पिछले साल 14 मार्च को दिल्ली हाईकोर्ट के जज के आवास परिसर में आग लगी थी. इसके बाद बाद मौके से बड़ी मात्रा में अधजले कैश बरामद हुए. यह घर जस्टिस यशवंत वर्मा का था. जस्टिस वर्मा ने दावा किया कि उन्होंने कभी भी अपने स्टोर रूम में इतने कैश नहीं रखे. यह उनके खिलाफ साजिश है.
उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने कैश कांड की जांच के लिए एक कमेटी बनाई थी. कमेटी ने माना कि जस्टिस वर्मा ने कैश छिपाकर न्यायिक मर्यादा का उल्लंघन किया था. इस मामले के बाद जस्टिस वर्मा का ट्रांसफर इलाहाबाद कर दिया गया था. उन्हें 2021 में दिल्ली हाईकोर्ट का जज बनाया गया था. अप्रैल 2025 में उनका ट्रांसफर फिर से इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया.
अप्रैल 2026 में जस्टिस वर्मा ने राष्ट्रपति को इस्तीफा भेज चुके हैं. इसके बावजूद संसदीय कमेटी ने उन पर लगाए गए आरोपों को सही पाया है. अब आने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की सिफारिश करने वाला है. ऐसे में जानते हैं कि किसी भी जज को हटाने के लिए कैसे महाभियोग प्रस्ताव लाया जाता है.
जज के खिलाफ कैसे लाया जाता है महाभियोग
आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज को पद से हटाने की प्रक्रिया को महाभियोग कहा जाता है. फिर भी, संविधान में कहीं भी महाभियोग शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है. हालांकि, बोलचाल में हम इसे महाभियोग कह जाते हैं. संविधान के अनुच्छेद 124 में सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की पूरी प्रकिया का जिक्र है. वहीं अनुच्छेद 218 में हाईकोर्ट के जज को हटाने के लिए भी इसी प्रक्रिया को लागू किया गया है.
पहला स्टेप
अनुच्छेद 124 में दिए गए प्रावधान के तहत सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के जज के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव, लोकसभा या राज्यसभा, किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है. लोकसभा के कम से कम 100 सदस्यों को प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर सदन के स्पीकर के पास देना होता है. वहीं राज्यसभा में इस प्रस्ताव को लाने के लिए इस पर 50 सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए. इस प्रस्ताव में जज के खिलाफ आरोपों का जिक्र होता है.
दूसरा स्टेप
अगर स्पीकर या चेयरमैन इस महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते हैं. तब शिकायत की जांच के लिए तीन सदस्यी एक कमेटी गठित की जाती है. इसमें सुप्रीम कोर्ट के जज, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित कानूनविद शामिल होते हैं. यह जांच कमेटी जज पर लगे आरोपों की जांच करती है. अगर जांच में आरोप की पुष्टि हो जाती है. फिर आरोपों की एक कॉपी कमेटी आरोपी जज को भी भेजती है. ताकि, उन्हें अपने बचाव के लिए अपनी बात रखने का मौका मिल सके.
तीसरा स्टेप
जांच के दौरान आरोपी जज के खिलाफ एक वकील भी रखा जाता है. बचाव पक्ष से भी वकील होते हैं. फिर, आरोपों को लेकर दोनों पक्षों में बहस होती है. जब कमेटी की जांच पूरी हो जाती है तो पूरी रिपोर्ट उस सदन के स्पीकर या चेयरमैन को भेज दी जाती है.जहां महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था.
चौथा स्टेप
इसके बाद रिपोर्ट को सदन के समक्ष रखा जाता है. इस पर सदन के सदस्य अपनी- अपनी बात रखते हैं और बहस होती है. इस रिपोर्ट पर दोनों सदनों में बहस होती है.फिर महाभियोग प्रस्ताव को पारित करने के लिए वोटिंग होती है. इसे दोनों सदनों में पारित करना जरूरी होता है. इसके लिए सदन की कुल सदस्यों का बहुमत और सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों में से कम से कम दो तिहाई सदस्यों का बहुमत जरूरी है.
अंतिम स्टेप
एक बार जब जज के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव दोनों सदनों में पारित हो जाता है. फिर इसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया जाता है. इसके बाद राष्ट्रपति जज को हटाने का आदेश देते हैं.