेरी सजा बढ़ जाए या जेल में रहने का समय लंबा हो जाए. मैं किसी दूसरे कैदी से शारीरिक लड़ाई नहीं करता, चाहे उकसाया ही क्यों न जाए. मैं फोन समेत किसी भी गैर-कानूनी चीज के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता था.
फोन के साथ पकड़े गए तो भेज देते थे अंधेरी कोठरी
मेरी जेल में कैदियों को स्पेशल हाउसिंग यूनिट जिसे आम तौर पर 'द होल' (अंधेरी कोठरी) भी कहा जाता है में भेजे जाने का सबसे आम कारण फोन के साथ पकड़े जाना था. वहां कैदियों को दिन में 23 घंटे एक छोटी सी कोठरी में रखा जाता था. लेकिन पहली ही रात से यह साफ हो गया था कि कई कैदी गैर-कानूनी फोन रखना पसंद करते थे और वो यह जोखिम इसलिए उठाते थे ताकि अपने परिवार के संपर्क में रह सकें. शाम के समय जब गार्ड कम होते थे और उनके गश्त का समय भी अंदाजा लगाने लायक होता था.
मेरी हाउसिंग यूनिट में कैदियों की आवाजें गूंजती थीं. वो अपनी पत्नियों और गर्लफ्रेंड्स के साथ जेल की ताजा बातें शेयर करते, बच्चों से पूछते कि उन्होंने उस दिन स्कूल में क्या किया और बूढ़े माता-पिता का हाल-चाल जानते. इन पलों में मैं खास तौर पर उन कैदियों के साथ सहानुभूति महसूस करता था जिनकी सजा उन्हें लंबे समय तक जेल में रहने वालों की श्रेणी में रखती थी.
बेशक, स्मार्टफोन का इस्तेमाल सिर्फ अच्छे कामों के लिए नहीं होता था. कैदी YouTube वीडियो देखते थे, ऑनलाइन स्पोर्ट्स बेटिंग करते थे और बाहर की महिलाओं को डेट करने के लिए एप्रोच करते थे. कभी-कभी ऐसा लगता था कि वे ऐसा इसलिए करते थे ताकि वे महिलाएं उनके जेल अकाउंट में पैसे भेज दें. फिर भी इस मांग की एक वजह दूसरा विकल्प जेल का फोन रूम का खराब हाल भी था.
यार्ड के ठीक बगल में बने इस छोटे और अंधेरे कमरे में तीन दीवारों पर सिक्के डालकर यूज करने वाले स्टाइल के 10 फोन एक लाइन में लगे थे, जिनके बीच पार्टिशन बने हुए थे. लगभग हर दूसरे दिन उनमें से दो से पांच फोन खराब ही रहते थे. खासकर जब बहुत ज्यादा भीड़ होती थी तो लाइन में इंतजार करने के बाद आप ऐसा फोन उठाते थे जो अभी-अभी इस्तेमाल करने वाले कैदी के हाथ की गर्मी से गर्म होता था और रिसीवर से उसकी सांस की बदबू आ रही होती थी. आप किसी दूसरे आदमी से बस कुछ इंच की दूरी पर खड़े होते थे, जबकि आप दोनों ही अपने चाहने वालों से बहुत निजी बातें कर रहे होते थे.
ऊपर से कनेक्शन अक्सर बहुत खराब रहता था और हर पांच मिनट में एक ऑटोमेटेड आवाज बीच में आकर कहती थी. यह कॉल एक फेडरल जेल से है. मानो लाइन पर मौजूद दोनों लोगों को यह याद दिलाने की जरूरत हो. मैं सारा और अपने बेटों की आवाजें दिन में सिर्फ 15 मिनट तक ही सुन और उनसे बात कर पाता था और इतने कम समय में उनसे बात करने के बाद जो अक्सर रात के खाने के समय होती थी. मेरी मां, मेरी तीन बहनों या परिवार के किसी अन्य सदस्य या दोस्तों से बात करने के लिए बिल्कुल भी समय नहीं बचता था.
जेल के गार्ड हर हफ्ते के आखिर में घंटों तक हाउसिंग यूनिट की दीवारों में छेद करके ऐसी जगहें ढूंढ़ते रहते थे जहां कैदियों ने अपने स्मार्टफोन छिपा रखे हों. कभी-कभी सभी कैदियों की गिनती से ठीक पहले जो यह पक्का करने के लिए की जाती थी कि सभी कैदी मौजूद हैं. वो मजाक में कहते थे, 'दोस्तों, गिनती का समय हो गया है. जाओ और अपने सेलफ़ोन छिपा लो.'
