रांची के एक घर में इन दिनों ना सुबह नहीं होती ना रात होती, होता है तो बस इंतजार. एक पिता कभी भगवान के सामने हाथ जोड़ता है, कभी बंद आंखों से बेटे का चेहरा याद करता है और फिर फफक पड़ता है. आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं लेते. छह दिन से नेपाल में लापता बेटे राम प्रसाद की कोई खबर नहीं है. घरवालों की हर प्रार्थना अब एक ही जगह जाकर रुक जाती है हे भगवान, अब आपके चमत्कार की उम्मीद है, हमारा बेटा जहां भी है, उसे सही-सलामत घर लौटा दीजिए.
नेपाल में आई त्रासदी ने रांची के कोकर स्थित 12 नंबर हैदर अली रोड में रहने वाले रणजीत घोष के परिवार की खुशियां छीन ली हैं. उनका छोटा बेटा राम प्रसाद घोष नेपाल के अपर त्रिशूली हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट में सुपरवाइजर के तौर पर काम करता था. बीते बुधवार के बाद से उसका परिवार से कोई संपर्क नहीं हो पाया है. छह दिन से घर में हर फोन कॉल उम्मीद लेकर आती है और फिर खामोशी छोड़ जाती है. परिवार को अब तक यह भी पता नहीं चल पाया है कि राम प्रसाद किस हाल में है. वह सुरक्षित है या किसी मुसीबत में फंसा हुआ है, इसकी जानकारी नहीं है. ऐसे में एक-एक पल परिवार के लिए भारी गुजर रहा है.
आखिरी बार मंगलवार को हुई थी बात
राम प्रसाद ने आखिरी बार बीते मंगलवार को अपने भैया और भाभी से बातचीत की थी. तब किसी को अंदाजा नहीं था कि यह बातचीत आखिरी साबित हो सकती है. बुधवार के बाद से उसका कोई फोन नहीं आया. पहले परिवार को लगा कि शायद नेपाल में आई त्रासदी की वजह से नेटवर्क प्रभावित हुआ होगा. शायद कुछ देर बाद फोन आ जाएगा. लेकिन इंतजार लंबा होता गया. एक दिन बीता... फिर दूसरा... और अब छह दिन गुजर चुके हैं. लेकिन राम प्रसाद की कोई खबर नहीं है. पिता रणजीत घोष के लिए यह इंतजार सबसे मुश्किल है. उनकी आंखें हर पल बेटे की तलाश कर रही हैं.
जिस बेटे के भविष्य के लिए भेजे थे 30 हजार, आज उसी की जिंदगी की चिंता
करीब एक महीने पहले रणजीत घोष की अपने बेटे से बातचीत हुई थी. राम प्रसाद ने उनसे MBA करने के लिए 30 हजार रुपये मांगे थे. पिता ने बेटे की इच्छा पूरी करने के लिए पैसे भेज दिए. उन्हें यह भी नहीं पता कि राम प्रसाद ने MBA में दाखिला लिया या नहीं. एक महीने पहले पिता बेटे के भविष्य के लिए पैसे भेज रहे थे. आज वही पिता अपने बेटे की सलामती की खबर के लिए भगवान के सामने हाथ जोड़े बैठे हैं. जिस बेटे को वह पढ़ाकर आगे बढ़ाना चाहते थे, आज उसी बेटे के लौटने की दुआ कर रहे हैं. यह सोचकर रणजीत घोष बार-बार टूट जाते हैं.
पिता की आंखों से थम नहीं रहे आंसू
रणजीत घोष का बेटा लापता है और वह खुद इस समय बेहद परेशान हैं. राम प्रसाद का नाम आते ही वह और उनके भाई अजीत घोष बिलख पड़ते हैं. आंखों से आंसू निकलते हैं और शब्द जैसे गले में अटक जाते हैं. कभी बेटे की याद आती है तो पिता दहाड़ मारकर रो पड़ते हैं. फिर भगवान के सामने हाथ जोड़ लेते हैं. शायद अब उन्हें किसी अधिकारी के फोन से ज्यादा उस एक चमत्कार का इंतजार है, जो उनका बेटा वापस ला सके.
मां 2001 में ही छोड़ गई थीं साथ
राम प्रसाद की मां का निधन साल 2001 में ही हो गया था. इसके बाद परिवार के लिए पिता ही बड़ा सहारा रहे. बच्चों को आगे बढ़ाने और परिवार चलाने की जिम्मेदारी उन्होंने निभाई. रणजीत घोष लंबे समय से रांची में रह रहे हैं. वह 1965 से रांची में रह रहे हैं और एक बेकरी कंपनी में ब्रेड डिस्ट्रीब्यूटर रहे हैं. आज उम्र के इस पड़ाव पर वही पिता अपने बेटे की तलाश में बेचैन हैं. परिवार के मुताबिक रणजीत घोष अकेले हैं और उन्हें दिखाई भी नहीं देता. ऐसे में छह दिन से बेटे की कोई खबर न मिलना उनके लिए किसी बड़ी त्रासदी से कम नहीं है.
