इन दिनों हर जगह बारिश हो रही है. ऐसे में घर के खिड़की-दरवाजे ठीक से नहीं लगते हैं. क्योंकि, ये लकड़ी के बने होते हैं और बरसात में ज्यादा नमी होने की वजह से ये फूल जाते हैं. इसके बाद जब मौसम सूखा होता है, तो इन वुडेन खिड़की और दरवाजों में दीमक लगने लगते हैं.
लकड़ी से बने दरवाजों के साथ हमेशा ये समस्या होती है. कभी पानी लगने से ये अटकने लगते हैं तो कभी दीमक लग जाने की वजह से इन्हें बार- बार पेंट करवाना होता है. ऐसी ही समस्याओं को देखते हुए, अब लकड़ी के दरवाजों के कई विकल्प भी बाजार में आ गए हैं.
बाजार में ऐसे मटेरियल से बने दरवाजे भी मिल रह हैं, जो दिखने में लकड़ी जैसे लगते हैं. इसमें बार- बार पेंट कराने का झंझट भी नहीं होता. ये दरवाजे बारिश में नहीं अटकते. सबसे बड़ी खासियत इसमें दीमक लगने की समस्या नहीं होती है. साथ ही ये लकड़ी से काफी सस्ता होता है. चलिए जानते हैं ऐसे स्पेशल दरवाजे को कहते क्या हैं? ये किस चीज की बनी होती है और इसकी कीमत कितनी होती है?
आजकल बाजार में लकड़ी के दरवाजों का एक बेजोड़ विकल्प आ गया है. आधुनिक घरों में इसी मटिरियल से बने दरवाजे और खिड़कियों का इस्तेमाल हो रहा है. ये दरवाजे वुड-प्लास्टिक कंपोजिट मटेरियल या फिर सिंथेटिक पॉलिमर से बने होते हैं. बाजार में ये कंपोजिट डूर या WPC (वुड-प्लास्टिक कंपोजिट) के नाम से मिलते हैं. इसमें एक हल्का वर्जन भी होता है, जो पीवीसी (PVC) से बने दरवाजे होते हैं.
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प्लास्टिक और कंपोजिट दरवाजे, पीवीसी और वुड-प्लास्टिक कंपोजिट मटेरियल से बने होते हैं. इन दरवाजों को बनाने में सिंथेटिक पॉलिमर का इस्तेमाल किया जाता है. इनमें प्राकृतिक सेल्यूलोज या कीटों के लिए लकड़ी के फूड सोर्स नहीं होते हैं. यही वजह है कि इसमें दीमक नहीं लगते. ये दीमक और कीड़ों से पूरी तरह सुरक्षित होते हैं. साथ ही ये वाटरप्रूफ भी होते हैं. इसलिए बारिश में इनके फूज जाने का टेंशन नहीं होता है.
वुड-प्लास्टिक कंपोजिट डूर
डब्ल्यूपीसी दरवाजों का निर्माण लकड़ी के रेशे और थर्मोप्लास्टिक पॉलिमर को हाई टेम्प्रेचर पर मिलाकर, फिर ठंडा करने के बाद होता है. यही वजह है कि ये लकड़ी की तरह सख्त और भारी लगते हैं.
पीवीसी डूर
वहीं पीवीसी दरवाजे, हल्के, खोखले या ठोस पॉलिमर प्रोफाइल से बने होते हैं. बाथरूम और बालकनियों जैसे अधिक नमी वाले गीले क्षेत्रों में इनका ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है.
लकड़ी के उलट, नमी या गीली सफाई के की वजह ये फूलते, सड़ते, मुड़ते या टूटते नहीं हैं.इसे लगाने के बाद इसकी नियमित पेंटिंग, पॉलिशिंग या दीमक रोधी केमिकल कोटिंग की जरूरत नहीं होती है.
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कमरे की सजावट से मेल खाने के लिए सादे, लैमिनेटेड या लकड़ी के दाने वाले उभरे हुए डिजाइनों में ये उपलब्ध हैं. इन दरवाजों को रिसाइकिल करना आसान है.
कितनी है इन कंपोजिट दरवाजों की कीमत
इन कंपोजिट दरवाजों की कीमत मोटाई, आकार और फिनिश के आधार पर तय होती है. लगभग 4,200 से 7,000 रुपये तक होती है. ये बाथरूम, रसोई, बेडरूम, हॉल और अन्य कमरों के लिए काफी यूजफुल होते हैं.