कभी घर में पड़े धागे और रिबन सिर्फ सजावट या शौक की चीज हुआ करते थे. लेकिन सहारनपुर की दो बहनों ने इन्हीं चीजों में कमाई का रास्ता खोज लिया. यह कहानी है आयुषी और खुशी धीमान की. दोनों बहनों ने कोई बड़ा बिजनेस प्लान नहीं बनाया था. न लाखों रुपये लगाए और न कोई बड़ी दुकान खोली. शुरुआत हुई घर से और उन चीजों से, जो पहले से उनके पास थीं.
आयुषी ने तो सिर्फ 250 रुपये से शुरुआत की... आयुषी पढ़ी-लिखी हैं. उन्होंने B.Com, M.Com और B.Ed किया है. करीब दो साल तक कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर रहीं. लेकिन रोजाना आने-जाने और स्वास्थ्य से जुड़ी दिक्कतों ने नौकरी मुश्किल कर दी. आखिरकार उन्होंने नौकरी छोड़ दी.

अब सवाल था कि आगे क्या? आयुषी को क्राफ्टिंग का शौक पहले से था. उनकी मां को क्रोशिया का काम आता था. मां को धागों के साथ काम करते देखकर आयुषी के अंदर भी इस हुनर को आजमाने की इच्छा हुई. फिर एक दिन उन्होंने इसे सिर्फ शौक न रखकर काम बनाने का फैसला कर लिया.
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करीब एक महीने पहले की बात है. आयुषी ने अपनी कॉलेज फ्रेंड के लिए क्रोशिया से सनफ्लावर की-रिंग बनाई. दोस्त को यह छोटी सी चीज इतनी पसंद आई कि उसके बाद आयुषी के पास ऑर्डर आने लगे. पहले की-रिंग. फिर पाउच. फिर फोन चार्म. और धीरे-धीरे काम की लिस्ट बढ़ती गई. अब आयुषी क्रोशिया से फूलों के बुके, जैकेट, स्वेटर और स्टफ्ड टॉयज तक बना रही हैं. यानी जिस धागे से शुरुआत एक छोटी सी की-रिंग से हुई थी, उसी ने उनके लिए कारोबार का रास्ता खोल दिया.

आयुषी बताती हैं कि उन्होंने शुरुआत में करीब 250 रुपये लगाए थे. अब तक लगभग 4,500 से 5,000 रुपये की बिक्री हो चुकी है और उनके मुताबिक करीब 2,500 से 3,000 रुपये तक का मुनाफा हुआ है. लेकिन इस कहानी में सिर्फ कमाई नहीं है. आयुषी के लिए क्रोशिया का काम एक तरह से सुकून भी है. वह मानती हैं कि हाथ से कुछ बनाना तनाव कम करने में मदद करता है. ऐसे समय में जब मशीन और AI तेजी से कई काम कर रहे हैं, आयुषी को लगता है कि हाथ से बनाई जाने वाली चीजों की अपनी अलग पहचान है.
वहीं, बहन खुशी ने सोशल मीडिया पर रिबन से बने प्रोडक्ट का एक वीडियो देखा. घर में रिबन पड़े थे. उन्होंने सोचा, चलो खुद बनाकर देखते हैं. पहली कोशिश में ही चीज बन गई. और यहीं से खुशी को लगा कि शायद उनके अंदर भी कोई ऐसा हुनर है, जिसे कारोबार में बदला जा सकता है. इसके बाद रिबन से फूल बनने लगे. फिर बुके. फिर की-रिंग. और फिर कस्टमाइज्ड गिफ्ट हैम्पर.
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खुशी का काम यहां थोड़ा और दिलचस्प है. जिन डिब्बों को हम इस्तेमाल के बाद फेंक देते हैं, खुशी उन्हीं चिप्स और स्नैक्स के डिब्बों को काटकर गिफ्ट हैम्पर के बॉक्स में बदल देती हैं. फिर ग्राहक की पसंद के हिसाब से उसमें चॉकलेट, स्नैक्स, ज्वेलरी और दूसरी चीजें सजाती हैं. मतलब ग्राहक ने जैसा कहा, खुशी वैसा हैम्पर तैयार कर देती हैं. उनके प्रोडक्ट Instagram और WhatsApp के जरिए ग्राहकों तक पहुंच रहे हैं. लेकिन खुशी के लिए यह सिर्फ बिजनेस नहीं है. इसके पीछे परिवार की एक पुरानी कहानी भी है.

2015 में उनके पिता का निधन हो गया था. इसके बाद उनकी मां ने परिवार की जिम्मेदारी संभाली. काम किया और बच्चों की परवरिश की. परिवार में सबसे बड़ी होने के नाते खुशी अब खुद भी अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हैं. उनकी सोच सीधी है- जिंदगी में ऐसा वक्त न आए, जब जरूरत पड़ने पर किसी के सामने हाथ फैलाना पड़े. वह खुद कमाना चाहती हैं और अपनी मां का सहारा बनना चाहती हैं.

खुशी नौकरी भी करती हैं और उसके साथ अपना यह काम भी आगे बढ़ा रही हैं. उनकी मां ने उन्हें कभी यह नहीं कहा कि नौकरी ही करो या बिजनेस ही करो. लेकिन अब जब बेटी अपने दम पर कुछ करने की कोशिश कर रही है, तो मां को भी गर्व होता है. दोनों बहनों का कारोबार अभी बहुत बड़ा नहीं है. एक तरफ 250 रुपये से शुरू हुआ क्रोशिया का काम है. दूसरी तरफ घर में पड़े रिबन और पुराने डिब्बों से तैयार होने वाले गिफ्ट हैम्पर हैं. लेकिन सपना बड़ा है.
किसी के नीचे काम करने की मजबूरी से निकलकर अपने हुनर से कमाना. आयुषी और खुशी की कहानी शायद यही बताती है कि आत्मनिर्भरता हमेशा बड़े निवेश या बड़े ऑफिस से शुरू नहीं होती. कभी-कभी इसकी शुरुआत घर के एक कोने में पड़े धागे से होती है, कभी रिबन के एक टुकड़े से. और कभी सिर्फ 250 रुपये से भी होती है.