इंडिया टुडे और सी-वोटर के 'मूड ऑफ द नेशन' सर्वे में देश के युवाओं का मूड टटोलने की कोशिश की गई. देशभर में हुए GenZ आंदोलन के बाद यह अब तक का सबसे व्यापक सर्वे है. इसमें छात्रों के नए संगठन कॉकरोच जनता पार्टी को लेकर भी लोगों से सवाल पूछे गए, जिनके जवाब दिलचस्प रहे.
MOTN सर्वे में लोगों से पूछा गया कि अगर CJP प्रेशर ग्रुप के तौर पर ही काम करना चाहता है तो इस पर उनकी क्या राय है. इस सवाल के जवाब में 39 प्रतिशत लोगों ने कहा कि CJP को केवल प्रेशर ग्रुप ही बने रहना चाहिए. वहीं, 26 प्रतिशत लोगों का मानना था कि CJP को चुनाव भी लड़ना चाहिए.
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इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि CJP को लेकर लोगों के बीच चर्चा और दिलचस्पी जरूर है, लेकिन चुनावी राजनीति में उतरने को लेकर राय एक जैसी नहीं है. एक बड़ा वर्ग इसे प्रेशर ग्रुप के रूप में ही देखना चाहता है, जबकि करीब एक चौथाई लोग इसे चुनावी राजनीति में आते देखना चाहते हैं.
वहीं सर्वे में अगला सवाल और भी सीधा था. लोगों से पूछा गया कि अगर CJP चुनाव लड़ती है तो क्या वे उसे वोट देंगे? इसके जवाब में 33 प्रतिशत लोगों ने हां कहा, जबकि 43 प्रतिशत लोगों ने इससे इनकार किया. यानी CJP को लेकर जनता के बीच समर्थन और असहमति, दोनों दिखाई दे रहे हैं. हालांकि अधिक लोगों का इनकार करना सीधे तौर पर संकेत देता है कि कॉकरोच जनता पार्टी को व्यापक चुनावी समर्थन हासिल करने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना होगा.
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कैसे चर्चा में आई CJP?
बता दें कि सीजेआई सूर्यकांत के एक बयान के विरोध में 'कॉकरोच जनता पार्टी' नाम से ऑनलाइन अकाउंट बनाए गए थे. इसके बाद इसी संगठन ने जंतर-मंतर पर NEET परीक्षा को लेकर बड़ा छात्र और Gen-Z आंदोलन शुरू किया. यह आंदोलन आगे चलकर देशभर में चर्चा का विषय बना और इसके बीच शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा.
अब MOTN सर्वे में CJP को लेकर सामने आए आंकड़े यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या यह संगठन भविष्य में सिर्फ प्रेशर ग्रुप की भूमिका निभाएगा या चुनावी राजनीति में भी कदम रखेगा.

नौकरी या शिक्षा, बड़ा मुद्दा क्या?
सर्वे में जब देश के GenZ से पूछा गया कि अभी उनके लिए सबसे अहम मुद्दा क्या है, तो सबसे बड़ी संख्या में उन्होंने नौकरी को चुना. 53 प्रतिशत युवाओं ने साफ कहा कि रोजगार ही उनकी सबसे बड़ी चिंता है. इसके बाद 22 प्रतिशत ने शिक्षा को अपना सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बताया. रहन-सहन का खर्च यानी महंगाई 12 प्रतिशत युवाओं के लिए सबसे बड़ा मुद्दा निकला, जबकि मानसिक स्वास्थ्य को सिर्फ 4 प्रतिशत ने प्राथमिकता दी.
ये आंकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि बेरोजगारी की समस्या युवाओं के मन में बाकी सब मुद्दों से ऊपर है.
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रोजगार योग्य बनाने की जिम्मेदारी किसकी?
जब युवाओं से पूछा गया कि उन्हें रोजगार योग्य बनाने की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा किसकी है, तो भारी बहुमत ने केंद्र और राज्य सरकारों का नाम लिया. 63 प्रतिशत युवाओं का मानना है कि रोजगार योग्य बनाने की मुख्य जिम्मेदारी केंद्र-राज्य सरकारों की है.
इसके बाद 14 प्रतिशत ने स्कूल-कॉलेज को जिम्मेदार ठहराया, 9 प्रतिशत ने निजी नियोक्ताओं को और सिर्फ 5 प्रतिशत ने आम लोगों व परिवार को इस जिम्मेदारी का हिस्सा माना. ये आंकड़े बताते हैं कि युवा रोजगार के मामले में सबसे ज्यादा सरकार पर निर्भर हैं.