क्या आपने कभी गौर किया है कि आजकल हर दूसरी लड़की के मोबाइल में कोई न कोई कोरियन ड्रामा चल रहा होता है? कोई बीटीएस के गाने सुन रहा है, कोई ब्लैकपिंक की नई रिलीज का इंतजार कर रहा है, तो कोई किम सू-ह्यून या पार्क सेओ-जून की तस्वीरों से सोशल मीडिया भर रहा है. आखिर ऐसा क्या है कि हजारों किलोमीटर दूर बसे दक्षिण कोरिया के कलाकार भारतीय लड़कियों के दिलों पर राज कर रहे हैं? यह सिर्फ एक ट्रेंड नहीं है. पिछले कुछ सालों में के-ड्रामा, कोरियन फिल्में और के-पॉप पूरी दुनिया में एक कल्चर लहर बन चुके हैं. भारत में भी टीनएज और कॉलेज जाने वाली लड़कियों के बीच इसका क्रेज तेजी से बढ़ा है. कई लोग इसे सिर्फ 'फैनगर्ल मोमेंट' समझते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इसके पीछे सिर्फ मनोरंजन है या दिमाग की भी कोई कहानी छिपी है?
क्या कोरियन कंटेंट पसंद करने वाली लड़कियों की सोच दूसरों से अलग होती है? क्या वे ज्यादा इमोशनल, रोमांटिक या क्रिएटिव होती हैं? या फिर सोशल मीडिया और एल्गोरिदम उन्हें बार-बार उसी दुनिया में खींच ले जाते हैं? दिलचस्प बात यह है कि इस सवाल पर साइकोलॉजिस्ट और कई इंटरनेशनल रिसर्च भी काम कर चुके हैं. इन स्टडीज के मुताबिक, कोरियन कंटेंट की लोकप्रियता के पीछे सिर्फ अच्छी कहानी या हैंडसम कलाकार नहीं, बल्कि इंसानी दिमाग की कुछ ऐसी साइकोलॉजिकल वजहें भी हैं, जो लोगों को बार-बार इस दुनिया की ओर खींचती हैं. तो आइए जानते हैं कि आखिर कोरियन मूवी, के-ड्रामा और के-पॉप का जादू लड़कियों पर इतना ज्यादा क्यों चलता है, और इसके पीछे साइकोलॉजी क्या कहती है.
नई और अलग चीजें पसंद करने वाली होती हैं
साइकोलॉजिस्ट विंदा सिंह कहती हैं कि साइकोलॉजी में नोवेल्टी सिकिंग नाम का एक प्रिंसिपल है. इसका मतलब है कि इंसान नई, अलग और अनोखी चीजों की ओर जल्दी आकर्षित होता है. कोरियन फिल्में और ड्रामा कई लोगों के लिए हॉलीवुड या बॉलीवुड से अलग अनुभव देते हैं. इनमें अलग तरह की कहानी, अलग कल्चर, अलग फैशन, अलग म्यूजिक और अलग रोमांस देखने को मिलता है. यही नया अनुभव युवाओं को पसंद आता है. यानी अगर कोई लड़की कोरियन मूवी पसंद करती है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह अपने कल्चर से दूर हो रही है. हो सकता है उसे सिर्फ कुछ नया देखने और सीखने में दिलचस्पी हो.
सोशल मीडिया का बड़ा असर
आज इंस्टाग्राम, यूट्यूब, फेसबुक और शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म हमारी पसंद को काफी हद तक इंफ्लूएंस करते हैं. अगर कोई लड़की एक-दो बार किसी कोरियन वीडियो को देख लेती है, तो सोशल मीडिया का एल्गोरिदम उसे उसी तरह के और वीडियो दिखाने लगता है. धीरे-धीरे उसके सामने वही एक्टर-एक्ट्रेस, वही गाने और वही ड्रामा बार-बार आने लगते हैं. मनोविज्ञान में इसे 'मेयर एक्सपोजर इफेक्ट' कहा जाता है. इसका मतलब है कि जिस चीज को हम बार-बार देखते हैं, उसे पसंद करने की संभावना बढ़ जाती है. इसलिए कई बार शुरुआत सिर्फ एक वीडियो से होती है और बाद में वही व्यक्ति बड़ा फैन बन जाता है.
इमोशनल कहानियां लोगों को जल्दी जोड़ती हैं
कई रिसर्च बताते हैं कि लोग उन कहानियों से ज्यादा जुड़ते हैं जिनमें इमोशन साफ दिखाई देती हैं. कोरियन ड्रामा में दोस्ती, परिवार, प्यार, संघर्ष, त्याग और रिश्तों पर काफी ध्यान दिया जाता है. कई किरदार अपने इमोशन को खुलकर दिखाते हैं. यही वजह है कि दर्शक खुद को कहानी से जोड़ लेते हैं. लोग इमोशनल कहानियां पसंद करते हैं, उन्हें ऐसे ड्रामा ज्यादा पसंद आ सकते हैं.
