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'EC ने कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन किया', शिवसेना सिंबल केस में उद्धव गुट की सुप्रीम कोर्ट में दलील

चीफ जस्टिस की पीठ ने मामले में पांचवें दिन भी सुनवाई की. उद्धव गुट की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि निर्वाचन आयोग ने शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न शिंदे गुट को सौंपते समय तय कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया और अपने अधिकार क्षेत्र से आगे जाकर फैसला किया.

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उद्धव गुट ने कोर्ट में जस्टिस रोहिंटन नरीमन के एक पुराने फैसले का हवाला दिया. (Photo- ITG)
उद्धव गुट ने कोर्ट में जस्टिस रोहिंटन नरीमन के एक पुराने फैसले का हवाला दिया. (Photo- ITG)

शिवसेना विभाजन और पार्टी के नाम-चुनाव चिह्न आवंटन के मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान उद्धव गुट ने निर्वाचन आयोग के रवैये पर गंभीर सवाल खड़े किए. उद्धव गुट की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि निर्वाचन आयोग ने शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न शिंदे गुट को सौंपते समय तय कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया और अपने अधिकार क्षेत्र से आगे जाकर फैसला किया.

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने मामले की पांचवें दिन की सुनवाई में कपिल सिब्बल ने पार्टी के संगठन, चुनाव चिह्न और निर्वाचन आयोग की शक्तियों से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर दलीलें रखीं. पार्टी के चुनाव चिह्न को लेकर उनकी बहस पूरी हो गई है. अब अगले मंगलवार को वह शिंदे गुट के साथ गए विधायकों की अयोग्यता के मुद्दे पर दलीलें रखेंगे. उनके बाद देवदत्त कामत भी उद्धव गुट की ओर से बहस करेंगे.

कपिल सिब्बल ने शिवसेना की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक का हवाला देते हुए कहा कि कार्यकारिणी ने चार नेताओं को शिवसेना का पक्ष प्रमुख चुना था. उन्होंने आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग का फैसला भेदभावपूर्ण और एकतरफा था.

सिब्बल ने कहा कि चुनाव चिह्न नियमों के पैरा 15 के तहत आयोग के पास यह विकल्प था कि वह तथ्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाले कि दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों में से कोई भी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व नहीं करता. उन्होंने पुराने 'जनता दल' विभाजन से जुड़े मामले का भी हवाला दिया.

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उनके मुताबिक, उस मामले में आयोग ने यह पाए जाने के बावजूद कि पार्टी के मामलों का संचालन तदर्थ तरीके से किया जा रहा था और उसके शासी निकाय पार्टी के संविधान के अनुरूप गठित नहीं थे, बिना पूर्व नोटिस दिए कठोर कार्रवाई करने से इनकार किया था.

'बिना नोटिस शिवसेना के संविधान को अलोकतांत्रिक बताया'

सिब्बल ने आरोप लगाया कि शिवसेना के मामले में आयोग ने पहले से नोटिस दिए बिना पार्टी के संविधान को अलोकतांत्रिक मान लिया और बाद में चुनाव चिह्न विवाद पर फैसला करते समय उसी निष्कर्ष का इस्तेमाल उद्धव गुट के खिलाफ किया.

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने अयोग्यता और जनप्रतिनिधित्व कानून से जुड़े सवाल भी उठाए. उन्होंने पूछा कि क्या यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत भ्रष्ट आचरण से जुड़ा कोई मामला नहीं है और कहा कि मुद्दा मुख्य रूप से संविधान की दसवीं अनुसूची के संचालन से जुड़ा है.

सिब्बल ने इस पर जस्टिस रोहिंटन नरीमन के एक पुराने फैसले का हवाला दिया. जस्टिस बागची ने कहा कि किहोतो होलोहन फैसले को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे को बड़ी पीठ के पास भेजा गया था. सिब्बल ने जवाब दिया कि सुबाष देसाई मामले में इसे ट्रिब्यूनल के तौर पर माना गया है और यह मुद्दा अब सुलझ चुका है.

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'अयोग्यता का फैसला स्वतंत्र ट्रिब्यूनल करे'

सिब्बल ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में अयोग्यता की याचिकाओं पर फैसला लेने में समस्या है. उन्होंने कहा कि सत्ता में रहने वाली लगभग हर पार्टी यह सुनिश्चित करने की कोशिश करती है कि अयोग्यता की याचिका पर समय पर सुनवाई न हो. उन्होंने स्पष्ट किया कि वह किसी एक राजनीतिक दल की बात नहीं कर रहे हैं.

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के उस फैसले के एक हिस्से पर पुनर्विचार की मांग की, जिसमें चुनाव आयोग को पहले फैसला करने की अनुमति से जुड़ा पहलू शामिल है. सिब्बल ने इसे "सबसे खतरनाक हिस्सा" बताते हुए मामले को सात जजों की संविधान पीठ के पास भेजने का अनुरोध किया.

सीजेआई ने भी कहा कि इस पहलू पर पुनर्विचार की जरूरत है. उन्होंने कहा कि अयोग्यता पर फैसला किसी स्वतंत्र ट्रिब्यूनल द्वारा किया जाना चाहिए. हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि केवल न्यायपालिका ही इसका मंच हो सकती है, लेकिन अंततः मामला न्यायिक क्षेत्राधिकार में आ सकता है.

धारा 29A पर भी हुई बहस

सुनवाई के दौरान जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29A को लेकर भी चर्चा हुई. जस्टिस बागची ने कहा कि धारा 29A(9) राजनीतिक दल के पंजीकरण के बाद लागू होती है, लेकिन यह सूचीबद्ध जानकारियों तक सीमित है.

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इस पर सिब्बल ने संसद में हुई बहस का हवाला देते हुए कहा कि तत्कालीन मंत्री ने स्पष्ट किया था कि निर्वाचन आयोग ऐसे अन्य विवरण मांग सकता है जिन्हें वह उचित समझे. उनके मुताबिक, यह शक्ति राजनीतिक दलों के पंजीकरण से जुड़ा अवशिष्ट प्रावधान है और इसका इस्तेमाल उसी संदर्भ में किया जाना चाहिए जिसमें संसद ने इसे कानून का हिस्सा बनाया था.

सिब्बल ने यह भी दलील दी कि बीजेपी के मामले में निर्वाचन आयोग ने जिस तरह का रुख अपनाया था, वह उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता. उन्होंने कहा कि धारा 29A के तहत आयोग के पास संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन के आधार पर किसी पंजीकृत राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द करने की शक्ति नहीं है.

अब मामले की सुनवाई में अगला अहम चरण शिंदे गुट के साथ गए विधायकों की अयोग्यता से जुड़ी दलीलों का होगा. इसके बाद देवदत्त कामत भी उद्धव ठाकरे गुट की ओर से अपनी बात रखेंगे.

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