देश की राजधानी दिल्ली सिर्फ सत्ता के गलियारों के लिए नहीं, बल्कि जन-आंदोलनों की आवाज के लिए भी जानी जाती है. भारतीय लोकतंत्र में सरकारों के फैसलों का विरोध करने और अपनी मांगें रखने के लिए विरोध-प्रदर्शनों का एक लंबा इतिहास रहा है. हालांकि, सुरक्षा कारणों, वीवीआईपी ट्रैफिक और अदालती आदेशों के चलते समय-समय पर प्रदर्शनों के ठिकाने बदलते रहे हैं. अब फिर से एक बार प्रोटेस्ट साइट को बदल दिया गया है.
एक समय था जब कर्तव्य पथ के ठीक सामने बोट क्लब के बड़े लॉन में विरोध प्रदर्शन होते थे, लेकिन किसान आंदोलन के चलते 1993 में सरकार ने विरोध प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर के जगह तय किया, इसके बाद से किसानों, छात्रों, महिलाएं,भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले सामाजिक संगठन और अलग-अलग वर्गों के लोग अपनी मांग व समस्याओं को लेकर यहां प्रदर्शन करते रहे हैं.
जंतर-मंतर पर होने वाले विरोध प्रदर्शन को लेकर दिल्ली पुलिस ने बड़ा फैसला लिया है. अब जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन नहीं हो सकेगा. यह फैसला गृह मंत्रालय ने लिया है. धरना-प्रदर्शन के लिए दिल्ली पुलिस ने अब तीन नए स्थान निर्धारित किए हैं, जिसमें रामलीला मैदान, बुराडी मैदान और CBD ग्राउंड. ऐसे में 33 साल के बाद जंतर-मंतर को प्रोटेस्ट साइट से डिनोटिफाई कर दिया गया है यानी कि अब जंतर मंतर पर प्रोटेस्ट नहीं किया जा सकेगा.
जब बोट क्लब होता था आंदोलनों का मुख्य गढ़
आजादी के बाद से अस्सी के दशक तक इंडिया गेट के पास स्थित 'बोट क्लब' विरोध-प्रदर्शनों का सबसे पसंदीदा और प्रभावशाली केंद्र हुआ करता था. इंडिया गेट और विजय चौक के बीच फैला यह इलाका संसद भवन के बेहद करीब होने के कारण सत्ता की नाक के नीचे अपनी आवाज पहुँचाने का सबसे बड़ा जरिया था.
अक्टूबर 1988 में भारतीय किसान यूनियन के नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में लाखों किसानों ने बोट क्लब पर डेरा डाल दिया था. विजय चौक से लेकर इंडिया गेट तक पूरा इलाका करीब एक हफ्ते तक किसानों के कब्जे में रहा.
करीब 5 लाख किसानों ने गन्ने की कीमत बढ़ाने और बिजली-पानी के बिलों में छूट की मांग को लेकर सेंट्रल दिल्ली की रफ्तार रोक दी थी. इस ऐतिहासिक आंदोलन के बाद सुरक्षा कारणों से केंद्र सरकार ने बोट क्लब पर रैलियों और प्रदर्शनों पर स्थायी रोक लगा दी.
1993 में जंतर-मंतर बना नया 'हॉटस्पॉट'
बोट क्लब पर पाबंदी लगने के बाद 1993 में टॉल्स्टॉय मार्ग स्थित जंतर-मंतर को आधिकारिक विरोध स्थल तय किया गया. अगले तीन दशकों तक यह सड़क देश भर के आंदोलनकारियों का मुख्य केंद्र बनी रही.
किसानों के प्रदर्शन से लेकर अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' आंदोलन और निर्भया आंदोलन की शुरुआत इसी जंतर-मंतर से हुई. 2015 में 'वन रैंक-वन पेंशन' (OROP) आंदोलन और 2017 में तमिलनाडु के किसानों का प्रदर्शन भी यहीं आयोजित हुआ. 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने ध्वनि प्रदूषण का हवाला देते हुए यहाँ स्थायी धरनों पर रोक लगाई, लेकिन सांकेतिक प्रदर्शन जारी रहे.
हाल के वर्षों में 2023 में ओलंपिक पदक विजेता विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पुनिया का महिला पहलवान उत्पीड़न विरोधी धरना, कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन और सोनम वांगचुक का अनशन जंतर-मंतर की प्रमुख घटनाओं में शामिल रहे. पेपर लीक और शिक्षा में सुधार को लेकर युवा आंदोलन शुरू हुआ और सरकार को दबाव में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेना पड़ा. जब भी देश में बड़े पैमाने पर जनसैलाब उमड़ा, तब-तब दिल्ली का रामलीला मैदान ही आंदोलनों की मुख्य भूमि बना.
अब रामलीला मैदान, बुराड़ी और CBD ग्राउंड नए पते
सरकार ने तय किया है कि दिल्ली में अब जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन नहीं होगा. केंद्र सरकार ने जंतर मंतर के बजाय धरना प्रदर्शन के लिए बुराड़ी,राम लीला मैदान और सीबीडी मैदान (पूर्वी दिल्ली) निर्धारित किया है. सरकार का यह फैसला तब सामने आया है जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के लिए जंतर मंतर जाने की कॉकरोच जनता पार्टी मांग कर रही है.
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मौजूदा तय जगह जंतर मंतर के बजाय विरोध-प्रदर्शन करने के नागरिकों के अधिकार के लिए वैकल्पिक और उपयुक्त जगहों की जांच करने के लिए एक समिति बनाई थी. इसी समिति की सिफारिशों के आधार पर, जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन की जगह के तौर पर हटा दिया गया है. विरोध-प्रदर्शन के लिए अब तीन नई जगहों - रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और CBD मैदान को तय किया है.
प्रदर्शन स्थलों का बदलाव यह दिखाता है कि कैसे बढ़ते शहरीकरण और सुरक्षा व्यवस्था के साथ लोकतंत्र में विरोध दर्ज कराने के तरीके और जगहें बदली हैं. बोट क्लब की ऐतिहासिक रैलियों से लेकर जंतर-मंतर के सांकेतिक धरनों और रामलीला मैदान के विशाल सम्मेलनों तक, प्रदर्शनों के पते भले बदल गए हों, लेकिन जनता की आवाज उठाने की परंपरा आज भी कायम है.
दिल्ली में प्रदर्शन स्थलों का यह बदलाव दिखाता है कि बढ़ते शहरीकरण और सुरक्षा प्राथमिकताओं के साथ लोकतंत्र में विरोध दर्ज कराने के स्थान भले बदल गए हों, लेकिन जनता की आवाज उठाने की परंपरा आज भी उतनी ही मजबूत बनी हुई है.