अगर आपदा से बच भी गया तो छह दिन कैसे गुजारे होंगे
पिता की चिंता सिर्फ इस बात को लेकर नहीं है कि राम प्रसाद कहां है. उनके मन में इससे भी बड़ा सवाल है. अगर उनका बेटा इस आपदा में बच गया होगा, तो छह दिनों से उसने कैसे गुजारा किया होगा? क्या उसे खाना मिला होगा? क्या उसे पानी मिला होगा? क्या वह कहीं फंसा हुआ होगा? क्या वह किसी मदद का इंतजार कर रहा होगा? एक पिता इन सवालों के जवाब नहीं जानता. लेकिन इन्हीं सवालों के साथ हर पल काट रहा है. और फिर भगवान से प्रार्थना करने लगता है. हे भगवान... अब आपके चमत्कार की उम्मीद है.
बड़े बेटे और बहू को भेजा तलाशने
जब कई दिनों तक राम प्रसाद की कोई खबर नहीं मिली तो परिवार ने अपने स्तर पर भी उसकी तलाश शुरू कर दी. रणजीत घोष ने अपने बड़े बेटे देव प्रसाद घोष और बहू नित्य घोष को छोटे भाई की तलाश के लिए भेजा है. परिवार को उम्मीद थी कि शायद वहां पहुंचने के बाद कोई सुराग मिलेगा. शायद कोई ऐसी जानकारी मिले जिससे छह दिनों से बनी बेचैनी कुछ कम हो सके. लेकिन रविवार रात तक भी परिवार को कोई सकारात्मक खबर नहीं मिल पाई. उम्मीद अब भी कायम है, लेकिन हर गुजरता दिन इस परिवार की चिंता बढ़ा रहा है.
प्रशासन से लेकर सरकार तक लगाई गुहार
बेटे की तलाश के लिए रणजीत घोष ने झारखंड सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग से लेकर जिले के उपायुक्त तक अपनी बात पहुंचाई है. उन्होंने अपनी पूरी व्यथा अधिकारियों को बताई है. परिवार को उम्मीद थी कि जल्द कोई ठोस जानकारी मिलेगी, लेकिन फिलहाल उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला है. एक पिता के लिए आश्वासन से ज्यादा जरूरी अब अपने बेटे की खबर है. वह यह नहीं पूछ रहे कि कार्रवाई कब पूरी होगी. वह सिर्फ यह जानना चाहते हैं कि राम प्रसाद कहां है और किस हालत में है.
रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ से भी मिले
रणजीत घोष अपने बेटे की तलाश के लिए रांची के सांसद और देश के रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ से भी मिले हैं. उन्होंने अपनी परेशानी उनके सामने रखी. संजय सेठ ने भी मामले को लेकर मिनिस्ट्री ऑफ एक्सटर्नल अफेयर्स और आपदा से जुड़े स्तर पर बात पहुंचाने के लिए कदम उठाया है और परिवार को सहयोग का भरोसा दिया है. अब परिवार प्रशासनिक प्रयासों के साथ भगवान से भी लगातार प्रार्थना कर रहा है.
घर में सिर्फ इंतजार बचा है
रांची के इस घर में अब कोई सामान्य बातचीत नहीं होती. हर चर्चा राम प्रसाद पर आकर रुक जाती है. फोन बजता है तो सबकी नजर उसी तरफ चली जाती है. दरवाजे पर आहट होती है तो उम्मीद जगती है. शायद कोई खबर आई हो. शायद राम प्रसाद के बारे में पता चला हो. शायद वह सुरक्षित हो. शायद वह लौटने वाला हो. लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ. छह दिन से परिवार इसी उम्मीद के सहारे है.
भगवान के सामने हाथ जोड़े बैठा है पूरा परिवार
एक तरफ नेपाल में राम प्रसाद की तलाश जारी है. दूसरी तरफ रांची में उसका परिवार भगवान के सामने हाथ जोड़े बैठा है. पिता की आंखों से आंसू थम नहीं रहे. भाई और भाभी बेटे की तलाश में दूर हैं. चाचा अजीत घोष भी इस दर्द में परिवार के साथ खड़े हैं. और हर किसी की जुबान पर एक ही दुआ है कि हे भगवान, अब आपके चमत्कार की उम्मीद है. हमारा बेटा जहां भी है, उसे सुरक्षित रखिए और किसी तरह उसे घर वापस भेज दीजिए. मां को गए 25 साल हो चुके हैं. अब इस उम्र में पिता अपने बेटे का इंतजार कर रहा है.