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BRICS: पहलगाम, इंडिया की UNSC मेंबरशिप और फिलीस्तीन... दिल्ली घोषणापत्र में क्या क्या है?

शनिवार को ब्रिक्स सदस्यों ने 'नई दिल्ली घोषणापत्र' को सहमति से मंजूरी दे दी है. भारत इस घोषणापत्र में पहलगाम हमले को शामिल कराने में कामयाब रहा है. इसके अलावा इस दस्तावेज़ में टैरिफ वॉर से लेकर परमाणु संघर्ष के बढ़ते ख़तरे तक पर बात की गई है.

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दिल्ली घोषणापत्र सर्वसहमति से पारित. (Photo: PTI)
दिल्ली घोषणापत्र सर्वसहमति से पारित. (Photo: PTI)

ब्रिक्स के दिल्ली घोषणापत्र में भारत की प्रमुख प्राथमिकताओं को जगह मिली है. इसमें पहलगाम आतंकी हमले का जिक्र करते हुए टेररिज्म के खिलाफ कठोर रुख का ऐलान किया गया है. इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की एंट्री, एकतरफा व्यापार बाधाओं का विरोध और डिजिटल और वित्तीय सहयोग की चर्चा है. 

यह दस्तावेज वर्ल्ड ऑर्डर में भारत की  भूमिका और ब्रिक्स के भीतर उसकी प्रभावशीलता को रेखांकित करता है. खास बात यह है कि इस घोषणापत्र को बिना किसी सदस्य देश के विरोध के पारित किया गया है.

शनिवार को ब्रिक्स (BRICS) ने आतंकवाद के किसी भी रूप के प्रति 'ज़ीरो-टॉलरेंस' और इससे निपटने में दोहरे मापदंडों को न अपनाने की भारत की मांग का पूरी तरह से समर्थन किया. इस प्रभावशाली समूह के शीर्ष नेताओं ने इस चुनौती से निपटने के लिए एक संयुक्त दृष्टिकोण अपनाने पर सहमति व्यक्त की. 

अपने घोषणापत्र में समूह ने पिछले साल जम्मू-कश्मीर में हुए पहलगाम आतंकवादी हमले की भी "कड़े से कड़े शब्दों" में निंदा की, जिसमें 26 लोग मारे गए थे. 

इसमें कहा गया, "हम आतंकवाद के सभी रूपों और तरीकों से निपटने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं, जिसमें आतंकवादियों की सीमा-पार आवाजाही, आतंकवाद के लिए फंडिंग और सुरक्षित पनाहगाह शामिल हैं."

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इसमें कहा गया, "हम दोहराते हैं कि आतंकवाद को किसी धर्म, राष्ट्रीयता, सभ्यता या जातीय समूह से नहीं जोड़ा जाना चाहिए और आतंकवादी गतिविधियों में शामिल तथा उनका समर्थन करने वाले सभी लोगों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए और संबंधित राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के अनुसार न्याय के कठघरे में लाया जाना चाहिए."

दुनिया के संघर्षों पर दिल्ली घोषणापत्र

* मिडिल ईस्ट में मची उथल-पुथल और रूस-यूक्रेन युद्ध के खत्म होने के कोई आसार न दिखने के बीच इस घोषणापत्र में टकराव को रोकने की कोशिशें तेज करने पर ज़ोर दिया गया. ब्रिक्स नेताओं ने संवाद और कूटनीति के ज़रिए विवाद सुलझाने के अपने संकल्प को भी दोहराया.

* इस बात पर आम सहमति बनाना सबसे मुश्किल काम रहा होगा. रूस के अलावा, ब्रिक्स समूह में ईरान, यूएई और सऊदी अरब भी शामिल हैं - ये ऐसे देश हैं जो तेहरान और वॉशिंगटन के बीच चल रहे व्यापक टकराव में उलझे हुए हैं।

* इस घोषणापत्र में गाज़ा पर खास ध्यान दिया गया; ब्रिक्स ने युद्धविराम बनाए रखने और बिना किसी रुकावट के मानवीय सहायता पहुंचाने की मांग की. घोषणापत्र में 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' (दो-देश समाधान) का भी समर्थन किया गया. ये हमेशा से भारत का रुख रहा है. इसके अलावा फ़िलिस्तीन को संयुक्त राष्ट्र की पूर्ण सदस्यता देने की बात भी कही गई है. 

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टैरिफ का विरोध

* भले ही अमेरिका ब्रिक्स की बैठक में शामिल नहीं था, लेकिन अमेरिका के रूख पर चर्चा हुई. ब्रिक्स घोषणापत्र में एकतरफ़ा आर्थिक और सेकेंडरी प्रतिबंधों की निंदा की गई और इस बात पर ज़ोर दिया गया कि इनसे विकास, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा और मानवाधिकारों को नुकसान पहुंच सकता है

* समूह ने एकतरफ़ा टैरिफ़, नॉन-टैरिफ़ बाधाओं और अन्य संरक्षणवादी उपायों पर भी चिंता जताई. यह साफ़ तौर पर पिछले साल ट्रंप द्वारा लगाए गए अमेरिकी टैरिफ़ की ओर इशारा था.

परमाणु चिंताएं

* ब्रिक्स ने परमाणु खतरे और संघर्ष के "बढ़ते जोखिमों" पर भी चिंता जताई. दिल्ली डिक्लेशन की यह भाषा ईरानी परमाणु ठिकानों पर हमलों और प्रमुख शक्तियों के बीच हथियार-नियंत्रण के ढांचे के बिगड़ने के बाद बढ़ी हुई बेचैनी को दर्शाती है. 

ग्लोबल साउथ पर ज़ोर

* घोषणापत्र में ग्लोबल साउथ को ज़्यादा आवाज़ देने और वैश्विक संस्थानों में विकासशील देशों की ज़्यादा भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग की गई.

* समूह ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार का भी समर्थन किया. अहम बात यह है कि उसने संयुक्त राष्ट्र (सुरक्षा परिषद सहित) में ब्राज़ील और भारत की "बड़ी भूमिका" के लिए चीन और रूस के समर्थन का स्वागत किया.

* इसमें IMF, विश्व बैंक और अन्य संस्थानों में सुधार की भी मांग की गई ताकि विकासशील देशों को ज़्यादा आवाज़, ज़्यादा वोटिंग पावर और नेतृत्व के पदों पर मज़बूत प्रतिनिधित्व मिल सके.

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कुल मिलाकर यह घोषणापत्र वैश्विक व्यवस्था को आकार देने में ब्रिक्स देशों की बड़ी भूमिका की कोशिश को दर्शाता है. सभी 11 सदस्यों की सहमति हासिल करना भारत की अध्यक्षता के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत के तौर पर देखा जा रहा है. 

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