मुस्लिम समाज में प्रचलित तलाक-ए-हसन, तलाक-ए-अहसन और एकतरफा तलाक की व्यवस्थाओं को लेकर बड़ा अपडेट सामने आया है. सुप्रीम कोर्ट इनकी वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 27 अक्टूबर को सुनवाई करेगा.
अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर सरकार या दूसरे पक्षकार इस मामले में जवाब दाखिल नहीं भी करेंगे, तब भी 10 पीड़ित मुस्लिम महिलाओं की याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू की जाएगी.
सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पहले ही केंद्र सरकार और दूसरे पक्षों को नोटिस जारी कर चुका है. मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने मामले की सुनवाई के दौरान ये बात सामने आई कि कुछ मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नियों को व्हाट्सएप और ईमेल के जरिए 'वर्चुअल तलाक' देने की कोशिश कर रहे हैं.
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि इन कुरीतियों के वजह से कई महिलाओं की जिंदगी और उनका भविष्य बर्बाद हो रहा है. मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका को सभी धर्मों की परंपराओं और मान्यताओं का सम्मान करना चाहिए. इसके साथ ही अदालत को धार्मिक मामलों में कम से कम हस्तक्षेप करना चाहिए.
हालांकि, बेंच ने ये भी कहा कि अगर कोई धार्मिक मान्यता या प्रथा सीधे तौर पर इंसान के मानवाधिकारों पर गलत प्रभाव डालती है, तो वैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत को दखल देना ही होगा.
पीड़ित महिलाओं ने बयां की अपनी आपबीती
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में पत्रकार बेनजीर हीना समेत कई तलाक पीड़ित महिलाओं की याचिकाएं लंबे समय से लंबित हैं. इन याचिकाओं में पीड़ित महिलाओं ने अपने साथ हुई नाइंसाफी की आपबीती सुनाई है. कई महिलाओं का आरोप है कि उनके पतियों ने बिना किसी बातचीत के सिर्फ एक व्हाट्सएप मैसेज या ईमेल भेजकर उन्हें तलाक दे दिया.
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वहीं कुछ पीड़ित महिलाओं का कहना है कि वो अनपढ़ हैं और उनके पतियों ने उनकी अशिक्षा का फायदा उठाकर सादे कागजों पर धोखे से उनके साइन या अंगूठे के निशान ले लिए. अब सुप्रीम कोर्ट 27 अक्टूबर से इन सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करेगा.