कोरियन ड्रामा में रोमांस अक्सर धीरे-धीरे आगे बढ़ता है. रिश्तों में सम्मान, भरोसा, देखभाल और छोटी-छोटी बातों का महत्व दिखाया जाता है. कई दर्शकों को यह तरीका अच्छा लगता है क्योंकि इसमें सिर्फ ग्लैमर नहीं बल्कि इमोशनल बॉन्ड भी दिखाया जाता है. हालांकि यह याद रखना जरूरी है कि फिल्में और ड्रामा मनोरंजन के लिए बनाए जाते हैं. वास्तविक जीवन हमेशा स्क्रीन पर दिखाई जाने वाली कहानी जैसा नहीं होता.
फैशन और ब्यूटी का प्रभाव
दक्षिण कोरिया का ब्यूटी और फैशन इंडस्ट्री दुनिया भर में मशहूर है. कोरियन कलाकारों का स्किनकेयर, मेकअप, हेयरस्टाइल और कपड़े युवाओं को आकर्षित करते हैं. कई लड़कियां उनकी तरह कपड़े पहनना, मेकअप करना या स्किनकेयर रूटीन अपनाना पसंद करती हैं. यह भी एक जेनरल कल्चर इफेक्ट है, जैसा पहले कई लोग बॉलीवुड या हॉलीवुड सितारों को देखकर अपनाते थे.
टीनएज में दोस्त हमारी पसंद पर काफी असर डालते हैं. अगर किसी ग्रुप में सभी दोस्त किसी खास के-ड्रामा की बात कर रहे हों या किसी के-पॉप ग्रुप के गाने सुन रहे हों, तो बाकी लोगों की भी उसमें रुचि बढ़ सकती है. साइकोलॉजी में इसे सोशल इन्फ्लुएंस कहा जाता है. यानी आसपास के लोगों की पसंद हमारी पसंद को भी प्रभावित कर सकती है.
अपनी पहचान बनाने की कोशिश
किशोरावस्था वह समय होता है जब हर व्यक्ति अपनी पहचान खोज रहा होता है. इस दौरान लोग नई भाषा सीखना, नए कल्चर को समझना, अलग तरह का संगीत सुनना और नए शौक अपनाना पसंद करते है. कोरियन कंटेंट भी कई युवाओं के लिए अपनी पसंद और पहचान बनाने का एक तरीका बन जाता है. अगर कोई लड़की सिर्फ मनोरंजन के लिए कोरियन मूवी या ड्रामा देखती है, नई भाषा सीखती है या नए कल्चर के बारे में जानना चाहती है, तो इसमें कोई समस्या नहीं है. लेकिन अगर कोई व्यक्ति अपनी पढ़ाई, काम, परिवार या असली जिंदगी को छोड़कर सिर्फ ऑनलाइन फैन कल्चर में ही खो जाए, हर समय उसी के बारे में सोचता रहे या वास्तविक और काल्पनिक दुनिया में फर्क करना मुश्किल हो जाए, तो यह संतुलन बिगड़ने का संकेत हो सकता है. साइकोलॉजिस्ट भी कहते हैं कि मनोरंजन का आनंद लें, लेकिन उसे अपनी पूरी जिंदगी पर हावी न होने दें.
सिर्फ किसी की पसंद के आधार पर उसकी पूरी पर्सनैलिटी तय नहीं की जा सकती. किसी को अच्छी कहानी पसंद होती है, किसी को म्यूजिक, किसी को एक्टिंग, किसी को फैशन और किसी को नए कल्चर के बारे में जानना अच्छा लगता है. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि कोरियन मूवी पसंद करने वाली सभी लड़कियां एक जैसी सोच रखती हैं.
रिसर्च क्या कहती है?
साइकोलॉजी, कल्चर स्टडीज और ग्रैटीफिकेशन थ्योरी पर आधारित कई रिसर्च बताते हैं कि लोग मनोरंजन, भावनात्मक जुड़ाव, तनाव कम करने, नए कल्चर जानने और सामाजिक जुड़ाव के लिए अलग-अलग तरह का कंटेंट देखते हैं. वहीं मेयर एक्सपोजर इफेक्ट पर हुई मनोवैज्ञानिक रिसर्च यह भी बताती है कि किसी चीज को बार-बार देखने से उसके प्रति पसंद बढ़ सकती है. इसका मतलब यह है कि कोरियन कंटेंट की लोकप्रियता सिर्फ कलाकारों की वजह से नहीं, बल्कि अच्छी कहानी, सोशल मीडिया, दोस्तों के प्रभाव और बार-बार मिलने वाले एक्सपोजर का भी परिणाम है.