बिना फोन के बेहतर महसूस हो रहा था
मुझे जिस जेल में रखा गया था, वो सबसे खराब जेलों में से एक बिल्कुल नहीं थी. मुझे कम-सुरक्षा वाले कैंप में रखा गया था. लेकिन मैंने करीब से यह जरूर पाया कि कैसे जेल का सिस्टम लोगों को परिवार के साथ जरूरी जुड़ाव से पूरी तरह दूर कर देता है. बिना स्मार्टफोन के गुजरे महीनों में मैंने एक और बहुत ही हैरानी वाली बात सीखी. मेरे दिमाग को भले ही मेरे दिल को नहीं इसके बिना बहुत बेहतर महसूस हुआ.
शुरू में मुझे लगा कि यह मेरे सामने खुले पड़े खाली दिनों की वजह से था. मैं एक बहुत व्यस्त काम, भरे-पूरे पारिवारिक और सामाजिक जीवन और कई तरह की वॉलंटियर जिम्मेदारियों जिन्हें मैं अपने स्मार्टफोन से तेजी से मैनेज करता था, से निकलकर जेल की बिना किसी तय रूटीन वाली जिंदगी में आ गया था. लेकिन जैसे-जैसे मेरी कैद बढ़ती गई, घर लौटने की तड़प के बावजूद मैंने एक साफ बदलाव महसूस किया जिसे सिर्फ स्मार्टफोन न होने से ही जोड़ा जा सकता था.
जेल जाने से पहले फोन की वजह से ध्यान भटकना, घबराहट और बेचैनी मेरी जिंदगी का हिस्सा थे. जब कोई डिवाइस मेरे दिमाग को लगातार परेशान नहीं कर रहा था और मेरे विचारों में रुकावट नहीं डाल रहा था तो मैं अपने आस-पास हो रही चीजों के प्रति ज्यादा सतर्क हो गया था. मैंने अपने आस-पास के माहौल को महसूस किया.
फोन से दूरी ने सिखाई, जिंदगी क्या होती है
मैं चीजों को बेहतर ढंग से देखने और समझने लगा. जैसे-जैसे सर्दी के बाद बसंत आया, मैंने बाड़ के उस पार खिलते पेड़ों में लगभग हर घंटे होने वाले बदलावों को देखा और नई शुरुआत को असल रूप में देखकर शुक्रगुजार महसूस किया. मैंने अपने सेल-मेट के साथ जिंदगी के बड़े सवालों और बुनियादी विषयों पर चर्चा और बहस की.
जैसे परिवार के रिश्तों की उलझनें, हमारे सबसे बड़े डर और पछतावे, और भविष्य के लिए हमारी गहरी इच्छाएं. मैंने कविताएँ लिखीं, ऐसा काम जो मैंने पहले कभी नहीं किया था (और न ही बाद में किया).
जेल में हर रात जब दूसरे कैदियों के फोन छिपी हुई जगहों से बाहर आते थे और मेरा हाउसिंग यूनिट लोगों के FaceTime करने, YouTube क्लिप देखने और म्यूजिक वीडियो चलाने के शोर-शराबे से भर जाता था तो मुझे एक साथी कैदी की दी हुई साधारण सलाह याद आती थी जो उसने मेरे जेल आने के कुछ ही समय बाद दी थी. 'भाई, अपनी सजा पूरी कर, बजाय इसके कि सजा तुझे पूरी तरह बदल दे.'
अफसोस यह कहानी किसी बड़े बदलाव की नहीं है. जेल में साढ़े चार महीने बिताने के बाद हमारी कानूनी व्यवस्था में एक बहुत ही अनोखी घटना हुई. मेरी अपील पर जुबानी दलीलें सुनने के बाद तीन फेडरल जजों ने मुझे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया. मेरे केस का फैसला अभी आना बाकी था लेकिन मैं घर आ चुका था. जब मैं अपनी उस जिंदगी में वापस ढलने लगा जिसे मैंने बहुत याद किया था तो शुरू में मैंने अपने फोन के परेशान करने वाले, ध्यान भटकाने वाले और दखल देने वाले खिंचाव से बचने की कोशिश की.
'जेल में महसूस की आजादी'
मैंने बस वही किया जो हममें से बहुत से लोगों के पास हमेशा करने का विकल्प होता है लेकिन हम कर नहीं पाते या करना नहीं चाहते. मैंने अपने फोन को 'डू नॉट डिस्टर्ब' मोड पर किया और उसे दूसरे कमरे में रख दिया और जब हम परिवार के साथ टहलने या खाना खाने बाहर जाते थे तो उसे घर पर ही छोड़ देते थे. लेकिन कुछ ही महीनों में मैं अपनी पुरानी आदतों में वापस लौट आया. हर पिंग और अलर्ट को तुरंत देखना और उन पर ध्यान देना और अपनी पसंदीदा वेबसाइट्स को स्क्रॉल करने के लिए बिना सोचे-समझे फोन उठा लेना. यह एक ऐसी विडंबना है जिससे मैं अब भी जूझ रहा हूं. यह विडंबना ही है कि जेल में रहते हुए मैंने जो आजादी महसूस की, उसे मैं अपने साथ घर वापस नहीं ला पाया.