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''मुझे मत बताओ क्या करना है!'' Gen-Z को सलाह सुनते ही गुस्सा क्यों आता है?

जेन-Z यानी आज की युवा पीढ़ी अपनी आजादी और फैसलों को काफी महत्व देती है. यही वजह है कि कई बार बिना मांगी गई सलाह उन्हें पसंद नहीं आती. आखिर सलाह सुनते ही उन्हें गुस्सा क्यों आता है और इसके पीछे सोशल मीडिया, आत्मनिर्भर सोच और बातचीत के बदलते तरीके का कितना असर है? 

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किसी भी पीढ़ी में अलग-अलग तरह के लोग होते हैं. ( Photo: ITG)
किसी भी पीढ़ी में अलग-अलग तरह के लोग होते हैं. ( Photo: ITG)

आजकल माता-पिता, बड़े भाई-बहन या ऑफिस में सीनियर जब जेन-Z को कोई सलाह देते हैं, तो कई बार उनका जवाब होता है- “मुझे पता है मुझे क्या करना है”, “आप मुझे मत बताइए” या फिर 'मैं खुद संभाल लूंगा.' यही वजह है कि अक्सर लोगों को लगता है कि आज की युवा पीढ़ी सलाह सुनना ही नहीं चाहती. लेकिन क्या सच में ऐसा है? या इसके पीछे सोचने का कोई अलग तरीका है? जेन-Z यानी 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई पीढ़ी. इस पीढ़ी ने इंटरनेट, सोशल मीडिया और स्मार्टफोन के बीच अपनी जिंदगी शुरू की है. इसलिए जानकारी हासिल करने का तरीका भी पिछली पीढ़ियों से काफी अलग है. उन्हें किसी चीज के बारे में जानना हो तो वे तुरंत इंटरनेट पर सर्च कर सकते हैं, वीडियो देख सकते हैं या दूसरे लोगों के अनुभव पढ़ सकते हैं.

हर सलाह बुरी नहीं लगती, तरीका मायने रखता है
साइकोलॉजिस्ट दिव्या शर्मा कहतीं हैं कि असल समस्या हमेशा सलाह से नहीं होती. कई बार समस्या यह होती है कि सलाह किस तरीके से दी जा रही है. अगर कोई बार-बार यह कहे कि “तुम्हें कुछ नहीं पता”, “हमारी बात मानो, हमने तुमसे ज्यादा दुनिया देखी है” या “तुम गलत कर रहे हो”, तो सामने वाले को लग सकता है कि उसकी समझ और फैसले पर भरोसा नहीं किया जा रहा. जेन-Z  के लिए अपनी बात और अपनी पसंद को महत्व देना काफी जरूरी है. इसलिए जब उन्हें बिना पूछे लगातार निर्देश दिए जाते हैं, तो उन्हें ऐसा महसूस हो सकता है कि उनकी आजादी कम की जा रही है.

मान लीजिए कोई युवा नौकरी बदलना चाहता है. अगर उससे कहा जाए- नौकरी मत छोड़ो, तुम कुछ नहीं समझते, तो वह नाराज हो सकता है. लेकिन अगर यही बात इस तरह कही जाए कि नौकरी बदलने से पहले इन चीजों पर भी सोच लेना, जैसे सैलरी, दूसरी नौकरी और भविष्य की ग्रोथ, तो शायद वह बात ज्यादा आसानी से सुने. यानी सलाह वही हो सकती है, लेकिन उसे कहने का तरीका पूरी बातचीत बदल देता है.

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सोशल मीडिया ने भी बदली सोच
जेन-Z  के पास आज जानकारी के बहुत सारे सोर्स हैं. सोशल मीडिया पर वे अलग-अलग लोगों की राय, अनुभव और कहानियां देखते हैं. इससे उनमें अपनी राय बनाने की आदत भी मजबूत हुई है. हालांकि इंटरनेट पर मिलने वाली हर जानकारी सही नहीं होती. इसलिए अपनी राय बनाना अच्छी बात है, लेकिन किसी भी जानकारी को बिना जांचे सही मान लेना ठीक नहीं है. कई युवाओं को यह पसंद आता है कि उनसे बात की जाए, उन्हें सुना जाए और फिर अपनी राय दी जाए. जब सामने वाला पहले उनकी बात समझने की कोशिश करता है, तो वे सलाह को ज्यादा आसानी से स्वीकार कर सकते हैं. उदाहरण के लिए- तुम ऐसा क्यों करना चाहते हो? पूछना, 'तुम ऐसा मत करो' कहने से ज्यादा प्रभावी हो सकता है. इससे बातचीत बहस में बदलने के बजाय चर्चा बन जाती है.

क्या जेन-Z  जिद्दी हैं?
हर जेन-Z  को एक जैसा समझना सही नहीं होगा. किसी भी पीढ़ी में अलग-अलग तरह के लोग होते हैं। कुछ लोग सलाह आसानी से मानते हैं, जबकि कुछ लोग अपनी बात पर ज्यादा भरोसा करते हैं. इसलिए यह कहना सही नहीं है कि जेन-जी को कोई सलाह पसंद ही नहीं है. असल बात यह है कि वे सलाह के साथ सम्मान और अपनी पसंद की जगह भी चाहते हैं.

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अगर किसी युवा को सलाह देनी है, तो पहले उसकी बात सुनना बेहतर तरीका हो सकता है. इसके बाद अपना अनुभव साझा करें और फैसला उस पर छोड़ दें. 'तुम्हें यही करना चाहिए' की जगह 'अगर मेरी राय पूछो तो मैं ये विकल्प भी सोचने को कहूंगा' कहना ज्यादा असरदार हो सकता है. आखिरकार, हर पीढ़ी की अपनी सोच और अपना अनुभव होता है. जेन-जी को सलाह देने की जरूरत हो सकती है, लेकिन शायद उन्हें आदेश से ज्यादा बातचीत, सम्मान और भरोसा चाहिए.

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