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45 साल से रावण के पुतले बना रहे 66 साल के नारायण दास, पिता से सीखा हुनर अब बेटों को सिखा रहे

पंजाब के फिरोजपुर में 66 साल के नारायण दास बीते 45 साल से दशहरे के लिए रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले बना रहे हैं. यह हुनर उन्हें अपने पिता से विरासत में मिला था. अब उनके बेटे भी इस काम में हाथ बंटा रहे हैं. इस बार परिवार करीब 40 फुट ऊंचे पुतलों समेत कुल 10 पुतले तैयार कर रहा है.

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45 साल बना रहे रावण का पुतला. (Photo: ITG)
45 साल बना रहे रावण का पुतला. (Photo: ITG)

दशहरा आने वाला हो, तो रावण के पुतलों की चर्चा शुरू हो जाती है. कितने फुट ऊंचा रावण बनेगा? उसके साथ कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले कितने बड़े होंगे? उनमें क्या खास होगा? लेकिन इन पुतलों के पीछे की कहानी अक्सर छूट जाती है. उस कारीगर की कहानी, जो बांस और कागज से इन किरदारों को आकार देता है. और उस हुनर की कहानी, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता है.

पंजाब के फिरोजपुर में 66 साल के नारायण दास पिछले 45 साल से यही काम कर रहे हैं. दशहरा आता है, तो उनके हाथ रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले बनाने में जुट जाते हैं. यह हुनर उन्होंने अपने पिता से सीखा था. अब उनके बेटे भी उनके साथ काम करते हैं. यानी जिस काम को नारायण दास ने अपने पिता से सीखा, उसे अब वह अगली पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं.

इस बार भी फिरोजपुर में दशहरे की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं. पुतले तैयार किए जा रहे हैं. नारायण दास के मुताबिक, इस बार वह कुल 10 पुतले बना रहे हैं. इनमें करीब 40 फुट ऊंचे पुतले भी शामिल हैं. इन्हें तैयार करने का काम करीब तीन महीने पहले शुरू हुआ था.

Ferozepur Man Making Ravan Effigies for 45 Years Passing Family Craft to Sons

40 फुट के पुतले, तीन महीने की मेहनत

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40 फुट ऊंचा पुतला दूर से देखने पर भले ही सिर्फ एक विशाल आकृति लगे, लेकिन उसे खड़ा करने से पहले कई चरणों से गुजरना पड़ता है. पहले ढांचा तैयार होता है. फिर उसे आकार दिया जाता है. इसके बाद कागज और दूसरे मैटेरियल की मदद से उसे अंतिम रूप दिया जाता है. सजावट और बारीकियों पर भी ध्यान देना पड़ता है. नारायण दास और उनके परिवार के लिए यह काम दशहरे से काफी पहले शुरू हो जाता है.

यह भी पढ़ें: रावण के साथ जलेगा 'कॉकरोच' का पुतला, उठे सवाल तो कमेटी बोली- हम तो साफ-सफाई को बढ़ावा दे रहे

त्योहार की तारीख तय होती है, इसलिए पुतलों को समय पर पूरा करना जरूरी होता है. जैसे-जैसे दशहरा नजदीक आता है, काम की रफ्तार भी बढ़ जाती है.

इस बार पुतलों में कुछ खास आकर्षण भी हैं. नारायण दास के मुताबिक, बड़े सांप और घूमने वाले चक्र जैसी चीजें पुतलों का हिस्सा होंगी. करीब 40 फुट ऊंचे पुतलों के साथ इन खास इंतजामों को तैयार करना भी कारीगरी का हिस्सा है.

पिता करते थे पुतले बनाने का काम

नारायण दास की कहानी सिर्फ उनके 45 साल के अनुभव की कहानी नहीं है. इसके पीछे उनके पिता की विरासत भी है. उनसे पहले उनके पिता दशहरे के लिए पुतले बनाया करते थे. नारायण दास ने उसी काम को सीखा और फिर उसे अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया. अब उनके तीन बेटों में से दो बेटे भी इस काम में हाथ बंटाते हैं. परिवार के लोग मिलकर पुतले तैयार करते हैं. इस तरह काम का अनुभव भी आगे बढ़ रहा है और हुनर भी.

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Ferozepur Man Making Ravan Effigies for 45 Years Passing Family Craft to Sons

किसी भी पारंपरिक काम में एक पीढ़ी का अनुभव अगली पीढ़ी के लिए सीखने का आधार बनता है. नारायण दास के मामले में भी यही हो रहा है. उन्होंने अपने पिता के साथ इस काम को जाना, सालों तक इसे किया और अब बेटों के साथ मिलकर इसे आगे बढ़ा रहे हैं. दशहरे के दिन जब मैदान में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले खड़े होते हैं, तो लोगों का ध्यान उनकी ऊंचाई, बनावट और सजावट पर जाता है. लेकिन उस मुकाम तक पहुंचने में कारीगरों की कितनी मेहनत लगी, यह अक्सर नजर नहीं आता.

बांस और कागज जैसी सामग्री से एक बड़े पुतले को आकार देना धैर्य और अनुभव का काम है. ढांचे को तैयार करना, उसे सही आकार देना और सजावट पूरी करना, हर चरण में सावधानी की जरूरत होती है. नारायण दास पिछले 45 साल से यह काम कर रहे हैं.

66 साल की उम्र में भी वह इस काम में जुटे हैं. कुछ लोग मंच सजाते हैं, कुछ आयोजन संभालते हैं और कुछ लोग उन पुतलों को आकार देते हैं, जिनका इंतजार दर्शकों को रहता है. फिरोजपुर में इस बार भी पुतले तैयार हो रहे हैं. रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ को आकार दिया जा रहा है. लेकिन इन पुतलों के साथ एक और कहानी आगे बढ़ रही है. 45 साल से इस काम में लगे नारायण दास की कहानी, जिन्होंने यह हुनर अपने पिता से सीखा और अब अपने बेटों के साथ मिलकर उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में जुटे हैं.

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