जब भी घर बनता है तो कारीगर ईंट, सीमेंट, बजरी आदि लाने को तो बोलते हैं, लेकिन पहले इन सबके साथ नमक लाने के लिए भी कहा जाता था. आप सोच रहे होंगे कि आखिर नमक का क्या करते होंगे और अगर सीमेंट में नमक का इस्तेमाल करेंगे तो वो खराब हो जाएगी. ऐसे में सवाल है कि आखिर नमक का क्या किया जाता था. हालांकि, अब ये ट्रिक या स्टाइल पुरानी हो चुकी है और अब नमक का इस्तेमाल कम किया जाता है.
नमक का क्या किया जाता था?
दरअसल, नमक के जरिए अर्थिंग की जाती थी और ये पारंपरिक अर्थिंग का तरीका था. इस तरीके की अर्थिंग में पहले घर के बाहर 8–10 फीट या उससे ज्यादा गहरा गड्ढा खोदा जाता था. उसके बाद उसमें जीआई पाइप या कॉपर प्लेट लगाई जाती थी. इसके बाद पाइप के चारों ओर कोयला और नमक की परतें भरी जाती थीं.
ऊपर से समय-समय पर पानी डाला जाता था, ताकि मिट्टी नम बनी रहे. इससे नमक और कोयला मिलाने से मिट्टी बिजली को आसानी से जमीन तक पहुंचाने लगती थी. यानी अगर कहीं करंट लीक हो जाए, तो वह इंसान की बजाय अर्थिंग के रास्ते जमीन में चला जाए.
लेकिन, अब इसका इस्तेमाल कम होने लगा है, क्योंकि ये ज्यादा समय तक काम नहीं कर पाता था. एक वक्त बाद अर्थिंग की पावर कम होने लगती थी. इस वाले पैटर्न में नमक धीरे-धीरे बारिश या पानी के साथ बह जाता है, नमक धातु के पाइप में जंग लग जाती है और कुछ साल बाद अर्थिंग की गुणवत्ता कम होने लगती है.
फिर अब कैसे की जाती है अर्थिंग?
आजकल ज्यादातर अच्छी गुणवत्ता वाले निर्माण में मेंटेनेंस-फ्री अर्थिंग की जाती है. कॉपर-बॉन्डेड या जीआई अर्थिंग रॉड जमीन में गहराई तक लगाई जाती है. उसके आसपास बेंटोनाइट या ईईसी यानी अर्थ इंहेंसमेंट कमाउंड जैसी विशेष सामग्री भरी जाती है. ये सामग्री लंबे समय तक नमी बनाए रखती है और बिजली को आसानी से जमीन तक पहुंचाती है. इसमें नमक डालने की जरूरत नहीं पड़ती. माना जाता है कि ये काफी ज्यादा समय तक असरदार रहता है. इलेक्ट्रोड में कम जंग लगती है, जिससे ये लंबे समय तक काम करता था.