
तीन सदियों से भी ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन ताजमहल आज भी दुनिया की सबसे खूबसूरत इमारतों में गिना जाता है. सफेद संगमरमर से बनी यह इमारत सिर्फ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में प्रेम और बेहतरीन वास्तुकला की मिसाल मानी जाती है. हर साल लाखों लोग इसे देखने आते हैं. हालांकि, जितनी मशहूर यह इमारत है, उतने ही सवाल भी इससे जुड़े हैं. आखिर ताजमहल बनने से पहले इस जगह पर क्या था? शाहजहां ने इसी जमीन को क्यों चुना? और ताजमहल के नीचे बने 22 कमरों का सच क्या है? आइए, इतिहास के दस्तावेजों के आधार पर इन सवालों के जवाब जानते हैं.
ताजमहल को लेकर मशहूर शायर शकील बदायूंनी ने लिखा था.
इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल,
सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है.
इसके साए में सदा प्यार के चर्चे होंगे,
खत्म जो हो न सकेगी वो कहानी दी है.
आज यह इमारत मोहब्बत की निशानी मानी जाती है, लेकिन जिस जमीन पर यह खड़ी है, उसका अपना भी एक इतिहास है.
ताजमहल बनने से पहले वहां क्या था?
मुगलकाल के समकालीन दस्तावेज बताते हैं कि जिस जगह आज ताजमहल है, वहां पहले राजा मानसिंह की हवेली और उससे जुड़ी संपत्ति थी. 1631 में मुमताज महल की मौत के समय इस संपत्ति के मालिक राजा जयसिंह थे, जो राजा मानसिंह के पोते थे.
राजा जयसिंह की थी यह जमीन
शाहजहां के दरबारी इतिहासकार अब्दुल हमीद लाहौरी ने अपनी किताब बादशाहनामा में लिखा है कि ताजमहल बनाने के लिए शाहजहां ने राजा जयसिंह से यह जमीन ली. बदले में उन्हें शाही संपत्ति से दूसरी हवेलियां दी गईं. इसी तरह काज़विनी और मुहम्मद सालेह कंबो ने भी अपने समकालीन ग्रंथों में इस स्थान को राजा जयसिंह या राजा मानसिंह की हवेली, यानी मंजिल, बताया है.

चार हवेलियों के बदले मिली थी जमीन
इतिहासकार एब्बा कोच, डब्ल्यू. ई. बेगली और जेड. ए. देसाई ने भी उन दस्तावेजों का अध्ययन किया है, जिनमें 28 दिसंबर 1633 के शाही फरमान का जिक्र मिलता है. इस फरमान में साफ लिखा है कि राजा जयसिंह की हवेली के बदले उन्हें आगरा में शाही संपत्ति की चार हवेलियां दी गई थीं. यानी उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज यही बताते हैं कि ताजमहल जिस जमीन पर बना, वहां पहले राजा जयसिंह की हवेली और उससे जुड़ी संपत्ति थी.
इसी के साथ ताजमहल के नीचे बने कथित "22 कमरों" को लेकर भी कई तरह की बातें सोशल मीडिया पर सामने आती रहती हैं. कुछ लोग इन्हें रहस्य से जोड़ते हैं, तो कुछ इनके अंदर मंदिर या खजाना होने का दावा करते हैं. लेकिन क्या सचमुच ऐसा है?
आखिर क्या हैं ताजमहल के 22 कमरे?
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और मुगल वास्तुकला के विशेषज्ञों के अनुसार, ये 22 अलग-अलग कमरे नहीं हैं. दरअसल, यह मुख्य मकबरे के नीचे बने लंबे मेहराबदार गलियारे हैं, जिन्हें दरवाजे लगाकर अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया है. इनका निर्माण किसी रहस्य को छिपाने के लिए नहीं, बल्कि पूरी इमारत को मजबूत आधार देने के लिए किया गया था.
22 कमरे क्यों बनाए गए थे?
इतने बड़े गुंबद, चार मीनारों और भारी संगमरमर की इमारत का वजन संभालने के लिए ऊंचा चबूतरा बनाया गया. उसके नीचे मेहराबदार ढांचा तैयार किया गया, जिससे वजन बराबर बंट सके और पूरी संरचना मजबूत बनी रहे. मुगल वास्तुकला में यह तकनीक आम मानी जाती थी.
इन भूमिगत कक्षों को फारसी में "तहखाना" कहा जाता है. गर्मियों में यहां स्वाभाविक रूप से ठंडक रहती थी. यमुना नदी की ओर खुलने वाली मेहराबों से हवा और रोशनी भी आती थी. माना जाता है कि जब मुगल शासक या शाही परिवार ताजमहल आता था, तब इन जगहों का इस्तेमाल आराम करने के लिए भी किया जाता था.
मुगल वास्तुकला की विशेषज्ञ एब्बा कोच ने अपने अध्ययन में बताया है कि नदी की तरफ करीब 15 कक्ष एक कतार में बने हैं. इनमें कुछ बड़े, कुछ चौकोर और कुछ अष्टकोणीय आकार के हैं. पहले इनकी दीवारों पर ज्यामितीय डिजाइन और सजावट भी थी, हालांकि समय के साथ उनमें से काफी हिस्सा मिट चुका है.
दिल्ली के हुमायूं के मकबरे और सफदरजंग के मकबरे जैसे कई मुगल स्मारकों में भी इसी तरह के भूमिगत गलियारे मिलते हैं. इसलिए इन्हें किसी रहस्य या छिपे हुए निर्माण से जोड़ने का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं मिलता.
आम लोगों के लिए क्यों बंद हैं ये कमरे?
यह सवाल भी अक्सर पूछा जाता है कि जब इनमें कुछ खास नहीं है, तो इन्हें खोला क्यों नहीं जाता. इसका जवाब संरक्षण से जुड़ा है. ASI के मुताबिक ताजमहल में हर दिन बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं. अगर इन संकरे और कम रोशनी वाले हिस्सों को भी खोल दिया जाए, तो नमी, कार्बन डाइऑक्साइड, कंपन और भीड़ की वजह से स्मारक को नुकसान पहुंच सकता है. इसके अलावा यमुना नदी के किनारे होने के कारण यहां बाढ़ और गाद का भी खतरा रहता है.
ASI के कर्मचारी समय-समय पर इन हिस्सों की सफाई और निगरानी करते हैं. पूर्व क्षेत्रीय निदेशक के.के. मुहम्मद समेत कई विशेषज्ञ इन कमरों का निरीक्षण कर चुके हैं. उनके मुताबिक वहां कोई मूर्ति, शिलालेख, खजाना या किसी मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं.
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि ये 22 कमरे उस निचले कक्ष से अलग हैं, जहां मुमताज महल और शाहजहां की असली कब्रें मौजूद हैं. ऊपर दिखाई देने वाली कब्रें केवल प्रतीकात्मक हैं, जबकि वास्तविक कब्रें नीचे बने अलग कक्ष में हैं, जिसे केवल कुछ खास मौकों, जैसे उर्स, पर ही खोला जाता है.